{"_id":"61593ca98ebc3e09852caf08","slug":"bhawanipur-by-election-result-what-does-this-victory-mean-for-mamta-banerjee-understand-in-five-points","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"Bhawanipur By-Election Result: ममता के लिए इस जीत के क्या मायने हैं, पांच बिंदुओं में समझिए","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Bhawanipur By-Election Result: ममता के लिए इस जीत के क्या मायने हैं, पांच बिंदुओं में समझिए
Sun, 03 Oct 2021 02:51 PM IST
प्रतिभा ज्योति
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Sun, 03 Oct 2021 02:51 PM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
ममता बनर्जी
- फोटो :
Twitter : @AITCofficial
विस्तार
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भवानीपुर उपचुनाव जीत गई हैं। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार प्रियंका टिबरेबाल को शिकस्त दी है। इसके साथ ही ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री पद पर रहने का रास्ता साफ हो गया है। सांविधानिक बाध्यता के कारण उन्हें पांच नवंबर से पहले किसी एक विधानसभा सीट से चुनाव जीतना अनिवार्य था। यह चुनाव केवल पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए नहीं था बल्कि इसकी चुनौती इससे कहीं ज्यादा बड़ी थी।राजनीति के जानकार इस जीत के कई मायने निकाल रहे हैं। कहा जा रहा है कि ममता की जीत की यह लहर पश्चिम बंगाल की सीमा से बाहर निकलकर 2024 के लोकसभा चुनाव को छूने के लिए है। इससे देश की राष्ट्रीय राजनीति के भी प्रभावित होने की पूरी संभावना है और अब ममता बनर्जी खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ खुद को प्रमुख दावेदार के तौर पर पेश कर सकती हैं।
पहले यह समझिए कि भवानीपुर उपचुनाव की अहमियत क्या थी?
भवानीपुर का उपचुनाव कई मायनों में अहम था। अप्रैल मई में हुए विधानसभा चुनाव में अपने पूर्व सहयोगी और भारतीय जनता पार्टी के नेता शुभेंदु अधिकारी से नंद्रीग्राम सीट हारने के बाद ममता के लिए यह वजूद की लड़ाई थी। दूसरी तरफ यह चुनाव ममता और भाजपा के बीच एक तरह की प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गई थी। ममता के लिए मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए यह चुनाव जीतना बहुत जरूरी था। वहीं भाजपा की कोशिश थी कि यहां भी ममता को मात देकर उनके बढ़ते सियासी कद को छोटा किया जाए।
साल 2011 से 2019 के बीच जो चुनाव हुए, उसमें भाजपा लगातार यहां मजबूत होती और टीएमसी का वोट शेयर घटता गया। 2011 में ममता यहां 54 हजार वोटों के अंतर से जीती थीं, लेकिन 2016 में यह कम होकर 25 हजार पर आ गया। वहीं 2011 में भाजपा को इस सीट पर केवल 5078 वोट मिले थे, लेकिन 2014 में पार्टी को 47 हजार वोट मिले थे। इस बार तृणमूल कांग्रेस ने इस बार वोट शेयर बढ़ाने के लिए खास रणनीति तैयार की थी।
यह भी पढ़ें: भवानीपुर उपचुनाव: क्या यह 2024 की तैयारी है, क्यों है ममता के आत्मविश्वास में और इजाफा होने के आसार
ममता बनर्जी
- फोटो :
पीटीआई
हाल ही में संपन्न हुए चुनाव में इस निर्वाचन क्षेत्र से टीएमस के शोभनदेव चट्टोपाध्याय 28,000 मतों के साथ निर्वाचित हुए थे। शोभनदेव ने ममता के लिए यह सीट खाली की थी। इस बार टीएमसी की कोशिश मुख्यमंत्री के लिए जीत हासिल करने की थी। इसलिए पार्टी के सारे वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ताओं की पूरी फौज इस चुनाव में उतार दी गई थी। ममता के भरोसेमंद सहयोगियों, जैसे सुब्रत बख्शी, फिरहाद हकीम, सुब्रत मुखर्जी, पार्थ चटर्जी, शोभनदेव चट्टोपाध्याय, देबाशीष कुमार, अरूप बिस्वास और मदन मित्रा के साथ-साथ उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी ने हफ्तों तक चुनाव अभियान में लगे रहे।
मिली जानकारी के मुताबिक पार्टी ने हर वार्ड में हर घर तक पहुंचने की रणनीति पर काम किया है। एक-एक कार्यकर्ता पांच घरों तक पहुंचे और यह सुनिश्चित किया कि उन सभी पांच घरों के लोग मतदान केंद्र पर जरूर आएं। वहीं ममता बनर्जी ने निर्वाचन क्षेत्र में गैर-बंगाली समुदाय के साथ हुए एक विशेष सत्र में शामिल हुईं जो जो उनकी नई अभियान रणनीति का हिस्सा थी। बनर्जी ने सभी समुदायों के लोगों से उनकी भाषा में अभिवादन किया और सभी समुदायों के प्रति धार्मिक सहिष्णुता की बात करती रहीं।
जनता मान कर चल रही थी दीदी जीत जाएंगी
टीएमसी के एक नेता ने बताया भवानीपुर जैसे निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं में आत्मसंतुष्टि की भावना रहती है, जहां वे यह मान कर चलते हैं दीदी (ममता बनर्जी) जीतेंगी। इसलिए उनमें वोटिंग से दूर रहने की प्रवृत्ति है, इस बार भी वे ऐसा ही सोच सकते थे तो चुनाव नतीजे बदल सकते थे।'
वरिष्ठ पत्रकार जयंतो घोषाल बताते हैं यह चुनाव केवल मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए नहीं था, यह 2024 की तैयारी और लड़ाई है। ममता अब केंद्र की राजनीति में अपनी प्रमुख दावेदारी पेश कर सकती हैं। हालांकि, अन्य राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बनर्जी ने भवानीपुर में होने वाले उपचुनाव को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया। संभवतः, वह राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में बने रहने के लिए केवल विधानसभा के लिए चुने जाने के अलावा कुछ बड़ा हासिल करने के लिए इसका इस्तेमाल कर रही थीं।
मिली जानकारी के मुताबिक पार्टी ने हर वार्ड में हर घर तक पहुंचने की रणनीति पर काम किया है। एक-एक कार्यकर्ता पांच घरों तक पहुंचे और यह सुनिश्चित किया कि उन सभी पांच घरों के लोग मतदान केंद्र पर जरूर आएं। वहीं ममता बनर्जी ने निर्वाचन क्षेत्र में गैर-बंगाली समुदाय के साथ हुए एक विशेष सत्र में शामिल हुईं जो जो उनकी नई अभियान रणनीति का हिस्सा थी। बनर्जी ने सभी समुदायों के लोगों से उनकी भाषा में अभिवादन किया और सभी समुदायों के प्रति धार्मिक सहिष्णुता की बात करती रहीं।
जनता मान कर चल रही थी दीदी जीत जाएंगी
टीएमसी के एक नेता ने बताया भवानीपुर जैसे निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं में आत्मसंतुष्टि की भावना रहती है, जहां वे यह मान कर चलते हैं दीदी (ममता बनर्जी) जीतेंगी। इसलिए उनमें वोटिंग से दूर रहने की प्रवृत्ति है, इस बार भी वे ऐसा ही सोच सकते थे तो चुनाव नतीजे बदल सकते थे।'
वरिष्ठ पत्रकार जयंतो घोषाल बताते हैं यह चुनाव केवल मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए नहीं था, यह 2024 की तैयारी और लड़ाई है। ममता अब केंद्र की राजनीति में अपनी प्रमुख दावेदारी पेश कर सकती हैं। हालांकि, अन्य राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बनर्जी ने भवानीपुर में होने वाले उपचुनाव को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया। संभवतः, वह राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में बने रहने के लिए केवल विधानसभा के लिए चुने जाने के अलावा कुछ बड़ा हासिल करने के लिए इसका इस्तेमाल कर रही थीं।
ममता बनर्जी और प्रियंका टिबरेवाल
- फोटो :
पीटीआई
अब इन पांच बिंदुओं में समझिए ममता के लिए इस जीत के क्या मायने हैं?
1-विपक्ष का एकमात्र चेहरा बनने का टीएमसी का दावा कमजोर पड़ जाता
तृणमूल कांग्रेस के लिए इस उपचुनाव की अहमियत बंगाल की राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर अहमियत रखती है। विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी की बड़ी जीत ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख भाजपा विरोधी चेहरा बना दिया। टीएमसी 2024 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर इस धारणा को और मजबूत करना चाहती है कि राष्ट्रीय स्तर पर केवल ममता बनर्जी में ही इतना दमखम है जो भाजपा से टक्कर ले सकती है। यदि ममता यह चुनाव हार जातीं तो पार्टी का यह दावा कमजोर पड़ जाता।
पश्चिम बंगाल की राजनीति को समझने वाले एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक की राय यह है कि इस जीत से ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन में एक और महत्वपूर्ण मोड़ आने वाला है, क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति में खुद को स्थापित करने का उनका सपना काफी हद तक दक्षिण कोलकाता के इस छोटे से उपनगरीय इलाके की जीत पर निर्भर था।
यह भी पढ़ें: Loksabha Election 2024 पर नजर : दिल्ली पहुंचने के लिए ममता ने चुना पूर्वोत्तर का रास्ता, गोवा जैसे छोटे राज्यों को भी बनाया जरिया
2- राष्ट्रीय राजनीति में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश
हाल में हुए विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी से मात खाने से पहले ममता बनर्जी केवल एक बार, लोकसभा चुनावों में, माकपा से पराजित हुई हैं। वह एक और हार के परिणामों से अवगत थीं। इसलिए इस उपचुनाव के प्रचार के दौरान, उनके प्रचार अभियान और स्वर में राष्ट्रीय आकांक्षाएं और मुद्दे शामिल थे। इसलिए वे चुनाव प्रचार में मतदाताओं से कहती रहीं कि यदि वे उन्हें वोट देते हैं, तो वह मुख्यमंत्री बनी रहेंगी और पार्टी को दूसरे राज्यों में ले जाएंगी और भाजपा को हरा देंगी। दूसरे शब्दों में, वह उपचुनाव का इस्तेमाल राष्ट्रीय राजनीति में अपनी स्वीकार्यता स्थापित करने के लिए कर रही थीं।
1-विपक्ष का एकमात्र चेहरा बनने का टीएमसी का दावा कमजोर पड़ जाता
तृणमूल कांग्रेस के लिए इस उपचुनाव की अहमियत बंगाल की राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर अहमियत रखती है। विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी की बड़ी जीत ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख भाजपा विरोधी चेहरा बना दिया। टीएमसी 2024 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर इस धारणा को और मजबूत करना चाहती है कि राष्ट्रीय स्तर पर केवल ममता बनर्जी में ही इतना दमखम है जो भाजपा से टक्कर ले सकती है। यदि ममता यह चुनाव हार जातीं तो पार्टी का यह दावा कमजोर पड़ जाता।
पश्चिम बंगाल की राजनीति को समझने वाले एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक की राय यह है कि इस जीत से ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन में एक और महत्वपूर्ण मोड़ आने वाला है, क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति में खुद को स्थापित करने का उनका सपना काफी हद तक दक्षिण कोलकाता के इस छोटे से उपनगरीय इलाके की जीत पर निर्भर था।
यह भी पढ़ें: Loksabha Election 2024 पर नजर : दिल्ली पहुंचने के लिए ममता ने चुना पूर्वोत्तर का रास्ता, गोवा जैसे छोटे राज्यों को भी बनाया जरिया
2- राष्ट्रीय राजनीति में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश
हाल में हुए विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी से मात खाने से पहले ममता बनर्जी केवल एक बार, लोकसभा चुनावों में, माकपा से पराजित हुई हैं। वह एक और हार के परिणामों से अवगत थीं। इसलिए इस उपचुनाव के प्रचार के दौरान, उनके प्रचार अभियान और स्वर में राष्ट्रीय आकांक्षाएं और मुद्दे शामिल थे। इसलिए वे चुनाव प्रचार में मतदाताओं से कहती रहीं कि यदि वे उन्हें वोट देते हैं, तो वह मुख्यमंत्री बनी रहेंगी और पार्टी को दूसरे राज्यों में ले जाएंगी और भाजपा को हरा देंगी। दूसरे शब्दों में, वह उपचुनाव का इस्तेमाल राष्ट्रीय राजनीति में अपनी स्वीकार्यता स्थापित करने के लिए कर रही थीं।
पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी।
- फोटो :
ANI
3-पैन इंडिया छवि और मजबूत हो सकती है
भवानीपुर को बंगाल में मिनी भारत भी कहा जाता है, क्योंकि यहां 40 प्रतिशत मतदाता गैर बंगाली समुदाय के हैं। जिसमें गुजराती, मारवाड़ी, पंजाबी, बिहारी और उड़िया मुख्य तौर पर हैं। भवानीपुर में जीत और वहां ममता की पार्टी का बढ़ा हुआ वोट शेयर राष्ट्रीय राजनीति में ममता की छवि को और मजबूत करेगा।
जयंतो घोषाल कहते हैं इस जीत के बाद अब राष्ट्रीय राजनीति में ममता की भूमिका तेजी से बदल सकती है, क्योंकि यह विधानसभा क्षेत्र ऐसा है जहां ममता को यहां हर राज्य से बसे हुए लोगों का समर्थन हासिल हो रहा है। टीएमसी अब पैन इंडिया स्तर पर इसका प्रचार करेगी।
4-भाजपा पर आक्रमक ढंग से हमले जारी रखना आसान
आगामी लोकसभा चुनाव 2024 में होना है और ममता इसमें विपक्ष का मुख्य चेहरा बनना चाहती हैं। इस लिहाज से अब ममता आक्रमक ढंग से भाजपा पर हमले जारी रख सकती हैं। जैसा कि उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान ही जाहिर कर दिया। भवानीपुर में विभिन्न स्थानों पर प्रचार के दौरान बनर्जी ने अपने भाषणों में बार-बार मतदाताओं से यह आग्रह किया कि वे उन्हें वोट जरूर करें क्योंकि अगर वह वे यह सीट जीत गईं तभी वह शेष भारत को जीत सकती है। उन्होंने मतदाताओं से कहा कि अगर लोग केंद्र से बीजेपी सरकार को हटाना चाहते हैं तो उन्हें उन्हें वोट देना चाहिए।
5-छोटे राज्यों में टीएमसी विकल्प पेश करेगी
टीएमसी की अब नजर त्रिपुरा, असम और गोवा जैसे छोटे-छोटे राज्यों पर है। 2023 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के लिए ममता की पार्टी ने पुरजोर तैयारी शुरू कर दी है। छोटे राज्यों में
टीएमसी की पहुंच फैलाने की अपनी आकांक्षाओं को पेश करते हुए केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। इस प्रकार, वह मतदाताओं के सामने एक विकल्प रख रही हैं।
भवानीपुर को बंगाल में मिनी भारत भी कहा जाता है, क्योंकि यहां 40 प्रतिशत मतदाता गैर बंगाली समुदाय के हैं। जिसमें गुजराती, मारवाड़ी, पंजाबी, बिहारी और उड़िया मुख्य तौर पर हैं। भवानीपुर में जीत और वहां ममता की पार्टी का बढ़ा हुआ वोट शेयर राष्ट्रीय राजनीति में ममता की छवि को और मजबूत करेगा।
जयंतो घोषाल कहते हैं इस जीत के बाद अब राष्ट्रीय राजनीति में ममता की भूमिका तेजी से बदल सकती है, क्योंकि यह विधानसभा क्षेत्र ऐसा है जहां ममता को यहां हर राज्य से बसे हुए लोगों का समर्थन हासिल हो रहा है। टीएमसी अब पैन इंडिया स्तर पर इसका प्रचार करेगी।
4-भाजपा पर आक्रमक ढंग से हमले जारी रखना आसान
आगामी लोकसभा चुनाव 2024 में होना है और ममता इसमें विपक्ष का मुख्य चेहरा बनना चाहती हैं। इस लिहाज से अब ममता आक्रमक ढंग से भाजपा पर हमले जारी रख सकती हैं। जैसा कि उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान ही जाहिर कर दिया। भवानीपुर में विभिन्न स्थानों पर प्रचार के दौरान बनर्जी ने अपने भाषणों में बार-बार मतदाताओं से यह आग्रह किया कि वे उन्हें वोट जरूर करें क्योंकि अगर वह वे यह सीट जीत गईं तभी वह शेष भारत को जीत सकती है। उन्होंने मतदाताओं से कहा कि अगर लोग केंद्र से बीजेपी सरकार को हटाना चाहते हैं तो उन्हें उन्हें वोट देना चाहिए।
5-छोटे राज्यों में टीएमसी विकल्प पेश करेगी
टीएमसी की अब नजर त्रिपुरा, असम और गोवा जैसे छोटे-छोटे राज्यों पर है। 2023 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के लिए ममता की पार्टी ने पुरजोर तैयारी शुरू कर दी है। छोटे राज्यों में
टीएमसी की पहुंच फैलाने की अपनी आकांक्षाओं को पेश करते हुए केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। इस प्रकार, वह मतदाताओं के सामने एक विकल्प रख रही हैं।