क्या न्यायिक समीक्षा में टिक पाएगा गरीब सवर्णों को आरक्षण देने का फैसला?
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सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता एम.एल. लाहोटी के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में इंदिरा साहनी मामले में फैसला दिया था कि सरकार 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं दे सकती। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को मंडल जजमेंट कहा जाता है। उच्चतम न्यायालय के 9 जजों की पीठ ने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से ज्यादा नहीं बढ़ाई जा सकती।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि संविधान का अनुच्छेद-16 (4) के मुताबिक पिछड़ेपन का अर्थ सामाजिक पिछड़ेपन से है। शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ापन सामाजिक पिछड़ेपन की वजह से हो सकते हैं। लेकिन अनुच्छेद-16 (4) में सामाजिक पिछड़ापन एक विषय है। अगर कोई सरकार 50 फीसदी की सीमा से ज्यादा आरक्षण देती है तो वह न्यायिक समीक्षा के दायरे में होगा। और मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था है उसका टिक पाना बेहद मुश्किल है।
कब कब विफल हुए प्रयास
-1991 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया था।
-1992 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार देते हुए खारिज कर दिया।
-2003 में भाजपा सरकार ने एक मंत्री समूह का गठन किया। हालांकि, वाजपेयी सरकार 2004 का चुनाव हार गई।
-2006 में कांग्रेस ने भी एक समिति बनाई, जिसे आर्थिक रूप से पिछड़े उन वर्गों का अध्ययन करना था जो मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के दायरे में नहीं आते।
संविधान की बुनियादी संरचना से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती
संवैधानिक मामलों के जानकार और लोकसभा के सेवानिवृत सेक्रेटरी जनरल पीडीटी अचारी कहते हैं कि संविधान में अनुच्छेद-16 में समानता की बात करते हुए सबको बराबर मौका देने की बात कही गई है। यह संविधान की बुनियादी संरचना का हिस्सा है। अगर आरक्षण 50 फीसदी की सीमा को पार कर दिया जाता है और इसके लिए संविधान में संशोधन किया जाता है, या फिर मामले को 9वीं अनुसूची में रखा जाता है ताकि उसे न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर रख दिया जाए, तो भी मामला न्यायिक समीक्षा के दायरे में होगा। दरअसल 9वीं अनुसूची में रखकर ऐसा कोई कानूनी या कानूनी संशोधन नहीं किया जा सकता जो संविधान की बुनियादी संरचना से छेड़छाड़ करता हो।केशवानंद भारती से संबंधित वाद में सुप्रीम कोर्ट के 13 जजों की संवैधानिक पीठ ने कहा था कि संविधान की बुनियादी संरचना के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। अगर आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा दिया जाता है तो निश्चित तौर पर यह संविधान के अनुच्छेद में दी गई व्यवस्था के उलटा होगा। क्योंकि इसमें प्रावधान है कि समान अवसर दिए जाएं और इस तरह से देखा जाए तो मौलिक अधिकार के प्रावधान प्रभावित होंगे और वह संविधान की बुनियादी संरचना का हिस्सा है।
50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण के कई मामले सुप्रीम कोर्ट पहुंचे
एम.एल. लाहोटी ने बताया कि पहले भी कई बार राज्य सरकारों ने तय 50 फीसदी सीमा से ज्यादा आरक्षण दिया था। राजस्थान सरकार ने विशेष पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देते हुए 50 फीसदी की सीमा को पार किया था। जब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा तो आरक्षण को खारिज कर दिया गया।
वहीं दिसंबर 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के आरक्षण पर रोक लगाने के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया था। महाराष्ट्र सरकार ने आरक्षण सीमा को बढ़ाकर 73 फीसदी कर मराठाओं को नौकरी और शैक्षणिक संस्थाओं में 16 फीसदी आरक्षण देने का फैसले किया था।बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी थी। उच्च न्यायालय ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक आरक्षण कुल सीटों में से 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता। तामिलनाडु सरकार ने 69 फीसदी आरक्षण दिया था जिसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी और मामला अब भी सर्वोच्च न्यायालय में लंबित पड़ा हुआ है।
क्या गरीब सवर्णों को आरक्षण चुनावी जुमला है?
सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील केटीएस तुलसी का कहना है कि कोर्ट ने व्यवस्था दे रखी है कि 9वीं अनुसूची का सहारा लेकर अवैध कानून को का बचाव नहीं किया जा सकता। अगर कोई कानून संवैधानिक दायरे से बाहर होगा तो उसे 9वीं अनुसूची में डालकर नहीं बचाया जा सकता।क्योंकि संविधान की बुनियादी संरचना के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देने के लिए केंद्र सरकार का बिल अगर संसद में पारित भी हो जाता है तो भी उसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकेगी और मौजूदा कानूनी व्यवस्था में उसका टिक पाना बहुत मुश्किल है। इसलिए केंद्र सरकार का यह कदम महज चुनावी जुमला बनकर न रह जाए।