चांद पर इतिहास लिखेंगे भारत का विक्रम और प्रज्ञान, क्या है सॉफ्ट लैंडिंग
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- रात 1:40 बजे चंद्रयान ठीक 90 डिग्री पर उतरना शुरू करेगा।
- करीब 1:55 बजे दो क्रेटर के बीच लैंड करेगा। इसके दो घंटे बाद 3:55 बजे लैंडर का रैंप खुलेगा।
- सुबह 5:55 बजे रोवर (प्रज्ञान) लैंडर (विक्रम) से बाहर आकर चांद पर उतरेगा।
- इसकी तस्वीरें इसरो को शनिवार सुबह 11 बजे मिलेंगी।
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विस्तार
‘चंद्रयान-2' का लैंडर ‘विक्रम' शुक्रवार और शनिवार की दरमियानी रात चांद की सतह पर ऐतिहासिक ‘सॉफ्ट लैंडिंग' के लिए तैयार है। यह क्षण इसरो के वैज्ञानिकों के लिए तो धड़कनें थमा देने वाला होगा ही साथ ही पूरी दुनिया की निगाहें भी इस मिशन पर टिकी हैं। सफल ‘सॉफ्ट लैंडिंग' भारत को रूस, अमेरिका और चीन के बाद यह उपलब्धि हासिल करने वाला दुनिया का चौथा देश बना देगी।
कैसे होगी ‘सॉफ्ट लैंडिंग'
चांद पर लैंडिंग के साथ ही भारत अंतरिक्ष इतिहास में एक नया अध्याय लिखते हुए चांद के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में पहुंचने वाला विश्व का प्रथम देश बन जाएगा। लैंडर ‘विक्रम' शनिवार रात एक से दो बजे के बीच चांद पर उतरने के लिए नीचे जाना शुरू करेगा। रात डेढ़ से ढाई बजे के बीच यह पृथ्वी के प्राकृतिक उपग्रह के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में उतरेगा।
इसरो से जारी की गई जानकारी के मुताबिक ‘चंद्रयान-2' अपने लैंडर को 70 डिग्री दक्षिणी अक्षांश में दो गड्ढों- ‘मैंजिनस सी' और ‘सिंपेलियस एन' के बीच ऊंचे मैदानी इलाके में उतारने का प्रयास करेगा। अंतरिक्ष एजेंसी के अध्यक्ष के. सिवन ने कहा कि प्रस्तावित ‘सॉफ्ट लैंडिंग' दिलों की धड़कन थाम देने वाली साबित होने जा रही है क्योंकि इसरो ने ऐसा पहले कभी नहीं किया है।
15 मिनट में 30 किलोमीटर
सिवन के अनुसार, जब लगभग 30 किलोमीटर की दूरी से लैंडिंग की प्रक्रिया शुरू होगी तो इसे पूरा होने में 15 मिनट लगेंगे। लैंडर के चांद पर उतरने के बाद इसके भीतर से रोवर ‘प्रज्ञान' बाहर निकलेगा और एक चंद्र दिवस यानी के पृथ्वी के 14 दिनों की अवधि तक अपने वैज्ञानिक कार्यों को अंजाम देगा। रोवर 27 किलोग्राम वजनी छह पहिया रोबोटिक वाहन है जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) से लैस है। इसका नाम ‘प्रज्ञान' है जिसका मतलब ‘बुद्धिमत्ता' से है।
कैसे चलेगा प्रज्ञान
यह ‘लैंडिंग' स्थल से 500 मीटर तक की दूरी तय कर सकता है और यह अपने परिचालन के लिए सौर ऊर्जा का इस्तेमाल करेगा। यह लैंडर को जानकारी भेजेगा और लैंडर बेंगलुरु के पास ब्याललु स्थित इंडियन डीप स्पेस नेटवर्क को जानकारी प्रसारित करेगा।
इसरो के अनुसार लैंडर में तीन वैज्ञानिक उपकरण लगे हैं जो चांद की सतह और उप सतह पर वैज्ञानिक प्रयोगों को अंजाम देगा, जबकि रोवर के साथ दो वैज्ञानिक उपकरण हैं जो चांद की सतह से संबंधित समझ में मजबूती लाने का काम करेंगे। इसरो के अनुसार चांद का दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र बेहद रुचिकर है क्योंकि यह उत्तरी ध्रुव क्षेत्र के मुकाबले काफी बड़ा है और अंधकार में डूबा रहता है।
चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग के अब तक 38 प्रयास हुए, 52 फीसदी ही सफल रहे
चांद को छूने की पहली कोशिश 1958 में अमेरिका और सोवियत संघ रूस ने की थी। अगस्त से दिसंबर 1968 के बीच दोनों देशों ने 4 पायनियर ऑर्बिटर (अमेरिका) और 3 लूना इंपैक्ट (सोवियन यूनियन) भेजे, लेकिन सभी असफल रहे। अब तक चंद्रमा पर दुनिया के सिर्फ 6 देशों या एजेंसियों ने सैटेलाइट यान भेजे हैं। कामयाबी सिर्फ 5 को मिली है। अभी तक ऐसे 38 प्रयास किए गए, जिनमें से 52% सफल रहे हैं।
चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव ही क्यों?
चांद के दक्षिणी ध्रुव पर अगर कोई अंतरिक्ष यात्री खड़ा होगा तो उसे सूर्य क्षितिज रेखा पर दिखाई देगा। वह चांद की सतह से लगता हुआ और चमकता नजर आएगा। सूर्य की किरणें दक्षिणी ध्रुव पर तिरछी पड़ती हैं। इस कारण यहां तापमान कम होता है। स्पेस इंडिया के ट्रेनिंग इंचार्ज तरुण शर्मा बताते हैं कि चांद का जो हिस्सा सूरज के सामने आता है, वहां का तापमान 130 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है।
इसी तरह चांद के जिस हिस्से पर सूरज की रोशनी नहीं आती, वहां तापमान 130 डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाता है। लिहाजा, चांद पर हर दिन (पृथ्वी के 14 दिन) तापमान बढ़ता-चढ़ता रहता है, लेकिन दक्षिणी ध्रुव पर तापमान में ज्यादा बदलाव नहीं होता। यही कारण है कि वहां पानी मिलने की संभावना सबसे ज्यादा है।
ये देश चांद पर सैटेलाइट भेज चुके हैं
रूस: 17 साल में कुल 24 प्रयास किए, इनमें से 15 ही सफल रहे
1959 से 1976 के बीच सोवियत संघ रूस ने 24 प्रयास किए, इनमें से 15 सफल रहे, किसी में ऑर्बिटर था, किसी में लैंडर। 13 सितंबर, 1959 को रूस का लूना-2 मिशन चंद्रमा पर पहुंचने वाला पहला मिशन था। लूना के दो मिशन चंद्रमा की सतह से नमूने लेकर भी वापस आए। लूना-17 और लूना-21 मिशन ने चांद पर रोवर को भी उतराने में कामयाबी हासिल की।
जापान: पहला मिशन फेल हो गया, फिर 17 साल बाद सफलता मिली
जापान ने 24 जनवरी, 1990 को अपना पहला मून मिशन 'हितेन-हागोरोमो' लॉन्च किया। ऑर्बिटर से चंद्रमा की कक्षा में पहुंचने के कुछ देर बाद ही इसका जमीन से संपर्क कट गया। जापान एयरोस्पेस एजेंसी ने 4 सितंबर 2007 को 'कागुया' लॉन्च किया, जो 3 अक्टूबर को चांद की कक्षा में पहुंच गया। अपोलो मिशन के बाद चांद का यह सबसे बड़ा मिशन था।
भारत: पहली बार में सफलता, 5वां देश बना
भारत का चंद्रयान-1 (1380 किग्रा) 22 अक्टूबर, 2008 को पीएसएलवी सी-11 रॉकेट द्वारा श्रीहरिकोटा से भेजा गया था। इसमें कुल 11 उपकरण थे। इसकी अवधि 2 साल थी, पर यह केवल 10 महीने छह दिन ही सक्रिय रह सका।
इसके बाद 2014 में मंगलयान भेजा गया।
22 जुलाई 2019: इसरो ने चंद्रयान-2 भेजा।
अमेरिका: 19 मिशन भेजे, इनमें 16 सफल; 24 यात्री भी चांद पर पहुंचे
नासा के सर्वेयर प्रोग्राम के तहत जून, 1966 से जनवरी, 1968 तक 7 बार रोबोटिक स्पेसक्राफ्ट चंद्रमा पर भेजे गए। इनमें से पांच सर्वेयर स्पेसक्राफ्ट चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग में सफल रहे। नासा के अपोलो मिशन के तहत फरवरी, 1966 से दिसंबर, 1972 के बीच 19 प्रयास किए, 16 सफल रहे। इन मिशनों के जरिए नील आर्मस्ट्रांग सहित 24 अंतरिक्ष यात्री भी चांद पर पहुंचे।
चीन: 4 मिशन भेजे, सभी सफल रहे, युतु चांद पर 10 किमी चला
चीन के चाइना नेशनल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन ने मून मिशन चेंग सीरीज में 2007 से अब तक 4 प्रयास किए हैं, सभी सफल रहे हैं। चेंग-1 और चेंग-2 में ऑर्बिटर भेजे गए और चेंग-3 और चेंग-4 में लैंडर थे, इनमें युतु-1 और युतु-2 नाम के रोवर भी थे। चेंग-3 (1200 किग्रा) लैंडर ने चीन से एक दिसंबर, 2013 को उड़ान भरी और 14 दिसंबर को चांद पर उतर गया।
यूरोपीय यूनियन
यूरोप की यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने स्मार्ट-1 ऑर्बिटर/इंपैक्ट प्रोब 27 सितंबर, 2003 को लॉन्च किया।
रोवर को लैंडर से निकलने में कितना समय लगेगा?
लैंडर के अंदर ही रोवर (प्रज्ञान) रहेगा। यह प्रति 1 सेंटीमीटर/सेकंड की रफ्तार से लैंडर से बाहर निकलेगा। इसे निकलने में 4 घंटे लगेंगे। बाहर आने के बाद यह चांद की सतह पर 500 मीटर तक चलेगा। यह चंद्रमा पर 1 दिन (पृथ्वी के 14 दिन) काम करेगा। इसके साथ 2 पेलोड जा रहे हैं।
इनका उद्देश्य लैंडिंग साइट के पास तत्वों की मौजूदगी और चांद की चट्टानों-मिट्टी की मौलिक संरचना का पता लगाना होगा। पेलोड के जरिए रोवर ये डेटा जुटाकर लैंडर को भेजेगा, जिसके बाद लैंडर यह डेटा इसरो तक पहुंचाएगा।
ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर किसलिए भेजे गए हैं?
चांद की कक्षा में पहुंचने के बाद ऑर्बिटर एक साल तक काम करेगा। इसका मुख्य उद्देश्य पृथ्वी और लैंडर के बीच संप्रेषण बनाना है। इसके साथ ही ऑर्बिटर चांद की सतह का नक्शा तैयार करेगा, ताकि चांद के अस्तित्व और विकास का पता लगाया जा सके। लैंडर यह जांचेगा कि चांद पर भूकंप आते हैं या नहीं। जबकि, रोवर चांद की सतह पर खनिज तत्वों की मौजूदगी का पता लगाएगा।
चांद की धूल से सुरक्षा अहम
वैज्ञानिकों के मुताबिक, चंद्रमा की धूल भी चिंता का विषय है, यह लैंडर को कवर कर उसकी कार्यप्रणाली को बाधित कर सकती है। इसके लिए लैंडिंग के दौरान चार प्रक्षेपक स्वत: बंद हो जाएंगे, केवल एक चालू रहेगा। इससे धूल के उड़ने और उसके लैंडर को कवर करने का खतरा कम हो जाएगा।