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नोटबंदी का यूपी चुनाव में क्या होगा असर, जानिए#नोटबंदी 21वां दिन

Tue, 29 Nov 2016 10:06 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 29 Nov 2016 10:06 AM IST
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Cash Ban: Beneficial for BJP in up election or not
- फोटो : Getty Images

केंद्र सरकार के नोटबंदी के फैसले के बाद जहां देशभर में इसके नफे नुकसान पर बहस का दौर जारी है, वहीं राजनीतिक दल भी अपने अपने हिसाब से इस फैसले को तौल रहे हैं। खासकर भाजपा के लिए इस नोटबंदी के बहुत मायने हैं। क्योंकि दबी छुपी जुबान में इसे यूपी चुनाव के लिए भाजपा का मास्टर स्ट्रोक भी माना जा रहा है।

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राजनीतिक विशेषज्ञ जानते हैं कि यूपी चुनाव का भाजपा के लिए क्या मायने हैं। ये चुनाव ही साल 2019 के आम चुनाव के लिए प्रधानमंत्री मोदी की राह आसान करेंगे। वैसे भी यूपी के चुनावों को देशभर में सबसे ज्यादा खर्चीला माना जाता है। एक अनुमान के मुताबिक यूपी के विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दलों का कुल बजट चार हजार करोड़ से ज्यादा का होता है और इसमें से 90 फीसदी लेनदेन नकद ही होता है।
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ऐसे में केंद्र सरकार के फैसले ने राजनीतिक दलों के सामने अब विकट स्थिति खड़ी कर दी है, लेकिन सवाल फिर वही है कि क्या भाजपा यूपी चुनाव में नोटबंदी का क्रेडिट ले पाएगी।

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भाजपा के लिए फायदे का सौदा दिख रहा नोटबंदी

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पहली नजर में तो इस सवाल का जवाब हां में ही मिलता है। पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक के बाद जिस तरह भाजपा और केंद्र सरकार ने इस मुद्दे को जमकर भुनाया, वैसे ही भाजपा नोटबंदी को भी भुनाने की तैयारी में है। खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह अपने सांसदों और विधायकों को इस बात की हिदायत दे चुके हैं कि इस मुद्दे पर बैकफुट पर रहने के बजाय छाती ठोंक कर अपनी बात रखी जाए।

असल में भाजपा और उसके रणनीतिकार मान रहे हैं ‌कि नोटबंदी का मुद्दा बेशक आमजन के लिए थोड़ा कष्टकारी हो, लेकिन कालेधन के मुद्दे पर वह लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़े रखने में सफल होंगे। सरकार और भाजपा दोनों को उम्‍मीद है कि जैसे जैसे हालात थोड़ा सुधरेंगे, लोगों का गुस्सा भी शांत हो जाएगा और कालेधन को लेकर उनका समर्थन भी बढ़ेगा।

समाचार एजेंसी रायटर्स का भी आकलन है कि नोटबंदी का फैसला शार्ट टर्म में भाजपा के लिए नुकसान वाला हो सकता है, लेकिन व्यापक परिपेक्ष्य में देखें तो यह भाजपा के लिए फायदेमंद ही रहने वाला है। उसके लिए फायदेमंद ये भी है कि राज्य की 65 फीसदी से ज्यादा आबादी 35 साल से कम उम्र वाले युवाओं की है। जो इस फैसले को लेकर काफी हद तक उसके साथ दिखाई दे रहे हैं।

चुनावों में नकद लेनदेन पर टिकी है व्यवस्‍था

Cash Ban: Beneficial for BJP in up election or not
दूसरा, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि नोटबंदी के बाद राजनीतिक दलों की तैयारियों को झटका लगा है। चुनावी रैलियों और अन्य इंतजामों के अलावा राजनीतिक दलों द्वारा भारी मात्रा में वोटरों के बीच नकदी और तोहफे बांटने का चलन रहा है, लेकिन नोटबंदी के बाद राजनीतिक दलों और उनके कर्ताधर्ताओं के लिए यह सब इतना आसान नहीं रह जाएगा।

रैलियों में आने वाले भारी भरकम खर्चे की व्यवस्‍था करना और उसका लेनदेन दिखाना अब काफी मुश्किल भरा होगा। बसपा के एक बड़े नेता मानते भी हैं कि पार्टी के सामने अब बड़ी राजनीतिक रैलियां करना थोड़ा मुश्किल होगा। उनका कहना है कि अब हमारी रणनीति छोटी छोटी रैलियों और सभाओं के जरिए लोगों से जुड़ने की है।

कुछ ऐसे ही हाल कांग्रेस के भी हैं जो एक बार फिर प्रदेश में पैर जमाने की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी की खाट सभाओं से पार्टी राज्य भर में लोगों को जोड़ने का प्रयास कर रही है, लेकिन नोटबंदी के बाद उसके लिए बड़े स्तर पर इसे आयोजित करवाना थोड़ा मुश्किल भरा होगा।

प्रदेश में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रदीप माथुर तो इसको लेकर भाजपा पर सीधे सीधे आरोप भी लगाते हैं कि उनके संबंध तो बड़े कारपोरेट घरानों से हैं। इसलिए उन्हें फंड और अन्य चीजों की दिक्‍कत नहीं आने वाली, लेकिन अन्य दलों को जरूर इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

चुनावों में विभिन्न दलों के प्रचार अभियानों की फंडिंग का आकलन करने वाले दिल्ली के सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के अनुसार, भाजपा के लिए यूपी में अपनी जरूरतों का दो-तिहाई खर्च बिना कैश के भी पूरा हो जाएगा, लेकिन विरोधी दलों को अपनी कैंपेनिंग के लिए 80 से 95 फीसद तक कैश पर ही निर्भर होना होगा। भाजपा और अन्य दलों के बीच यह बड़ा अंतर है।
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