Ayodhya Verdict: मस्जिद के लिए 60 साल तक लड़ने वाले हाशिम अंसारी कांग्रेस को मानते थे दोषी
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बाबरी मस्जिद के लिए 60 साल से भी अधिक समय तक कानूनी लड़ाई लड़ने वाले हाशिम अंसारी अपने जीवन के अंतिम समय में काफी मायूस थे। वह आखिरी सांस तक अदालत के फैसले का इंतजार करते रहे, लेकिन उन्हें यह मौका नसीब नहीं हुआ। हाशिम अयोध्या के उन चुनिंदा लोगों में से थे जिन्होंने धर्म और बाबरी मस्जिद के लिए संविधान और कानून के दायरे में रहते हुए आजीवन लड़ाई लड़ी।
रामलला टेंट में थे उससे भी वह दुखी थे। अपने जीवन के अंतिम समय में उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था, मैं फैसले का इंतजार कर रहा हूं और मौत का भी। लेकिन चाहता हूं कि मौत से पहले फैसला देख लूं। मायूसी की वजह पूछने पर वह कहते थे कि जो मुखालिफ पार्टियां चैलेंज कर रही हैं, उनसे मायूसी है और हुकूमत कोई एक्शन नहीं लेती। इससे भी उनमें निराशा है।
कानूनी लड़ाई के साथ हिंदुओं के साथ था भाईचारा
राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी 1949 से मुकदमें की पैरवी कर रहे थे लेकिन, हिंदुओं के साथ उनके रिश्ते कभी खराब नहीं हुए। विवादित स्थल के दूसरे प्रमुख दावेदारों में निर्मोही अखाड़ा के रामकेवल दास और दिगंबर अखाड़ा के रामचंद्र परमहंस से हाशिम की अंत तक गहरी दोस्ती रही। परमहंस और हाशिम अक्सर एक ही रिक्शे या तांगे में बैठकर मुकदमे की पैरवी के लिए अदालत जाते थे और साथ ही, चाय-नाश्ता भी करते थे।
हर हाल में अमन चाहते थे
साल 1934 में विवादित ढांचे के अंदर मूर्तियां रखने के बाद शांति व्यवस्था बनाए रखने में जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया था उनमें हाशिम अंसारी भी शामिल थे। लोगों ने उनसे मुकदमा करने को कहा तो वे बाबरी मस्जिद के पैरोकार हो गए। लेकिन, कानूनी लड़ाई से इतर वे अमन के पैरोकार भी थे। वह कहते थे कि अगर, हम मुकदमा जीत गए तो भी मस्जिद का निर्माण तब तक नहीं शुरू करेंगे जब तक हिंदू बहुसंख्यक हमारे साथ नहीं आ जाते। वह यह भी कहते थे कि हर हाल में अमन चाहते हैं मस्जिद तो बाद की बात है।
कांग्रेस को मानते थे दोषी
दंगाइयों के हमले में हिंदुओं ने बचाया
हाशिम का जन्म 1921 में हुआ था। जब वह 11 साल के थे, तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। दर्जा दो तक पढ़े हाशिम के परिवार की आमदनी का जरिया सिलाई था। 6 दिसंबर 1992 में शहर के बाहर से आए लोगों ने उनका घर जला दिया था। लेकिन अयोध्या के हिंदुओं ने उन्हें और उनके परिवार को बचाया। सरकार से उन्हें जो मुआवजा मिला उन्होंने अपना घर दोबारा बनवाया और एक एंबेसडर कार खरीदी थी। उनका बेटा मोहम्मद इकबाल इसी एंबेसडर को टैक्सी के तौर पर हिंदू तीर्थयात्रियों को अयोध्या के मंदिरों का दर्शन कराते हैं।हाशिम-परमहंस में नहीं था मनभेद
राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के पक्षकार महंत परमहंस रामचंद्र दास और हाशिम अंसारी की दोस्ती किसी पहेली से कम नहीं है। जमीन की दावेदारी के विवाद को लेकर भले ही दोनों कोर्ट में 1949 से एक दूसरे के सामने रहे, लेकिन कोर्ट के बाहर उनकी अनूठी दोस्ती अपने आप में सौहार्द की मिसाल थी।
अपने हक की लड़ाई में उन्होंने कभी अयोध्या का आपसी सौहार्द खराब नहीं होने दिया यहां तक प्रदेश में कई बार इस मुद्दे पर तनाव हुआ लेकिन तब भी दोनों शहर का सौहार्द बनाए रखने में कामयाब रहे। विवादित स्थल पर वाद दायर करने वाले अंसारी पहले व्यक्ति थे। महंत परमहंस रामचंद्र दास से हाशिम की आखिरी दम तक गहरी दोस्ती रही।
परमहंस और हाशिम तो एक ही तांगे से मुकदमे की पैरवी के लिए साथ-साथ अदालत जाते और दिनभर की जिरह के बाद हंसते-बोलते एक ही सवारी से घर वापस आते थे। करीब 6 दशक तक यूं ही उन्होंने दोस्ती निभाई। साल 2003 में परमहंस के देहांत की खबर जब हाशिम को मिली तो वह पूरी रात उनके पास रहे। दूसरे दिन अंतिम संस्कार के बाद ही अपने घर आए।
परमहंस रामचंद्र दास के दुनिया में न रहने के बाद हाशिम ने हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञान दास से मिलकर दोस्ती की रस्म आगे बढ़ाई और सुलह की कोशिशों को कायम रखा। 2016 में जब 96 साल की उम्र में हाशिम अंसारी का इंतकाल हुआ तो महंत ज्ञानदास ने कहा कि मैंने अपना मित्र खो दिया है। हाशिम अंसारी की इसी परंपरा को उनके बेटे इकबाल अंसारी ने भी आगे बढ़ाया। इसी साल महंत धर्मदास दिवाली की बधाई देने उनके घर पहुंचे।