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कानों देखी: राजनीति के मास्टर ब्लास्टर हैं नीतीश कुमार
Sun, 27 Sep 2020 11:34 PM IST
योगेश साहू
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: योगेश साहू
Updated Sun, 27 Sep 2020 11:34 PM IST
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नीतीश कुमार (फाइल फोटो)
- फोटो : पीटीआई
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बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार ने तमाम बसंत देखे हैं। 15 साल उन्होंने खुद को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर जमाए रखा और राजनीति के पंडितों की मानें तो राजनीतिक कुशलता के चलते अभी वह आगे लंबा राज करने वाले हैं। उनके सहयोगी और राज्य के मंत्री की मानें तो नीतीश कुमार की आदमी की पहचान करने की क्षमता बहुत अच्छी है। वह पलक झपकते ही अपने करीबियों को भांप लेते हैं।
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उन्हें यह भी पता होता है कि कब किसे निबटाना है और किसे कैसे करीब लाना है। राजगीर के उनके अनुयाई और जद(यू) के विधायक की मानें तो भाजपा से संबंध तोड़ना, सुशील कुमार मोदी से जोड़े रखना और फिर भाजपा (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) के करीब आना कोई नीतीश कुमार से सीख ले। खगड़िया के एक नेता की सुनिए। नीतीश की तारीफ में कहते हैं कि कभी नीतीश लालू की आंख के तारे (90 के दशक) थे।
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फिर जार्ज के साथ गए। जार्ज के बाद शरद यादव और फिर लालू प्रसाद यादव से गले मिले और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हैं। बताते हैं कि जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाना, पद से उतारना और फिर पुचकार कर साथ जोड़ लेना केवल नीतीश को आता है। अपने इसी कौशल से उन्होंने लोजपा और रालोसपा को बिहार में कटी पतंग सा बना दिया है।
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तेजस्वी का बाहुबली प्रेम
तेजस्वी का बाहुबली प्रेम राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को भी अखरने लगा है। कभी तेजस्वी के इसी प्रेम ने लालू प्रसाद यादव के 32 साल पुराने साथी रघुवंश बाबू को भी नाराज कर दिया था। पार्टी के प्रदेश महासचिव मोहम्मद फिरोज हुसैन ने भी पार्टी छोड़ने की घोषणा कर दी है। रालोसपा के उपेंद्र कुशवाहा के साथ भी तेजस्वी की नाक की लड़ाई जगजाहिर है।
बताते हैं कि तेजस्वी लोकसभा चुनाव के बाद से ही कुशवाहा को कोई भाव नहीं दे रहे हैं। वहीं रामा सिंह जैसे बाहुबली नेता काफी तेजी से तेजस्वी के नजदीक आ रहे हैं। बताते हैं कि तेजस्वी और तेजप्रताप की ताल में राजद की ताल गड़बड़ा रही है। सीटों के बंटवारे को लेकर भी तेजस्वी अपना होमवर्क पूरा नहीं कर पाए हैं। हालांकि सीटों के बंटवारे को अंतिम रूप लालू प्रसाद यादव की अनुमति के बाद दिया जाना है, लेकिन पार्टी नेता के रुख को लेकर कांग्रेस के नेता भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रहे हैं।
योगी का कोई सानी नहीं
भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कोई सानी नहीं है। सफलता के मामले में योगी ने सभी मुख्यमंत्रियों का रिकार्ड तोड़ दिया है। भाजपा मुख्यालय से लेकर केंद्रीय सचिवालय तक के सूत्र भी बताते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा तीनों का योगी को भरपूर विश्वास हासिल है।
सूबे में राजनीति के मामले में भी योगी ने सबको पीछे छोड़ दिया है। उत्तर प्रदेश के भाजपा के एक बड़े नेता ने भी माना कि केंद्र की तरफ राज्य में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पूरी तरह से सफल हैं। प्रयागराज से संघ के नेता ज्ञानेश्वर शुक्ला कहते हैं कि जब से वह मुख्यमंत्री बने हैं सपा, बसपा, कांग्रेस तीनों दलों का ग्राफ लगातार नीचे गया है। अब वह आरएसएस का भी विश्वास हासिल करने वाले मुख्यमंत्रियों में शीर्ष पर हैं।
कमलनाथ देंगे ज्योतिरादित्य सिंधिया को जवाब
मध्यप्रदेश में उपचुनाव होना है। 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव में भाजपा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की साख दांव पर है। ज्योतिरादित्य भी इसकी संवेदनशीलता को समझ रहे हैं। उनके साथ भाजपा में गईं इमरती देवी की टीम भी है, जो यह समझ रही है। भिंड के विजय सिंह कहते हैं कि इमरती देवी, तुलसी सिवाट, प्रद्युम्न सिंह कुछ ज्यादा समझ रहे हैं, लेकिन लड़ाई बहुत आसान नहीं है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता केपी सिंह कहना है कि महाराज अब क्षेत्र में दौड़ रहे हैं। उन्हें पता चल रहा है। बताते हैं ग्वालियर चंबल संभाग की 16 सीटों पर विधानसभा चुनाव होना है। यह सिंधिया के प्रभाव वाले क्षेत्र की हैं। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ इसका उन्हें भरपूर जवाब दे रहे हैं। बताते हैं कि कमलनाथ बस भाजपा के नेताओं की नाराजगी भुना लें तो महाराज की राजनीतिक ताकत का सबको पता चल जाएगा।
सचिन पायलट ढूंढ रहे हैं जयपुर का रास्ता
राजस्थान के पूर्व उप मुख्यमंत्री और राज्य में कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष सचिन पायलट इन दिनों जयपुर का रास्ता ढूंढ रहे हैं। पायलट पहले सड़क के रास्ते से तीन-चार घंटे में दिल्ली से जयपुर पहुंच जाते थे, लेकिन केवल विधायक बन जाने के बाद उनका सफर खत्म होता नहीं दिखाई दे रहा है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने सचिन पायलट को काफी भरोसा दे रखा है।
मध्यप्रदेश विधानसभा सभा का उपचुनाव भी आ गया है। प्रचार तो करना ही है, लेकिन अभी अशोक गहलोत की मजबूत पकड़ में पायलट थोड़ा कंफ्यूज से होने लगे हैं। उनके समर्थकों की भी बेचैनी बढ़ रही है। पायलट की दुविधा भी बढ़ रही है। मिली सूचना के मुताबिक कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में वरिष्ठ नेताओं के घमासान, कई पर कतरे जाने, राहुल के नजदीकियों को आगे बढ़ाने की शुरुआत के बाद से सचिन पायलट की उम्मीदें बढ़ गई हैं, लेकिन उम्मीद तो उम्मीद है। जाने कब मूर्त रूप लेगी।