बांग्लादेश में 'कुर्बानी ईद' पर पशु तस्करी रोकेगी बीएसएफ, सीमा पार 50 हजार का भैंसा बिकता है डेढ़ लाख रुपये में
इस वर्ष 'कुर्बानी ईद' से पहले होने वाली पशु तस्करी के दौरान निरीह पशुओं की जान बचाने के लिए सीमा सुरक्षा बल के प्रहरियों ने अपनी कमर कस ली है। सीमा सुरक्षा बल की मालदा तथा बहरामपुर सेक्टर में तैनात बटालियनों ने अपनी तैयारी पूर्ण कर ली है...
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पशु तस्कर इसी मौके का फायदा उठाने की फिराक में हैं। बीएसएफ ने पशु तस्करी रोकने के लिए कमर कस ली है। हो सकता है कि इस बार डेढ़ लाख रुपये का भैंसा बांग्लादेश न जाए। बीएसएफ ने रात्रि कैमरों, ट्रैक्टरों व स्पीड बोट की तैनाती बढ़ा दी है।
गश्त करने वाले जवानों को नान-लीथल हथियारों का इस्तेमाल करने के निर्देश दिए गए हैं। बॉर्डर के जिस हिस्से पर उपयुक्त फेंसिंग नहीं है, वहां पर अस्थाई फेंसिंग/रुकावटें लगाई गई हैं। जिन स्थानों पर जबरदस्ती पशु तस्करी करने के प्रयास होते हैं, वहां पर ट्रेंच खोदी गई हैं।
50 हजार रुपये का भैंसा बांग्लादेश में डेढ़ लाख रुपये का
बता दें कि पशु तस्करी का धंधा पश्चिम बंगाल में कई वर्षों से पनपता रहा है। वजह, इसके तार बड़े-बड़े लोगों से जुड़े रहे हैं। हालांकि पिछले कई वर्ष से 'सीमा सुरक्षा बल' दक्षिण बंगाल फ्रंटियर-कोलकाता ने पशु तस्करी पर लगभग अंकुश लगा रखा है।विश्वस्त सूत्रों के अनुसार, बांग्लादेश में बॉर्डर के इलाके में 'कैटल हाट' को लाइसेंस देने की प्रक्रिया जल्द पूर्ण होने वाली है। इन 'कैटल हाट' में अधिकतर पशु जो भारत से तस्करी करके लाए जाते हैं, उनका व्यापार होता है। इस वर्ष बांग्लादेश में पशुओं की कीमत काफी बढ़ गई है।
इस समय एक बड़े साइज का भैंसा जो भारत में 50,000 रुपये में उपलब्ध है, उसकी कीमत बांग्लादेश में लगभग 1,50,000 रुपये है। एक बड़े साइज के बैल की कीमत 80,000 रुपये के लगभग है।
पशु तस्कर जो इस नापाक तथा अवैध धंधे में संलिप्त हैं, वे कई सौ करोड़ के मालिक हैं। काले धन के कारण गरीब, अनपढ़ तथा बेरोजगार युवकों को कुछ हजार रुपये का लालच देकर उनकी जान को दांव पर लगा देते हैं।
एक भैंसे को अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कराने के लिए 8-10 हजार रुपये लेते हैं
बॉर्डर पर अपनी जान जोखिम में डालकर भैंसों को सीमा पार कराने वाले युवकों को 'रखाल' बोला जाता है। एक पशु (भैंसे) को अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कराने के लिए एक रखाल को 8-10 हजार रुपये मिलते हैं। इसके लिए ये रखाल अपनी बहुमूल्य जिंदगी को दांव पर लगा देते हैं।
इस अवैध कार्य करने के दौरान अनेक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। युवाओं को बाढ़ के दौरान नदी में डूब जाना, रात को सांप काट लेना, आकाशीय बिजली से मरना, पशुओं के खुरों तले रौंदे जाना, गैंगवार में मारे जाना और बीएसएफ की गोली का निशाना बनना आदि, जोखिम उठाना पड़ता है।
इस वर्ष 'कुर्बानी ईद' से पहले होने वाली पशु तस्करी के दौरान निरीह पशुओं की जान बचाने के लिए सीमा सुरक्षा बल के प्रहरियों ने अपनी कमर कस ली है। सीमा सुरक्षा बल की मालदा तथा बहरामपुर सेक्टर में तैनात बटालियनों ने अपनी तैयारी पूर्ण कर ली है।
कुछ सीमा चौकियों जिसमें नीम तीता, हारूदंगा, मदनघाट, सोवापुर इत्यादि में अतिरिक्त कंपनियां तथा संसाधन तैनात कर दिए गए हैं।
इस वजह से आती है नदी में बाढ़, तस्करों की है ये तरकीब
इन सीमा चौकियों के इलाके से होती हुई गंगा नदी भारत से बांग्लादेश में प्रवेश करती है। जब फरक्का बांध से पानी छोड़ा जाता है तो इस नदी में बाढ़ आ जाती है। इसका फायदा पशु तस्कर उठाते हैं। तस्कर, पशुओं को 8 से 10 किलोमीटर पीछे ही नदी में डाल देते हैं।
नदी में डालने से पहले यह पशुओं की टांगों को रस्सी से बांध देते है, फिर आंखों के ऊपर पट्टी बांधते हैं तथा आखिर में केले के तने के दो टुकड़े करके उसे पशु के दाएं तथा बाएं बांधकर पानी में छोड़ देते हैं।
पशु असहाय अवस्था में पानी के बहाव में बहते-बहते जब सीमा रेखा के नजदीक पहुंचता है, तो बीएसएफ के जवान उन को बचाते हुए बाहर निकाल लेते है। कई बार पशु तस्कर ज्यादा संख्या में पशुओं को नदी में डाल देते है, जिसके कारण सभी पशुओं को बाढ़ में रात के समय बचाना मुश्किल हो जाता है।
इसके चलते कई पशु बांग्लादेश में बह जाते हैं। जब यह बांग्लादेश में पहुंचते हैं वहां पर बांग्लादेशी पशु तस्कर सैकड़ों की तादाद में नदी में अपनी स्पीड बोट से रातभर इन पशुओं को पकड़ते हैं। इस कार्य में कई बार बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश के जवान कथित तौर पर तस्करों की मदद करते हैं।
पशुओं को दिया जाता है ड्रग्स का इंजेक्शन
पशुओं को तस्करी से पहले ड्रग्स का इंजेक्शन दिया जाता है। इससे वह प्रचंड गति से दौड़ता है। कई बार पशुओं की पूंछ काट देते हैं, पशुओं को भगाने के लिए तेज धार वाली लोहे या लकड़ी की छड़ों का इस्तेमाल होता है।
पशुओं को कई-कई दिन भूखा प्यासा रहना पड़ता है। जब पशुओं को उत्तरी भारत के राज्यों से सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा ट्रकों में करने के बाद बंगाल बॉर्डर पर पहुंचते हैं तो ट्रक में ज्यादा पशु लादने के कारण इन्हें कई चोटें लगी होती हैं।
कई बार यह पशुओं पर "सॉकेट बॉम्ब" यानी इंप्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस बांध देते हैं। जब सीमा सुरक्षा बल के जवान इन पशुओं का बचाव करेते हैं तो उन्हें नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। कई बार भारत तथा बांग्लादेश के "रखाल" फेंसिंग के दोनों तरफ 200-300 तक की तादाद में 400-500 पशुओं को जबरदस्ती दौड़ा कर तस्करी करने का प्रयास करते हैं।
बीएसएफ के जवानों की संख्या 2-4 तक होती है। यह जवानों पर धारदार हथियारों से, डंडों से तथा पत्थर-ईटों से हमला कर देते हैं। कई बार देसी बॉम्ब तथा पिस्टलों से भी फायर करते हैं। 2020 में अभी तक दक्षिण बंगाल फ्रंटियर के 16 जवान ट्रांस-बॉर्डर अपराधियों के साथ मुठभेड़ में घायल हो चुके हैं।
रात के समय जब सीमा सुरक्षा बल के बहादुर जवान पशु तस्करी को रोकने की कोशिश करते हैं तो जब उनकी जान को खतरा होता है। वे तस्करों को ललकारते हैं।फिर भी अगर वो आगे बढ़कर जवानों पर हमला करते हैं तो उन्हें मजबूरन गोली मारनी पड़ती है।
बीएसएफ अपने जवानों की हिफाजत करेगी: आईजी अश्वनी कुमार
सीमा सुरक्षा बल के नए महानिरीक्षक अश्वनी कुमार सिंह ने जवानों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि उन्हें सीमा सुरक्षा बल के जवान की ऐसी कोई दुर्घटना मंजूर नहीं है, जिसमें उसकी जान चली जाए या गंभीर चोट लग जाए।
बॉर्डर पर ट्रांस-बॉर्डर अपराधों को हर हाल में रोका जाएगा और यदि अपराधी कानून को हाथ में लेते हैं तो उनके साथ कानून के अंतर्गत सख्त कार्यवाही की जाए। जहां जवानों को अपनी जान सलामती के लिए फायर करना आवश्यक होगा, वहां पर उपयुक्त तथा कारगर फायर किया जाएगा। नॉन-लीथल हथियारों का इस्तेमाल जरूरत के मुताबिक किया जाएगा।