यूपीः इन हालात में क्या खिल पाएगा कमल?
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दिल्ली के बाद बिहार में मायूसी मिलने के बाद भाजपा की सारी आस अगर कहीं टिकी है तो वह है उत्तर प्रदेश। आबादी के हिसाब से देश के सबसे बड़े सूबे की अहमियत भाजपा के लिए इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि पार्टी अगर यहां उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन करने में सफल रहती है तभी उसे अगले लोकसभा चुनावों के लिए हौसला मिल सकेगा।
लेकिन पार्टी की मौजूदा तैयारियों पर गौर करें तो कहीं से ऐसा नजर नहीं आता कि पार्टी विधानसभा चुनावों की तैयारियों को लेकर गंभीर है, जबकि राज्य के दूसरे दलों ने अपनी अपनी जमीन मजबूत करने की तैयारी कर ली है। बसपा लगभग अपने सभी उम्मीदवारों की घोषणा काफी पहले ही कर चुकी है तो सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी ने भी एक दिन पहले 143 उम्मीदवारों की सूची जारी कर टॉप गेयर में आने की तैयारी कर ली है।
वजह भी साफ है चुनावों में एक साल से भी कम का समय रह गया है। ऐसे में क्या कारण है जो भाजपा लगातार विरोधियों के मुकाबले चुनावी तैयारियों में पिछड़ती जा रही है। पड़ताल करते हैं उन कारणों की।
प्रदेश अध्यक्ष के नाम पर एक राय नहीं
प्रदेश में भाजपा सबसे ज्यादा उलझन में प्रदेश अध्यक्ष को लेकर है, उलझन इतनी ज्यादा है कि चार महीने से चल रही माथापच्ची के बाद भी अभी तक मुखिया के नाम पर एकराय नहीं बन सकी है। पार्टी अभी तक यही तय नहीं कर पाई है कि अध्यक्ष के चेहरे पर किसी अगड़े को जगह दी जाए या पिछड़े को या फिर लीक से हटकर किसी दलित को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाए। कभी केन्द्रीय मंत्री महेश शर्मा का नाम चलता है तो कभी लखनऊ के मेयर डा. दिनेश शर्मा का।
दलित चेहरे के तौर पर मानव संसाधन राज्यमंत्री डा. रामशंकर कठेरिया का नाम सामने आता है तो उनकी बॉस और केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के नाम पर भी अटकलें लगाई जा रही हैं। संगठन मंत्री स्वतंत्र देव सिंह और युवा चेहरे के तौर पर महंत आदित्यनाथ और सुल्तानपुर से सांसद वरुण गांधी के नाम पर भी कई बार चर्चा हो चुकी है, लेकिन मुसीबत यही है कि किसी एक नाम पर भी सहमति नहीं बन सकी है।
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रदेश प्रभारी ओम माथुर भी कई बार एक साथ बैठक करके किसी एक नाम पर सहमत नहीं हो सके हैं। दिक्कत ये है कि जब तक पार्टी अध्यक्ष का नाम तय नहीं करेगी तब तक उसका चुनावी मोड में आना भी संभव नहीं दिखता। बिना नेतृत्व के मैदान में उतरना तो किसी भी पार्टी के लिए संभव नहीं है।
संगठन स्तर पर भी काम अधूरा
पार्टी की मुसीबत प्रदेश अध्यक्ष को लेकर ही नहीं है, संगठन स्तर पर भी काम अधूरा पड़ा है। जब तक प्रदेश अध्यक्ष का नाम तय नहीं हो जाता तब तक संगठन का काम भी परवान चढ़ना मुश्किल दिखता है। प्रदेश में सदस्यता अभियान 13 नवंबर 2014 को शुरू हुआ था। तब से 17 महीने गुजर गए।
सपा और बसपा उम्मीदवारों की तलाश और संगठन स्तर का काम काफी हद तक निपटा चुके हैं, पर भाजपा नेता 17 जिलों में भी पूरा संगठन नहीं खड़ा कर पाए। 58 जिला-महानगरों में ही अध्यक्ष बन पाए हैं। शेष 32 में अध्यक्ष बनना बाकी है। यह हालत तब है जब इस बार चुनाव न कराके जिलों में नामांकन करने वाले सभी दावेदारों के नाम मंगाकर दिल्ली से तय करके भेजे गए हैं।
जिला समितियों के लिए भी अब तक घोषित अध्यक्षों से नामों की सूची मंगा ली गई है लेकिन समितियों की घोषणा नहीं हो पा रही है। काफी समय पहले जोर-शोर के साथ शुरू किया गया सदस्यता अभियान भी अब ठंडा पड़ता नजर आ रहा है तो बूथ स्तर पर भी पार्टी की कोई खास तैयारी नजर नहीं आती।
मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर असमंजस
लोकसभा चुनावों में भाजपा ने प्रधानमंत्री के चेहरे के तौर पर नरेन्द्र मोदी का नाम आगे करके पूरा चुनाव लड़ा था जिससे उसे जोरदार सफलता भी मिली। पार्टी ने इसे आगामी विधानसभा चुनावों में भी भुनाया और बजाय मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने के मोदी के नाम पर ही चुनाव लड़े गए। चार चुनावों में सफलता भी मिली लेकिन दिल्ली में आकर पार्टी ने अपनी रणनीति में एकाएक बदलाव कर दिया।
यहां केजरीवाल के सामने उनकी पुरानी साथी किरण बेदी को सीएम उम्मीदवार घोषित किया गया, लेकिन पार्टी यहां चारों खाने चित हो गई। बिहार चुनावों में रणनीति में फिर बदलाव किया और बिना मुख्यमंत्री के चेहरे के मोदी के नाम पर ही पुराना दांव लगाया गया लेकिन यहां भी दाल नहीं गल सकी।
नतीजतन इस मुद्दे पर आकर भाजपा उत्तर प्रदेश में फंस गई। पार्टी लाख प्रयास के बाद भी बसपा सुप्रीमो मायावती और अखिलेश यादव की टक्कर का नाम ढूंढने में सफल नहीं हो सकी है, तो मोदी के चेहरे का वो पुराना आकर्षण भी अब घटता दिख रहा है, जिससे वोटरों को बूथ तक खींचा जा सके। यही कारण है कि इस संबंध में पूछने पर वरिष्ठ नेता गोल मोल जवाब ही देते हैं।
यही नहीं विरोधी भी इस मुद्दे पर चुटकी लेने से नहीं चूकते। सपा नेता और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तो बीते दिनों यह कहकर चुटकी भी ली थी कि अभी तो उनके दूल्हे का ही पता नहीं है कौन होगा।
नहीं हुई अभी तक उम्मीदवारों की घोषणा
तैयारियों के मामले में पार्टी के पिछड़ने की एक बड़ी वजह अभी तक उम्मीदवारों के नामों की घोषणा न होना भी है। हालांकि यह पार्टी का पुराना रवैया है कि वह ऐन टाइम पर ही अपने उम्मीदवारों की घोषणा करती है। लेकिन हर समय एक ही रणनीति भी कारगर नहीं हो सकती, वो भी तब जब राज्य में पार्टी की स्थिति बहुत मजबूत न दिख रही हो।
पिछले विधानसभा चुनावों में भी पार्टी ने ऐन वक्त पर उम्मीदवारों की घोषणा की थी जिसका खामियाजा ये हुआ कि घोषित उम्मीदवारों को लेकर जमकर गुटबाजी हुई थी। सिर फुटौव्वल बढ़ती देख पार्टी को आनन फानन में कई उम्मीदवार बदलने पड़े थे। लेकिन भारी मतभेदों के बीच चुनाव में उतरी पार्टी को इसका खामियाजा उठाना पड़ा और पार्टी 50 के आसपास सिमटकर रह गई। जबकि काफी समय पहले ही उम्मीदवार घोषित करने वाली बसपा और सपा ने बेहतर प्रदर्शन कर उसे पछाड़ दिया।
इस बार भी पार्टी यही चूक करती दिख रही है, क्योंकि अभी तक तो चुनाव प्रचार समिति और प्रदेश अध्यक्ष के नाम पर ही मुहर नहीं लग सकी है। समय से उम्मीदवारों की घोषणा करने से उन्हें भी चुनाव प्रचार के लिए पर्याप्त समय तो मिल ही जाता है क्षेत्र और जनता में भी पकड़ बनाने में आसानी होती है लेकिन शायद गलतियों से सीखने वाली पार्टी का नाम ही भाजपा है।