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नागरिकता संशोधन बिल: आखिर क्यों असम सहित पूर्वोत्तर भारत में हो रहा है प्रदर्शन

Tue, 10 Dec 2019 12:16 PM IST
अनवर अंसारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गुवाहाटी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गुवाहाटी Published by: अनवर अंसारी Updated Tue, 10 Dec 2019 12:16 PM IST
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Citizenship Amendment Bill 2019 Why is there a protest against it in Northeast India including Assam
विधेयक के खिलाफ प्रदर्शन करते लोग - फोटो : ANI

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों खासकर असम में नागरिकता संशोधन बिल के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर रहे लोगों का गुस्सा अब कई तरह से सामने आ रहा है। विरोध-प्रदर्शन कर रहे लोग 'आरएसएस गो-बैक' के नारे लगा रहे हैं, साथ ही अपने नारों में सत्ताधारी बीजेपी को सतर्क कर रहे हैं।

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सड़कों पर उतरे ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के कार्यकर्ताओं ने इससे पहले नागरिकता बिल के खिलाफ मशाल जुलूस निकालकर अपना विरोध जताया। वहीं, स्थानीय कलाकार, लेखक, बुद्धिजीवी समाज और विपक्षी दलों के लोग अलग-अलग तरीको से अपना विरोध जता रहे हैं।
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नागरिकता संशोधन विधेयक को संक्षेप में सीएबी (कैब) भी कहा जाता है और यह बिल शुरू से ही विवादों में रहा है। नागरिकता संशोधन विधेयक, 2019 सदन में पेश करने के बाद ही ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के सदस्यों ने गुवाहाटी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल समेत भाजपा सरकार के कई नेता-मंत्रियों के पुतले फूंक कर अपना विरोध दर्ज किया।
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असम के डिब्रूगढ़, तिनसुकिया, धेमाजी, शिवसागर और जोरहाट जिले की कई जगहों पर सोमवार को विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों ने राष्ट्रीय राजमार्ग को बाधित कर यातायात व्यवस्था ठप कर दी। वहीं रेल की आवाजाही ठप करने और पुलिस के साथ प्रदर्शनकारियों के टकराव की खबरें भी सामने आ रही हैं।

आखिर किस बात का डर?

दरअसल पूर्वोत्तर राज्यों के स्वदेशी लोगों का एक बड़ा वर्ग इस बात से डरा हुआ है कि नागरिकता बिल के पारित हो जाने से जिन शरणार्थियों को नागरिकता मिलेगी उनसे उनकी पहचान, भाषा और संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी। ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के मुख्य सलाहकार समुज्जवल भट्टाचार्य भाजपा पर नागरिकता संशोधन बिल की आड़ में हिंदू वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाते है।

वो कहते हैं 'यह बात अब स्थापित हो गई है कि कांग्रेस ने बांग्लादेशी नागरिकों को सुरक्षा देने के लिए हम पर आईएमडीटी कानून थोपा था और अब भाजपा अवैध बांग्लादेशी लोगों को सुरक्षा देने के लिए हम लोगों पर नागरिकता संशोधन बिल थोप रही है। इन सबको बांग्लादेशियों का वोट चाहिए। लेकिन असम के लोग किसी भी कीमत पर इस बिल को स्वीकार नहीं करेंगे।'

ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन से छात्र राजनीति की शुरुआत करते हुए असम के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे सर्वानंद सोनोवाल ने प्रदेश में हो रहे व्यापक आंदोलन को देखते हुए कहा कि हमारी सरकार ने कभी भी जाति को नुकसान नहीं पहुंचाया है और कभी नहीं पहुंचाएगी।

उन्होंने कहा 'हम असमिया जाति की सुरक्षा के लिए शुरू से काम कर रहे हैं और आप लोग हमारे काम को देख रहे हैं। मैं आंदलोन कर लोगों को आह्वान करता हूं कि आप लोग आंदोलन के जरिए असम का भविष्य नहीं बदल सकते।'

नागरिकता संशोधन बिल के पारित हो जाने से क्या असमिया जाति, भाषा और उनकी संस्कृति पूरी तरह खत्म हो जाएगी। इस सवाल का जवाब देते हुए वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी कहते है 'अगर कैब लागू हो जाता है तो अपने ही प्रदेश में असमिया लोग भाषाई अल्पसंख्यक हो जाएंगे। असम में सालों पहले आकर बसे बंगाली बोलने वाले मुसलमान पहले अपनी भाषा बंगाली ही लिखते थे लेकिन असम में बसने के बाद उन लोगों ने असमिया भाषा को अपनी भाषा के तौर पर स्वीकार कर लिया।'

गोस्वामी ने कहा 'राज्य में असमिया भाषा बोलने वाले 48 फीसदी लोग हैं और अगर बंगाली बोलने वाले मुसलमान असमिया भाषा छोड़ देते हैं तो यह 35 फीसदी ही बचेंगे। जबकि असम में बंगाली भाषा 28 फीसदी है और कैब लागू होने से ये 40 फीसदी तक पहुंच जाएगी। फिलहाल असमिया यहां एकमात्र बहुसंख्यक भाषा है। वो दर्जा कैब के लागू होने से बंगाली लोगों के पास चला जाएगा।'

उन्होंने कहा 'इसके अलावा कैब के लागू होने से यहां धार्मिक आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण ज्यादा होगा। स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दों की अहमियत घटेगी। भाजपा और आरएसएस के लोग हिंदू के नाम पर सभी लोगों को एक टोकरी में लाने के लिए शुरू से काम कर रहे हैं और काफी हद तक यहां सफल भी हुए हैं।'

बिल का किन इलाकों पर पड़ेगा असर?

असम तथा पूर्वोत्तर में कई संगठनों ने आगे लगातार आंदोलन करने की जो घोषणा की है उसके क्या नतीजे निकलेंगे? इस सवाल का जवाब देते हुए बैकुंठ नाथ गोस्वामी कहते हैं कि ट्राइबल इलाको में नागरिकता बिल का कोई असर नहीं होगा। मेघालय, नागालैंड, मिजोरम और मणिपुर जैसे राज्यों में यह कानून लागू ही नहीं होगा। ऐसे में यह आंदोलन आगे जाकर कमजोर पड़ जाएगा।

उन्होंने बताया 'असम में बोड़ो, कार्बी और डिमासा इलाके संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत आते हैं, लिहाजा वहां वो कानून लागू ही नहीं होगा। बात जहां तक आम असमिया लोगों की है तो भाजपा इनके लिए नई योजनाओं की घोषणा कर इन्हें देर-सबेर अपने पाले में लाने का प्रयास तो करेगी। इससे पहले कांग्रेस भी ऐसी ही लोकलुभावन योजनाओं का प्रलोभन देकर 15 साल तक यहां अपनी राजनीति चलाती रही है।'

नागरिकता संशोधन बिल में धार्मिक उत्पीड़न के कारण पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए हुए हिंदू, सिख, पारसी, जैन और ईसाई लोगों को कुछ शर्तें पूरी करने पर भारत की नागरिकता देने की बात कही जा रही है। लेकिन असम में नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी की आखिरी सूची से जिन 19 लाख लोगों को बाहर किया गया है उनमें करीब 12 लाख हिंदू बंगाली बताए जा रहे हैं।

पहले भाजपा नेताओं का एनआरसी को पूरी तरह खारिज करना और अब नागरिकता संशोधन बिल को सदन से पारित करवाने के प्रयास को पार्टी के हिंदू वोट बैंक की राजनीति से ही जोड़कर देखा जा रहा है।

जारी रहेगा विरोध प्रदर्शन

पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों के छात्र निकाय नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंटस ऑर्गनाइजेशन ने मंगलवार को सुबह पांच बजे से लेकर शाम चार बजे तक पूर्वोत्तर राज्यों में बंद का आह्वान किया है।

राज्य के करीब 30 नागरिक संगठनों ने स्टूडेंटस ऑर्गनाइजेशन के इस बंद को अपना समर्थन दिया है। इस बीच, ऑल असम सूटीया स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन और ऑल असम मोरान स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन ने सोमवार सुबह से असम में 48 घंटे का बंद बुलाया है जिसका ऊपरी असम के करीब आठ जिलों में व्यापक असर देखने को मिल रहा है।

इस नागरिकता बिल को लेकर सोशल मीडिया पर सैकड़ों की तादाद में लोग मुख्यमंत्री सोनोवाल के खिलाफ अपना गुस्सा दिखा रहे हैं।

मुख्यमंत्री सोनोवाल ने अपने फेसबुक पेज पर एक वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा था कि असम को अगर औद्योगीकरण के क्षेत्र में आगे बढ़ाना है तो इसके लिए राज्य में शांति का माहौल होना आवश्यक है।

इस विवादित बिल के खिलाफ गुवाहाटी विश्वविद्यालय के एक छात्र ने अपने खून से एक संदेश लिखकर विरोध जताया है। सोशल मीडिया पर इस छात्र का एक वीडियो फुटेज वायरल हो रहा है, जहां वो अपनी कटी हुई कलाई के खून से लिखकर इस बिल का विरोध कर रहा है।

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