बजट का शोर बहुत सुन लिया, अब कुछ सच जान लेने का वक्त है
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सबसे पहले बात 5 लाख पर छूट की
जैसे ही गोयल ने 5 लाख तक की आमदनी पर छूट की बात की सदन मोदी-मोदी के नारों से गूंज उठा। गोयल अपना अगला वाक्य पूरा ही नहीं कर पाए। पूरे 103 सेकेंड तक मेज पर थाप और मोदी-मोदी के आलाप के अलावा कुछ सुनाई नहीं दिया। एक घंटे 42 मिनट के भाषण में ये एलान भी डेढ़ घंटा बीत जाने पर हुआ। मानो, आखिरी पलों में गोयल पूरी महफिल लूटकर इसे ही याद के तौर पर छोड़ जाना चाहते हों।पूरा सच क्या है?
प्रफुल्लित आम आदमी को तस्वीर साफ होने के बाद झटका लगा है। साफ हो गया कि 5 लाख तक कमाने वाले की कुल बचत 13 हजार से ज्यादा नहीं होगी। साथ ही 5 लाख से ऊपर वालों को कोई खास फायदा पहुंचने वाला नहीं। जिस 6.5 लाख तक पर छूट का हल्ला है, उसमें पहले डेढ़ लाख आपको निवेश करने होंगे।इसके अलावा ये सिर्फ और सिर्फ प्रस्तावित बदलाव हैं। दो बातें साफ, सीधे, सरल तरीके से समझ लीजिए।
1.नई सरकार इसमें बदलाव करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
2.चूंकि चुनाव अप्रैल-मई में हैं, इसलिए अप्रैल से शुरू हो रहे वित्त वर्ष में पुरानी दरें ही लागू रहेंगी।
तो जो संभावित फायदा है, वो फिलहाल दूर की कौड़ी ही है। लेकिन साल चुनावी हो तो ऐसे एलानों का लालच, बुरी आदतों की तरह छूटता ही नहीं।
जय किसान से कितना फायदा?
करीब 5 एकड़ तक जमीन रखने वाले किसानों के खाते में सीधे 6 हजार रुपये का एलान हो गया। यानी करीब 12 करोड़ किसानों को फायदा। एक परिवार में 4 लोग भी माने जाएं तो करीब 50 करोड़ लोगों तक असर।
अब जरा इस हो-हो से भी दूर आकर देखिए। 6 हजार यानी 500 रुपया महीना। वो भी 2-2 हजार की तीन किस्तों में। कांग्रेस नेता शशि थरूर ने क्या गलत कहा जब उन्होंने इस एलान को लेकर वित्त मंत्री को याद दिलाया कि ये 500 रुपये की रकम किसानों को सम्मान और गरिमा नहीं दिला सकती। मंत्रीजी किस दुनिया में जी रहे हैं?जब इस देश के 11 करोड़ किसान 10 लाख करोड़ के कर्ज तले दबे हों तो ये 500 रुपये हर महीने उनका कैसे भला करेंगे, ये बड़ा सवाल है। बेहतर होता कि किसानों को सशक्त करने के लिए कुछ दूरगामी योजनाओं का एलान होता।
युवा, मंत्रीजी की तरफ तकता रहा लेकिन मिला क्या?
बजट से ठीक एक दिन पहले राहुल गांधी एक ट्वीट करते हैं। लिखते हैं कि अकेले 2017-18 में 6.5 करोड़ युवा बेरोजगार रहे। बेरोजगारी दर 45 साल में सबसे ऊपर है। राहुल ने ये आंकड़े NSSO की रिपोर्ट से लिए हैं। माना जा रहा था कि सरकार के इस बजट से युवाओं को कोई अच्छी खबर मिलेगी। लेकिन, जिन हाथों को सरकार काम नहीं दे सकी, उन्हें उसने इस दफा भी हाथ मलने पर मजबूर कर दिया। EPFO के आंकड़ों के हवाले से 2 करोड़ नौकरियों की बात की गई लेकिन इस आंकड़े का पोस्टमॉर्टम कई बार, कई मंचों पर पहले ही हो चुका है।'उड़ान' योजना के जरिए नई नौकरियां पैदा होने की बात भी पीयूष गोयल ने की। लेकिन जिस दौर में जेट एयरवेज के कर्मचारी वेतन के लिए जूझ रहे हों, पूरा एविएशन सेक्टर सालों से सही मायने में तरक्की की उड़ान भूल चुका हो, तब ऐसे एलान बेमानी ही लगते हैं।
'स्मार्ट सिटी' से 'बेटी बचाओ' तक का क्या हुआ?
उज्ज्वला योजना के तहत 8 करोड़ एलपीजी कनेक्शन बांटने का लक्ष्य पूरा करने की बात तो जरूर हुई लेकिन बेटी बचाओ के बारे में एक शब्द नहीं कहा गया। यही हाल उस स्मार्ट सिटी योजना का हुआ जिसको लेकर 2014 के पहले बजट में सरकार ने बहुत जोर-शोर से घोषणाएं की थीं। उस साल सरकार ने योजना के लिए 7 हजार करोड़ का बजट रखा था लेकिन आवंटन महज 2 फीसदी का हो सका है।
लेकिन क्या सब कुछ इतना बुरा है?
सीधा जवाब है- नहीं। श्रम योगी योजना के तहत असंगठित क्षेत्र के 10 करोड़ लोगों को पेंशन एक अच्छी पहल है। 29 साल की उम्र में अगर आप 100 रुपये महीना जमा करने शुरू करते हैं तो 60 का होने पर हर महीने 3 हजार की पेंशन के हकदार होंगे। वहीं 18 की उम्र में महज 55 रुपये महीने ही देने होंगे।ग्रेच्युटी की सीमा भी 10 से 20 लाख हो चुकी है।
चलते-चलते
नहीं भूलना चाहिए कि सरकार के पास चुनाव में जाने से पहले जनता के लिए घोषणाओं का ये आखिरी मौका था। तो सबको साधने की भरपूर कोशिश हुई है। ये अलग बात है कि संयत होने पर, शोरगुल से बाहर आने पर पूरी तस्वीर कोई बहुत अच्छी नहीं दिखती।और जैसा मशहूर व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई 'अपील का जादू' में लिखते हैं:
प्रधानमंत्री ने कहा- मेरा विश्वास न अर्थशास्त्र में है, न प्रशासकीय कार्यवाही में। यह गांधी का देश है, यहां हृदय परिवर्तन से काम होता है। मैं अपील से उनके दिलों में लोभ की जगह त्याग फिट कर दूंगा। मैं सर्जरी भी जानता हूं।