ड्रैगन की हरकत : लॉकडाउन के दौरान चीन ने दूसरे देशों की उम्मीदों पर फेरा पानी, रिपोर्ट से हुआ खुलासा
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जब सारी दुनिया चीन के वुहान से पैदा हुए कोरोना वायरस के डर से अपने अपने घरों में कैद थी तो चीन अपनी एक और अलग हरकत में व्यस्त था। उसकी ये हरकत भी दुनिया और पर्यावरण को बर्बादी की राह पर धकेलने में लगी हुई थी। दरसल पूरी दुनिया में इस दौरान सभी व्यावसायिक गतिविधियों से लेकर अन्य सभी ऐसी गतिविधियां बंद थी जिससे कार्बन उत्सर्जन होता हो। लेकिन चीन वो सब कर रहा था जो हमारे और आपके रहने में पर्यावरण की सबसे नुकसानदेह गैसें उत्सर्जित हों। इसी महीने नेचर क्लाइमेट चेंज जर्नल और ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट में प्रकाशित शोध से कुछ इसी तरह का खुलासा हुआ है।
शोध से पता चलता है कि पूरी दुनिया कोरोना के दौर में जब लॉकडाउन में थी तो कार्बन उत्सर्जन की प्रक्रिया से लेकर पर्यावरण को दूषित करने वाली तमाम गैसों का उत्सर्जन बहुत कम हुआ। लेकिन चीन एक इकलौता देश था जहां पर इन गैसों की वजह से पर्यावरण लगातार प्रदूषित हो रहा था। चीन में कार्बन उत्सर्जन कम होने का प्रतिशत अन्य मुल्कों की तुलना में बढ़ा ही रहा।
रिपोर्ट बताती है कि कार्बन उत्सर्जन में औद्योगिक क्षेत्र की हिस्सेदारी 24 फीसदी के तकरीबन होता है। लॉकडाउन में पूरी दुनिया भर में औद्योगिक क्षेत्र से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में तकरीबन 33 फीसदी की कमी दर्ज की गई। कार्बन उत्सर्जन में सबसे ज्यादा कमी अमेरिका और यूरोपीय देशों में दिखी। जिसमे अमेरिका में 12 फीसदी और यूरोपीय देशों में 11 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई। जबकि हैरान करने वाली बात यह रही कि कोविड लॉकडाउन के दौरान भी चीन अपनी व्यावसायिक गतिविधियों को हवा देता रहा।
न सिर्फ व्यावसायिक गतिविधियां बल्कि वह समस्त औद्योगिक इकाइयों को भी चलाता रहा जिससे कार्बन उत्सर्जन समेत तमाम जहरीली गैसें उत्सर्जित होकर जलवायु को जहरीला बनाती हैं। रिपोर्ट बताती है कि लॉकडाउन के दौरान जब पूरी दुनिया भर में कार्बन उत्सर्जन के क्षेत्र में औसतन 33 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई तो चाइना में कार्बन उत्सर्जन में गिरावट की दर महज 1.7 फीसदी ही रही। जबकि पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन अमेरिका, यूरोपीय संघ के देश और चीन ही करते हैं। ऐसे में अमेरिका और यूरोपीय संघ के देशों में कार्बन उत्सर्जन बहुत कम हुआ। जबकि चीन में ऐसा नहीं दिखा।
कार्बन उत्सर्जन के लगातार बढ़ने पर संयुक्त राष्ट्र को चिंता
पर्यावरण विशेषज्ञ रमेश पांडे कहते हैं इससे साफ जाहिर होता है कि चीन ने किस कदर खुद को आगे रखने के लिए सब कुछ दांव पर लगा रहा है। रमेश पांडे कहते हैं 5 साल पहले हुए पेरिस जलवायु समझौते के अनुसार इस दशक में हर साल तकरीबन 1 से 2 अरब मीट्रिक टन कार्बन उत्सर्जन की कटौती बहुत जरूरी है। अगर हम ऐसा कर पाएंगे तभी पृथ्वी के तापमान की वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखा जा सकता है। लेकिन 2015 में हुए पेरिस समझौते के बाद कार्बन उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने भी इस पर चिंता जताते हुए कहा कि अगर 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में प्रतिवर्ष 7.30 फ़ीसदी की कटौती हुई तो तापमान वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक ही सीमित रखा जा सकता है।
लॉकडाउन में कार्बन उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन पर पड़ने वाले प्रभाव को परखने वाले वैज्ञानिक केएल क्वेर्रे कहते हैं लॉकडाउन जलवायु परिवर्तन से निपटने का कोई तरीका नहीं है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि जैसे महामारी खत्म होगी उसके बाद कार्बन उत्सर्जन एक बार फिर से अपने चरम पर पहुंचने लगेगा। जलवायु परिवर्तन पर करीब से नजर रखने वाले पर्यावरणविद फिलिप चॉइस कहते हैं कि अगर कोरोना जैसी महामारी नहीं आई होती तो चीन जैसे कार्बन उत्सर्जन बड़े मुल्क अब तक फिजा में बहुत ज्यादा जहर घोल चुके होते। बावजूद इसके चीन ने कोई कसर नहीं छोड़ी। जब पूरी दुनिया में कार्बन उत्सर्जन कम हो रहा था तो चीन के द्वारा किया जाने वाला कार्बन उत्सर्जन कोरोना काल में भी सबसे ज्यादा था।