अम्मा के बाद अन्नाद्रमुक की मजबूरी होगी भाजपा से नजदीकी!
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तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता के निधन के बाद प्रदेश की राजनीति में बहुत बड़ी रिक्तता आ गई है। लेकिन यह देखना ज्यादा दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक में किस तरह का राजनीतिक बदलाव आता है।
पेचीदा सवाल यह है कि क्या अन्नाद्रमुक का झुकाव भाजपा की तरफ बढ़ेगा, जैसा कि राज्य के राजनीतिक पंडितों का एक वर्ग कयास लगाने लगा है। प्रदेश की 234 सदस्यीय विधानसभा में अन्नाद्रमुक के 150 से अधिक विधायक हैं। लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण संसद में उसकी ताकत है जो केंद्र की किसी भी सत्तारूढ़ व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। लोकसभा में अन्नाद्रमुक के 37 सांसद हैं जबकि राज्यसभा में 13 सांसद हैं।
अन्नाद्रमुक के ये 50 सांसद आने वाले दिनों मोदी सरकार के लिए बहुत उपयोगी संसाधन बन सकते हैं, खासकर जुलाई 2017 में जब राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति का चुनाव होगा। इसके अलावा ये सांसद संसद के दोनों सदनों में कुछ अहम विधेयकों को पारित कराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। लिहाजा मोदी की जरूरतें स्पष्ट हैं। लेकिन अन्नाद्रमुक की केंद्र से क्या अपेक्षाएं हैं और अपनी करिश्माई नेता के अवसान के बाद वह राज्य की जरूरतें कैसे पूरी करेगी?
तमिलनाडु, केंद्र पर निर्भर
आर्थिक तौर पर तमिलनाडु केंद्र पर बहुत ज्यादा निर्भर है। इस प्रदेश पर 4 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है और केंद्र की मदद से ही यहां अम्मा के नाम पर जगह-जगह कल्याणकारी योजनाएं चल रही हैं। राज्य में जीएसटी लागू होने और राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए सातवां वेतन आयोग लागू करने से राज्य के खजाने पर बहुत बड़ा बोझ पड़ने वाला है। जयललिता के अस्पताल में भर्ती होने के बाद यानी 22 सितंबर से राज्य की राजनीतिक एवं प्रशासनिक गतिविधियां लगभग थमी हुई हैं।
प्रदेश सरकार ने उदय पावर योजना, 1 नवंबर 2016 से खाद्य सुरक्षा कानून और एनईईटी परीक्षा योजना स्वीकार कर ली हैं। इन योजनाओं का जयललिता अस्वस्थ रहने से पहले तक पुरजोर करती रही थीं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जयललिता के बाद अन्नाद्रमुक मोदी सरकार के फैसलों का उस तरीके से विरोध नहीं कर पाएगी जिस तरह उसकी करिश्माई नेता करती आ रही थीं। इसके पीछे कई ठोस कारण हैं। सरकार चलाने के लिए आपको केंद्र के सहयोग की जरूरत होगी। दूसरा, इसके 90 प्रतिशत से अधिक सांसद राजनीति में नौसिखिये हैं। लिहाजा केंद्र और राज्य दोनों जगहों पर उनके शिकार के लिए तैयार बैठे ‘राजनीतिक भेड़ियों’ से उन्हें बचा पाना मुश्किल हो जाएगा।
तीसरा, राज्य सरकार को अभी साढ़े चार साल शासन करना है जबकि केंद्र की भाजपा सरकार का कार्यकाल ढाई साल बचा हुआ है। राज्य को तभी ज्यादा से ज्यादा लाभ मिल सकता है जब इस क्षेत्रीय पार्टी द्वारा केंद्र के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार को प्राथमिकता दी जाए। चौथा कारण, बेहिसाब संपत्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट से फैसला आना अभी बाकी है। शीर्ष अदालत ने इसी साल जून में अपना फैसला बदल दिया था। इस मामले में चार दोषी ठहराए गए हैं। जयललिता के अलावा शशिकला, उनके रिश्तेदार इलावारसी और जयललिता के दत्तक पुत्र वीएन सुधाकरण दोषी हैं।
किसी भी प्रतिकूल फैसले की स्थिति में अन्नाद्रमुक को ही सबसे ज्यादा नुकसान होगा और जब केंद्र में इतनी ताकतवर सरकार हो तो कोई भी समझ सकता है कि जयललिता के बगैर अन्नाद्रमुक क्या रुख अख्तियार कर सकती है। जयललिता की रिक्तता को लेकर जहां तक भाजपा का सवाल है तो यह उसके लिए एक राजनीतिक कृपा है। प्रदेश में इस भगवा पार्टी का वोट प्रतिशत आज महज 2 प्रतिशत है और ऐसे समय में वह राजनीतिक जमीन तलाशने के लिए कई तरीके से आक्रमण कर सकती है और यथासंभव अपना जनाधार बढ़ा सकती है।
इसमें वह कितना सफल होती है, यह अलग सवाल है लेकिन आने वाले महीनों और वर्षों में उसके लिए तमिलनाडु में अधिकतम वोट आधार जुटाने का सुनहरा अवसर होगा। भाजपा कोयंबटूर, तिरुपुर, कन्याकुमारी जैसे क्षेत्रों में विशेष तौर पर पहले से सुनियोजित रणनीतियों के तहत काम कर रही है। इसी परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रदेश इकाई स्वर्गीय एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) की जन्मशती मनाने जा रही है जो जनवरी 2017 को है।
एमजीआर की विरासत हथियाने की कोशिश में संघ
दरअसल संघ एमजीआर की विरासत हथियाने की कोशिश में है। चेन्नई स्थित राजाजी हॉल में जब जयललिता का पार्थिव शरीर आम जनता के दर्शनार्थ रखा गया था तो दो दिलचस्प चीजें देखने को मिलीं।
सुबह के वक्त केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री एम. वेंकैया नायडू पार्थिव शरीर के निचले हिस्से में बाईं तरफ कुर्सी पर कई घंटे तक चुपचाप बैठे रहे। यह एक प्रकार की सांकेतिक मुद्रा हो सकती है। दूसरा दृश्य दोपहर को देखने को मिला जो काफी कुछ बयां करता है।
प्रधानमंत्री मोदी जब श्रद्धांजलि देने पहुंचे तो उन्होंने अपना दायां हाथ शशिकला के सिर पर रखते हुए उन्हें आशीर्वाद दिया। इसी दौरान मुख्यमंत्री ओ. पनीरसेल्वम मोदी को गला लगाते हुए रोने लगे। यह एक राजनीतिक आलिंगन भी हो सकता है। कौन जानता है?