BJP: चुप क्यों हैं मोदी के सबसे सफल कमांडर, क्या राजनीतिक संन्यास की तैयारी में हैं गडकरी?
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विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में अनेक कद्दावर नेता मौजूद हैं, लेकिन जब सरकार की उपलब्धियां गिनाने की बात आती है, तो सबसे पहले नितिन गडकरी का नाम आता है। स्वयं प्रधानमंत्री मोदी अनेक अवसरों पर यह बात गर्व से जनता को बताते हैं कि उनके शासनकाल में प्रतिदिन 36 किमी तक सड़कों का निर्माण हो रहा है। इस निर्माण से न केवल देश में सड़कों की स्थिति में सुधार हुआ है, बल्कि अर्थव्यवस्था को तेज गति देने में भी मदद मिली है। आर्थिक मामलों के जानकार मानते हैं कि यदि भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना है, तो विकास की यह गति बनाए रखनी होगी।
लेकिन आश्चर्यजनक रूप से केंद्र सरकार को यह मजबूती देने वाले नितिन गडकरी फिलहाल चुप-चुप नजर आ रहे हैं। उनकी चुप्पी को लेकर तमाम कयासबाजी हो रही है। कहा जा रहा है कि अपनी राजनीतिक उपेक्षा से निराश गडकरी फिलहाल चुपचाप अपना काम पर ध्यान दे रहे हैं। लेकिन केंद्र या महाराष्ट्र में अपनी इच्छा के अनुसार राजनीति न कर पाने के कारण दुखी हैं।
संघ ने भी दी मोदी को प्रमुखता
कहा जाता है कि संघ ने भी अपनी योजनाओं को आगे बढ़ाने में पीएम नरेंद्र मोदी को ज्यादा उपयुक्त पाते हुए उनके पीछे डटकर खड़ा हो गया है। इससे नितिन गडकरी संगठन में राजनीतिक तौर पर काफी कमजोर हो गए हैं। पिछले साल जब अगस्त 2022 में गडकरी को भाजपा की सबसे ताकतवर संस्था संसदीय बोर्ड से हटाया गया था, तब भी यही चर्चा थी कि उनको हटाए जाने को लेकर संघ की सहमति थी।
ऐसा नहीं है कि नितिन गडकरी पर अब संघ को विश्वास नहीं है। लेकिन जिस तरह उसकी योजनाओं को आगे बढ़ाने में मोदी ने अपनी योग्यता साबित की है, स्वाभाविक रूप से नितिन गडकरी पीछे छूट गए हैं। संघ और भाजपा के जानकार मानते हैं कि गडकरी अभी भी आरएसएस के करीबी नेताओं में माने जाते हैं। उन पर संघ के बड़े नेताओं का आशीर्वाद है। लेकिन समय की मांग को देखते हुए नागपुर ने भी उन्हें पिछली सीट पर बैठने का संकेत दे दिया है।
राजनीतिक गलियारों में यह मानने वाले लोग भी मौजूद हैं कि संभवतः केंद्र की राजनीति में यह उनकी अंतिम पारी हो। इसके पीछे उनकी अपनी अनिच्छा का हवाला दिया जाता है। लेकिन केवल 66 साल के नितिन गडकरी राजनीतिक संन्यास के बारे में क्यों सोचेंगे? पिछले दिनों उनके अपने बयानों के बाद इस तरह की चर्चाओं को उन्होंने स्वयं खारिज कर दिया था।
कभी वे भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार माने जाते थे। पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर भी उनकी पारी काफी सराहनीय रही थी और उनके कार्यकाल में पार्टी ने काफी प्रगति की थी। लेकिन अपने चुटीले बयानों के कारण सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाले गडकरी फिलहाल बैकसीट लेते हुए दिखाई दे रहे हैं।
'भाजपा की राजनीतिक स्टाइल'
राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडेय ने अमर उजाला से कहा कि इसे भाजपा के काम करने की स्टाइल के रूप में देखना चाहिए। भाजपा में हमेशा से एक-दो नेता सेंटर में होते हैं, जबकि शेष नेता उनके सहयोगी के रूप में उसे ब्रांड बनाने के लिए काम करते हैं। अटल-आडवाणी के युग से लेकर वर्तमान में भाजपा इसी रणनीति पर चलकर अपने नेताओं की ब्रांडिंग करती रही है।
यदि प्रदेश की राजनीति को देखें तो भी यूपी में योगी आदित्यनाथ के सामने दूसरे नेताओं को बैकसीट पर ला दिया गया है, तो मध्यप्रदेश में कई कद्दावर नेताओं के बाद भी पूरा फोकस शिवराज सिंह चौहान पर रखा गया है। इसी प्रकार महाराष्ट्र में बड़े नेताओं के होने के बाद भी पूरा फोकस फडणवीस पर कर दिया गया है।
उन्होंने कहा कि भाजपा अपने एक-दो नेता को ब्रांड के रूप में विकसित कर उसकी लोकप्रियता का पूरा लाभ संगठन को मजबूत करने में लगाती है। नितिन गडकरी को अपेक्षाकृत कमजोर भूमिका को इसी रूप में देखा जाना चाहिए।
दूसरी बात, नितिन गडकरी पर संघ का आशीर्वाद अभी भी बना हुआ है। ऐसे में पीएम नरेंद्र मोदी के लिए भी उन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। लेकिन समझना यह भी चाहिए कि प्रधानमंत्री अपने सबसे मजबूत हाथ को कमजोर क्यों करना चाहेंगे। वे स्वयं बार-बार परिवहन मंत्रालय की उपलब्धियों को बार-बार उठाते हैं। अच्छे लोगों को संगठन में लाकर बेहतर प्रदर्शन कराना प्रधानमंत्री मोदी की विशेषता है। अश्विनी वैष्णव, आरके सिंह, हरदीप सिंह पुरी और एस. जयशंकर जैसे नेताओं को केवल इसीलिए लाया गया क्योंकि पीएम नरेंद्र मोदी उनके काम करने की क्षमता को बहुत पसंद करते थे। ऐसे में उन्हें नहीं लगता कि प्रधानमंत्री अपने उस हाथ को कमजोर करना चाहेंगे जो सबसे बेहतर प्रदर्शन कर रहा हो।
अपने लिए कठिन चुनौती तैयार कर रहे गडकरी
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने स्वयं अपने लिए ही नया पैमाना निर्धारित किया है। उनका लक्ष्य है कि वर्ष 2024 में प्रतिदिन सड़क निर्माण का औसत बढ़ाकर 45 किलोमीटर तक कर दिया जाए। यदि यह लक्ष्य हासिल किया जा सका तो देश में प्रतिवर्ष 16,000 किलोमीटर से ज्यादा सड़कों का निर्माण होगा। यह वैश्विक स्तर पर एक रिकॉर्ड होगा।
वर्ष 2020-21 के कोरोना काल में सड़क निर्माण की गति रिकॉर्ड 36.4 किमी प्रतिदिन तक पहुंच गई थी। इस वर्ष गत वर्ष की भांति यह 29 किमी प्रतिदिन तक रह सकती है। इस तरह काम करने की क्षमता को लगभग 1.5 गुना तक बढ़ा पाना आसान नहीं है, लेकिन नितिन गडकरी ऐसे ही कठिन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जाने जाते हैं।
अर्थशास्त्र के अनेक विद्वान मानते हैं कि मूलभूत ढांचे में किया जा रहा यह निवेश ही कोरोना काल में भी भारतीय अर्थव्यवस्था को गति देने में सहायक सिद्ध हुआ था। इस समय भी बाजार में मांग पैदा करने में इस सेक्टर का सबसे ज्यादा योगदान है। यानी केंद्र सरकार अर्थव्यवस्था को जिस तेज गति से हासिल करना चाहती है, उसके लिए सड़क निर्माण सबसे अहम होगा। यह न केवल 30 आधारभूत उद्योगों में मांग पैदा करेगा, बल्कि सड़कों का जाल बढ़ने के कारण दूसरे उद्योगों को बढ़ाने वाला भी साबित होगा।