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छत्तीसगढ़ : गौंडी' के बलबूते सुरक्षा बलों पर भारी पड़ रहे हैं नक्सली

Sat, 10 Nov 2018 02:25 PM IST
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 10 Nov 2018 02:25 PM IST
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Chhattisgarh: Naxalites are getting heavier on the security forces due to Gondi language

छत्तीसगढ़ में नक्सल का गढ़ कहे जाने वाले बस्तर क्षेत्र में एक 'गौंडी' ही है, जिसके बलबूते नक्सली सुरक्षा बलों पर भारी पड़ रहे हैं। सुरक्षा बलों में पांच फीसदी स्टाफ भी ऐसा नहीं है, जो 'गौंडी' को समझता हो। नतीजा, सुरक्षा बलों को इसका भारी नुक़सान उठाना पड़ता है। हम यहां बस्तर क्षेत्र के जंगलों में और खासतौर से आदिवासियों के बीच बोली जाने वाली उनकी मातृभाषा ‘गौंडी’ की बात कर रहे हैं। 12 नवंबर को होने जा रहे विधानसभा चुनाव में सुरक्षा बलों के सामने 'गौंडी' एक बाधा बन कर खड़ी हो गई है। दूसरे राज्यों या केंद्रीय अर्धसैनिक बलों से जो भी कंपनी बस्तर में जा रही है, उसके जवान और अफसर 'गौंडी' की समझ न होने के कारण आदिवासियों से नक्सलियों के बारे में कोई भी इनपुट लेने में खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं।

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नक्सल क्षेत्र में तैनात सुरक्षा बलों की नोडल एजेंसी सीआरपीएफ के एक अधिकारी का कहना है कि बस्तर जोन के नक्सल प्रभावित जिले सुकमा, बीजापुर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर, जगदलपुर, कांकेर, कुंडा गांव व राजनंद गांव आदि में 'गौंडी' बोली जाती है। इस भाषा को जानने वाले लोग किसी भी सुरक्षा बल में न के बराबर हैं। विधानसभा चुनाव के लिए यहां पर पर्याप्त संख्या में कंपनी (सुरक्षा बल) भेजी गई हैं, लेकिन सभी के सामने भाषायी दिक्कत पहाड़ की चोटी की तरह खड़ी हो गई है। जंगल के चप्पे-चप्पे पर फोर्स की तैनाती संभव नहीं है और स्थानीय आदिवासियों से नक्सलियों के बारे में सामान्य इनपुट भी नहीं मिल रहा। सुरक्षा बलों की इसी कमजोर का नक्सली पूरा फायदा उठाते हैं।
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नक्सली समूहों से जुड़े लोग आदिवासियों के लगातार टच में रहते हैं

चूंकि नक्सली समूहों में ज्यादातर स्थानीय आदिवासी ही होते हैं, इसलिए वे गौंडी को अच्छी तरह से बोल लेते हैं। सुरक्षा बलों की कितनी गाड़ियां किस रोड से गुजरी हैं, एमपीवी कब और कौन सी दिशा में गया है, कोई बाइक दस्ता तो नहीं आया है, आसमान में यूएवी देखा है क्या, कच्चे मार्ग पर क्या कोई उपकरण लेकर जांच-पडताल की गई है, आदि जानकारी नक्सलियों को बड़ी आसानी से मिल जाती है। इतना ही नहीं, नक्सली अपने कुछ लोगों को स्थानीय आदिवासियों के बीच स्थायी तौर से बसा देते हैं, ताकि संबंधित इलाके की सूचना उन्हें अविलंब मिलती रहे। अब यही सब कुछ सुरक्षा बलों के लिए संभव नहीं हो पाता। सुरक्षा बल एंबुश (घात लगाकर हमला करना) या आमने-सामने की लड़ाई को तो झेल जाते हैं, लेकिन आईईडी (इंप्रोवाइस्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) के मामले में वे ज्यादा कुछ नहीं कर पाते।
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वजह, कौन कहां पर आईईडी लगाकर चला गया, इसका पता न तो ख़ुफ़िया इंटेलीजेंस और न ही यूएवी (अनमेंड एरियल व्हीकल) से पता चल पाता है। इस बाधा को दूर करने के लिए सीआरपीएफ ने पिछले साल बस्तरिया बटालियन का गठन किया है।इसमें एक हजार से ज्यादा जवान हैं। ये सभी बस्तर जोन के रहने वाले हैं। इनमें जो सिपाही ग्रामीण इलाके से हैं, वे गौंडा को आसानी से बोल सकते हैं, लेकिन अभी उन्हें इस तरह की सूचनाएं जुटाने के लिए आदिवासियों के बीच भेजने में समय लगेगा। डीआईजी इंटेलीजेंस एम. दिनाकरण का कहना है कि यह बस्तर बटालियन सुरक्षा बलों के लिए अहम है। आने वाले दिनों में इसका असर देखने को मिलेगा। इससे न केवल सुरक्षा बलों को ख़ुफ़िया इनपुट ज्यादा सटीक और अधिक संख्या में मिलने लगेंगे।

प्रेशर आईईडी, प्रेशर रिलीज व वायर आईईडी बड़ी चुनौती
 
सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती आईईडी हमले से निपटना है। नक्सलियों ने इस बार एंबुश या सुरक्षा बलों से सीधे टकराने की बजाए आईईडी विस्पफोट का सहारा लिया है। चूंकि इसे लगाना सबसे आसान है। नक्सली किसी भी बच्चे या बड़े को आईईडी देकर उसे मिट्टी में दबवा सकते हैं। चूंकि वे आदिवासी ही होते हैं, इसलिए उन पर किसी को शक भी नहीं होता। बीजापुर और दंतेवाडा में तो बड़े पैमाने पर आईईडी लगाए जाने के इनपुट आ रहे हैं। नक्सलियों को जब जवानों या दूसरे सरकारी अधिकारियों पर हमला करना होता है तो वे चार से दस किलोग्राम की प्रेशर आईईडी लगाते हैं। इसके उपर जैसी ही जवान का पैर पडता है तो यह फट जाती है। 


दूसरा, प्रेशर रिलीज आईईडी होता है। इसके उपर जब पांव पड़ता है और जब वह हटता है तो विस्फोट हो जाता है। माईनिंग प्रोटेक्टिेड व्हीकल, बस, ट्रक या जीप आदि उड़ानी हो तो वे वायर आईईडी का इस्तेमाल करते हैं। इसमें पचास किलो तक की विस्फोटक सामग्री रहती है। इसे बैटरी से जोड़ा जाता है और दूर बैठा कोई आदमी टारगेट के निकट या उसके उपर आते ही विस्फोट कर देता है। विस्फोट के बाद नक्सली घटना स्थल से हथियार आदि लूटकर भाग जाते हैं। हमला करने या चोट पहुंचाने का यह सबसे आसान तरीका है, इसलिए नक्सली आजकर इसी को आजमा रहे हैं।

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