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कुरुक्षेत्र: हिंदुत्व-असमिया पहचान और सत्ता संघर्ष के दांवपेंच में फंसा असम

Fri, 13 Dec 2019 06:00 AM IST
योगेश साहू विनोद अग्निहोत्री, अमर उजाला, नई दिल्ली
विनोद अग्निहोत्री, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: योगेश साहू Updated Fri, 13 Dec 2019 06:00 AM IST
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Citizenship Amendment Bill Assam State stuck in Hindutva and Assamese identity and power struggle
असम में नागरिकता विधेयक का काफी विरोध हो रहा है - फोटो : ANI

असम संघ के हिंदुत्व और असमिया पहचान के बीच फंस गया है और सत्ताधारी दल के आंतरिक संघर्ष ने स्थानीय टीवी न्यूज चैनलों की होड़ ने उस घी का काम किया है, जिससे नागरिकता संशोधन विधेयक-2019 को लेकर सुलग रही चिंगारी आग बन कर भड़क उठी। देखते देखते पूर्वोत्तर का यह द्वार असंतोष और विरोध प्रदर्शन की ज्वाला में इस कदर जल उठा कि राजधानी गुवाहाटी में कर्फ्यू लगाकर सेना बुलानी पड़ी।

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असमिया पहचान के नायक माने जाने वाले मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल और असम की सियासी पिच के सबसे ज्यादा मंजे खिलाड़ी जिन्हें पूर्वोत्तर का चाणक्य भी कहा जाता है, पूर्व कांग्रेसी नेता और अब राज्य की भाजपा सरकार में सबसे ताकतवर मंत्री हिमंत विश्वासर्मा के बीच जारी शीतयुद्ध की भूमिका भी असम की इस अशांति के पीछे मानी जा रही है। हिमंत इस समय खामोश हैं जबकि नागरिकता संशोधन विधेयक और एनआरसी को लेकर अपनी आंशकाएं और आपत्तियां बेहद मुखर तरीके से रखते रहे हैं।
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शुरुआती वजह जो भी रही हो लेकिन खुफिया सूत्रों के मुताबिक विरोध और असंतोष को हवा देने वाले इस आंदोलन में आल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू), अन्ना आंदोलन के दौरान सुर्खियों में आए अखिल गोगोई के नेतृत्व वाले किसान मजदू संग्राम समिति के साथ ही असम आंदोलन के समर्थकों और लगभग खत्म हो चुके प्रतिबंधित अलगाववादी संगठन अल्फा के घर बैठ चुके कार्यकर्ता और समर्थक भी कूद पड़े हैं।
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असम की राजनीति में असमिया पहचान का सवाल हमेशा केंद्रीय मुद्दा रहा है। भारत की आजादी से पहले ही असम में बंगाली और मारवाड़ी समुदाय के लोगों का वहां जाकर बसना और वहां के कारोबार और अर्थव्यवस्था पर वर्चस्व कायम करना स्थानीय लोगों के लिए हमेशा चिंता का विषय रहा है।

इसे लेकर अस्सी के दशक में अखिल असम छात्र संघ (आसू) के नेतृत्व में व्यापक असम आंदोलन हुआ था और जिसका समाधान राजीव गांधी सरकार के साथ असम आंदोलनकारियों के साथ हुए असम समझौते के रूप में हुआ। जिसमें माना गया कि 1971 के बाद असम में आए बाहर के सभी लोगों की पहचान की जाएगी और इसके लिए राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर बनाया जाएगा। इसके बावजूद यह मामला लटका रहा और लंबा खिंचता गया। 

मुद्दा स्थानीय बनाम बाहरी

प्रदेश में भाजपा ने हमेशा असम समस्या को हिंदू मुस्लिम चश्मे से देखा जबकि यह मुद्दा स्थानीय बनाम बाहरी का है। इसीलिए जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर असम में एनआरसी को लागू किया गया तो उसमें अंतिम सूची में बाहर रह गए करीब 19 लाख लोगों में से करीब 15 लाख लोग गैर मुस्लिम निकले।

इससे न सिर्फ भाजपा की घुसपैठिया राजनीति के बहाने असम में हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति की हवा निकली, बल्कि ये 15 लाख लोग केंद्र और राज्य सरकार के गले की हड्डी बन गए कि इनका क्या किया जाए। इसके बाद ही नागरिकता अधिनियम-1955 में संशोधन करने के लिए नागरिकता संशोधन अधिनियम-2019 लाया गया, जिसमें पाकिस्तान बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत में 31 दिसंबर 2014 तक आए सभी गैर मुस्लिमों जिनमें हिंदू, सिख, ईसाई, जैन, पारसी और बौद्ध धर्मावंलबी शामिल हैं को भारतीय नागरिकता देने का फैसला किया गया।

मुसलमानों को इस आधार पर इससे बाहर रखा गया कि क्योंकि ये तीनों देश इस्लामिक राष्ट्र हैं, इसलिए मुस्लिम वहां धार्मिक अल्पसंख्यकों की श्रेणी में नहीं आते और न ही उनका धार्मिक आधार पर उत्पीड़न होता है।

क्षेत्रीय अस्मिता और अधिकारों को लेकर है असंतोष

इस संशोधन विधेयक के जरिए एक तरफ तो तो असम में एनआरसी से बाहर हुए लाखों गैर मुस्लिमों जिनमें अधिसंख्य हिंदू हैं को भारतीय नागरिकता देने का रास्ता साफ हो गया है, वहीं राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को हिंदुत्व के ध्रुवीकरण होने की भी उम्मीद है। उसे लगता है इसका लाभ उसे आने वाले सभी चुनावों में मिल सकता है।

लेकिन असम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में इस संशोधन विधेयक को लेकर लोगों में जबरदस्त असंतोष फैल गया है और यह असंतोष हिंदू-मुस्लिम नजरिए की बजाय क्षेत्रीय अस्मिता और अधिकारों को लेकर है। असम के लोगों को लगता है कि नागरिकता संशोधन विधेयक में जिस तरह विदेशी शरणार्थियों के भारत आने की आखिरी तारीख को 31 दिसंबर 2014 रखा गया है जबकि असम समझौते में यह तारीख 1971 थी।

इससे न सिर्फ असम समझौता प्रभावहीन हो गया है, बल्कि असम में आए लाखों विदेशी और बाहरी लोग अब इस नए कानून की आड़ में भारतीय नागरिक बनकर असम के संसाधनों रोजगार आदि पर काबिज हो जाएंगे और उनकी भाषा संस्कृति पहचान को भीषण संकट पैदा हो जाएगा। 

प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने बार-बार आश्वस्त किया

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार असम और पूर्वोत्तर के लोगों को आश्वस्त किया है कि नागरिकता संशोधन विधेयक-2019 के कानून बनने से असम और पूर्वोत्तर के स्थानीय लोगों के हितों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा और उनकी भाषा संस्कृति पहचान पूरी तरह सुरक्षित रहेगी। यही बात असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने भी कही है।

लेकिन असम और त्रिपुरा शांत नहीं हो रहे हैं और आशंका है कि यह आग कहीं पूरे पूर्वोत्तर को अपनी चपेट में न ले ले। असम के स्थानीय लोगों की आशंकाओं को तब और बल मिला जब नागरिकता संशोधन विधेयक-2019 में पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों मणिपुर, नगालैंड, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश को इस कानून की परिधि से बाहर रखकर वहां इनर लाइन परमिट की व्यवस्था लागू रहने का प्रावधान किया गया।

राजनीति का सत्ता संघर्ष भी आग में सेंक रहा हाथ

असम की राजनीति का सत्ता संघर्ष भी इस आग में अपने हाथ सेंकने में जुटा है। मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल की सरकार काम करने वाली सरकार के रूप में लोगों में अपनी पहचान बना रही थी। असम आंदोलन से जुड़े रहे और अगप से भाजपा में आए सोनोवाल की लोकप्रियता राज्य के हर क्षेत्र और वर्ग में बढ़ रही थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुख्यमंत्री को भरोसा और आशीर्वाद दोनों ही हासिल है। सोनोवाल असम को पूर्वी भारत का सर्वाधिक विकसित राज्य और गुवाहाटी को पूरे पूर्वी भारत का विकास हब बनाने में जुटे थे। भारत सरकार की एक्ट एट ईस्ट (पूर्वी एशिया के देशों के साथ आर्थिक व्यापारिक वाणिज्यिक सांस्कृतिक तकनीकी संबंधों में सक्रिय सहयोग) नीति को कार्यान्वित करने के लिए गुवाहाटी को पूर्वी भारत का केंद्र बनाया जाना है।

ऐसे में राज्य में इस कदर अशांति ने पूरे असम की आबोहवा बिगाड़ दी है। भाजपा की अंदरूनी राजनीति के जानकार कहते हैं कि सोनोवाल के बढ़ते प्रभाव से भाजपा के कुछ नेता असहज हैं, इनमें मंत्री हिमंत विश्वासर्मा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

सियासी चतुराई और मुद्दे

कांग्रेस सरकार में कभी तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के लिए सिरदर्द बने रहे हिमंत विश्वासर्मा बेहद साधन संपन्न और सियासत के चतुर खिलाड़ी माने जाते हैं। राज्य का मुख्यमंत्री बनने की उनकी चाहत कांग्रेस सरकार के समय से ही है और 2016 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस नेतृत्व से मुख्यमंत्री बनाए जाने का आश्वासन न मिलने से नाराज विश्वासर्मा ने चुनाव से पहले ही भाजपा का दामन थामकर राज्य की सत्ता से कांग्रेस की विदाई और भाजपा की जीत में अहम भूमिका निभाई।

लेकिन भाजपा ने तत्कालीन केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल को मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में उतारकर विश्वासर्मा की बढ़ती महत्वाकांक्षा पर लगाम लगा दी। भाजपा सरकार बनी और विश्वासर्मा मंत्री बने लेकिन मुख्यमंत्री बनने की उनकी आकांक्षा दबी नहीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में हिमंत विश्वासर्मा की भाजपा नेतृत्व ने उपेक्षा की, जिसका भी उन्हें दंश है।

लेकिन प. बंगाल के शारदा घोटाले को लेकर विवादित रहे हिमंत विश्वासर्मा अपने विद्रोही स्वभाव के विपरीत खामोश रह गए और उन्होंने धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ अपनी नजदीकी बढ़ाई। लेकिन पिछले कुछ समय से सीएबी और एनआरसी को लेकर विश्वासर्मा ने बेहद आक्रामक बयान दिए। सीएबी और एनआरसी के मुद्दे पर असम के दो प्रमुख स्थानीय समाचार चैनलों ने लगातार असमिया पहचान के सवाल को जबरदस्त तरीके से उठाया और इस मुद्दे पर गरमी पैदा की।

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