जलवायु परिवर्तन: साथ आए अमेरिका और चीन, बेहद अहम है दोनों देशों की सहमति
चीन अब दुनिया में सबसे बड़ा उत्सर्जक देश है। अमेरिका दूसरे नंबर पर है। लेकिन ऐतिहासिक रूप से ग्लोबल वॉर्मिंग में अमेरिका का ज्यादा बड़ा योगदान रहा है। इसके अलावा अगर प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के हिसाब से देखें, तो आज भी चीन का योगदान अमेरिका से बहुत कम है।
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अमेरिका और चीन के बीच लगातार बढ़ रहे तनाव के बीच इस खबर को राहत पहुंचाने वाली माना गया है कि दोनों देश जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने के लिए मिल कर काम करने पर राजी हो गए हैं। यह अमेरिका के जलवायु परिवर्तन जार (प्रतिनिधि) जॉन केरी की चीन यात्रा का हासिल रहा। यहां हुई लंबी बातचीत के बाद के दोनों देशों ने एक संयुक्त विज्ञप्ति जारी की, जिसे एक महत्त्वपूर्ण प्रगति समझा जा रहा है। विज्ञप्ति के मुताबिक दोनों देश पेरिस जलवायु संधि के तहत तय उत्सर्जन सीमा के पालन के लिए सहमत हुए हैं। गौरतलब है कि ग्रीन हाउस गैसों के दो सबसे बड़े उत्सर्जक देश अमेरिका और चीन ही हैं। दोनों में ये सहमति भी बनी कि अगर संभव हुआ तो वे 2030 तक पेरिस संधि से आगे जाते हुए कुछ अतिरिक्त कदम भी उठाएंगे।
इस बातचीत के लिए चीन रवाना होने से पहले जॉन केरी ने कहा था कि अन्य मुद्दों पर बड़े मतभेदों के बावजूद जलवायु परिवर्तन के मुकाबले के लिए अमेरिका को चीन के साथ मिल कर काम करना ही होगा। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, टेक्नोलॉजी, और राष्ट्रीय सुरक्षा के मसलों पर इस समय लगभग शीत युद्ध जैसी स्थिति है। इस बीच यहां हुई वार्ता का एक खास पहलू यह रहा कि चीन ने एक बार फिर ग्लोबल वॉर्मिंग के मुताबले में ‘साझा, लेकिन अलग-अलग’ जिम्मेदारी के सिद्धांत को एजेंडे पर ला दिया। इस सिद्धांत का मतलब है कि जलवायु परिवर्तन से निपटना दुनिया के सभी देशों की जिम्मेदारी है, लेकिन जिन देशों ने ऐतिहासिक रूप से ग्रीन हाउस गैसों का अधिक उत्सर्जन किया है, उन्हें ज्यादा जिम्मेदारी उठानी चाहिए।
अमेरिका और चीन की ताजा बातचीत शंघाई शहर में हुई। इसमें जॉन केरी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के प्रतिनिधि शी झेनहुआ आमने-सामने बैठे। बातचीत के बाद जारी विज्ञप्ति से इस बात की पुष्टि भी हो गई कि अगले 22-23 अप्रैल को अमेरिका की तरफ से आयोजित जलवायु शिखर सम्मेलन में शी जिनपिंग भाग लेंगे। इसमें कहा गया- ‘दोनों देश अमेरिकी मेजबानी में होने 22-23 अप्रैल को होने वाले जलवायु शिखर सम्मेलन का इंतजार कर रहे हैं। दोनों देश सम्मेलन के इस मकसद से सहमत हैं कि धरती के बढ़ रहे तापमान को रोकने के लिए अधिक महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य तय किए जाने चाहिए।’ हालांकि चीन ने यही कहा है कि वह पेरिस संधि के तहत तय अपनी जिम्मेदारी निभाएगा।
दोनों देशों के बीच इस बात पर भी सहमति बनी कि जीवाश्म (फॉसिल) ऊर्जा से हट कर अब स्वच्छ ऊर्जा में निवेश किया जाना चाहिए। लेकिन विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि विज्ञप्ति में ऐसी आम बातें ही कही गई हैं। इसमें दोनों देशों के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के कोई नए लक्ष्यों का जिक्र नहीं है।
पेरिस जलवायु संधि में इस सदी के अंत तक धरती के तापमान में वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का लक्ष्य तय किया गया है। लेकिन 2015 में ये संधि होने के बाद इस दिशा में दुनिया में कोई असरदार कदम नहीं उठाए गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने अब इस मुद्दे को प्राथमिकता दी है। इसके लिए चीन से संवाद कायम करने को एक सकारात्मक पहल समझा गया है। पर्यवेक्षकों को उम्मीद है कि 22-23 अप्रैल के शिखर सम्मेलन में इस बारे में कोई नई वैश्विक सहमति बनेगी। लेकिन उनका सवाल है कि क्या उसके बाद सहमति के अनुरूप अमल भी सुनिश्चित किया जा सकेगा?