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जलवायु परिवर्तन की गति से सिस्टम फेल

Tue, 28 Feb 2017 09:37 PM IST
रजा शास्त्री/अमर उजाला, देहरादून
रजा शास्त्री/अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 28 Feb 2017 09:37 PM IST
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climate change has failed the system
जिस गति से हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव बढ़े हैं, उस लिहाज से सरकारी तंत्र अपने को सुसज्जित नहीं कर पाया। पर्वतीय क्षेत्रों के जिन गांवों में कभी झरनों का प्रवाह रुकता नहीं था, वहां हल्की सी धार से घड़ा भरने के लिए लाइन लगी रहती है।
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सबसे बड़ी चुनौती बनकर बीमारियां उभर रही हैं। पर्वतीय श्रंखलाओं के जिन गांवों में मच्छर नहीं दिखते थे, वहां अब मलेरिया के अलावा डेंगू फैल रहा है। विभिन्न प्रकार की इंसेफलाइटिस से लोग ग्रसित हो रहे हैं और स्वास्थ्य विभाग निहत्था और लाचार खड़ा हुआ है। इनसे निपटने के लिए अभी तक कोई इंतजाम नहीं हो पाए हैं।
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उत्तराखंड क्लाइमेट चेंज सेंटर ने स्थिति जानने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्था सीडी कैम से इन क्षेत्रों का सर्वेक्षण कराया था। इसके सर्वेक्षण के नतीजे परेशान करने वाले हैं। इनमेंं सबसे बड़ा मसला बीमारियों का है।
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संवाहक रोगों के  साथ पर्वतीय क्षेत्रों में मधुमेह और हृदय रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ी है। हृदय रोगियों के उपचार की कोई व्यवस्था नहीं हुई। इसके साथ क्लाइमेट चेंज का दुष्प्रभाव खानपान पर असर डाल रहा है।

अग्नाशय के संक्रमण से मधुमेह रोगियों की संख्या बढ़ी। लोग अब मधुमेह के कारण गैंगरीन का शिकार हो रहे हैं जिससे हाथ-पैर सर्जरी कर निकाल दिए जाते हैं।

इसी सर्वेक्षण का एक मार्कर जल भी रहा है। झरनों का पानी अब शुद्ध नहीं है। इसमें अमीबा, प्रोटोजोआ और कई तरह के परजीवी और बैक्टीरिया आ गए हैं। जल जनित बीमारियों के कारण आंतों और लीवर की मरीजों की संख्या बढ़ गई है।

बीमारियों में यह तेजी 15 सालों में आई है, जिससे निपटने का इंतजाम न तो जल निगम कर पाया और न ही स्वास्थ्य विभाग। जलवायु परिवर्तन का एक दुष्प्रभाव हिमालयी क्षेत्र के मौसम पर भी आया है। इस वजह से अनियमित और इकट्ठी बारिश होने लगी है। साथ ही घाटियों में बादल फटने की घटनाएं बढ़ गई हैं। इसकी वजह से भूस्खलन जोन भी बढ़ रहे हैं।

इसके लिए विज्ञानियों ने आबादी को नए क्षेत्रों में शिफ्ट करने का मशविरा दिया है जिससे आपदा में जनहानि न हो, लेकिन आवास महकमा अभी तक इस संबंध में कुछ नहीं कर पाया है। क्षेत्रों का अभी तक सर्वे नहीं कराया गया जबकि भूस्खलन जोन बढ़ते जा रहे हैं।


इसके अलावा जलवायु परिवर्तन से कृषि और वनस्पतियों पर प्रभाव डाला है। वन्य जीवों के कॉरीडोर टूटे हैं और वासस्थल बदल गए। पीने के पानी के लिए वन्य जीव बस्तियों की तरफ आ रहे हैं जिससे मानव-वन्य जीव संघर्ष एक नई चुनौती बनकर उभर रहा है, लेकिन जंगलों में जलाशय बनाने की कार्ययोजना धरातल पर नहीं उतर पाई है।
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