भारत की कोशिश से टिड्डियों के हमले से सुरक्षित हुआ बांग्लादेश
राज्य सरकारों के साथ मिलकर चलाए अभियान ने दिसंबर में भी कहर बनकर पंजाब के कुछ इलाकों गुजरात और राजस्थान को तो इनके प्रकोप से बचाया ही। बांग्लादेश समेत एशिया के बड़े भूभाग की फसलों को भी टिड्डियों के हमले के चलते नष्ट होने से बचा लिया है।
देश पर टिड्डियों का यह हमला 1993 के बाद हुआ था। राजस्थान, गुजरात पिछले साल मई 2019 से सबसे बड़े टिड्डी दल के हमले से दोचार हो रहा था। लेकिन हमले के साथ ही राज्यों के साथ मिलकर एलडब्ल्यूओ ने प्रभावी नियंत्रण अभियान शुरु कर दिया था। जिसके चलते दिसंबर तक इन टिड्डियों को रोक जा सका। टिड्डियों को हमले को विफल करने की बावत कृषि कल्याण विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक।
पाकिस्तान की सीमा से टिड्डियों के दल ने राजस्थान से सटी सीमाओं पर 21 मई से हमले करने शुरु कर दिए थे। इसके लिए सतर्क भारत सरकार ने 22 मई 2019 से ही इन पर नियंत्रण के लिए 150 से अधिक अधिकारियों और 27 वाहनों की टीम को लगाया। इसमें राजस्थान और गुजरात सरकार ने 44 वाहनों को अतिरिक्त रूप से लगाकर भारत पाक सीमा जहां इनका सबसे अधिक कहर था । इन्हें नष्ट करने के काम शुरु कर दिया। 1993 में सिंतबर में आए दल का कहर अक्टूबर 1993 तक तक खत्म हो गया था।
इसलिए इस बार भी अनुमान था कि नवंबर तक टिड्डियों का प्रकोप खत्म हो जाएगा। पर इस बार ऐसा नहीं हुआ दिसंबर की ठंड में भी यह टिड्डियां पंजाब के कुछ इलाकों, राजस्थान और गुजरात में खेत के खेत नष्ट कर रही थी। इतना ही नहीं पाकिस्तान से लगातार टिड्डियां आ रही थी। लिहाजा इसके लिए कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने पाकिस्तान के साथ कई दौर वार्ता करने के अलावा टिड्डी चेतावनी संगठन के मताहत आने वाले दस सर्कल कार्यालयों जिसमें जैसलमेर, बाडमेर, बीकानेर, जालोर, फलौदी, चुरु, नागौर, सूरतगढ़ और गुजरात के पालनपुर, भुज से इन पर काबू पाने के लिए चरणबद्ध एक्शन प्लान शुरु कर दिया।
इसमें मई से दिसंबर 2019 के शुरुआती हफ्ते में टिड्डियों को नियंत्रित करने के लिए चरणबद्ध तरीके से पहले वयस्क फिर अवयस्क टिड्डियों को खत्म किया गया। इसमें सबसे पहले वयस्क रेगिस्तानी टिड्डी येलो और हाप्पर्स को खत्म करने के लिए अभियान चलाया जिसमें प्रभावी नियंत्रिण के द्वारा टिड्डियों को राजस्थान और गुजरात के रेगीस्तान तक सीमित कर दिया गया ।
टिड्डी का प्रकोप नवंबर तक खत्म हो जाएगा
इसके बाद अंदाजा लगाया जा रहा था कि टिड्डी का प्रकोप नवंबर तक खत्म हो जाएगा। दिसंबर में इसके आसार भी दिखने लगे क्योंकि अमूमन ऐसा होता है कि भारत में मौसम की तब्दीली होती है। इसलिए टिड्डियां प्रजनन के लिए पाकिस्तान के बलूचिस्तान और ईरान के रेगीस्तान की ओर चली जाती हैं।
इस साल पूरे समय भारत में बेमौसम बरसात और मौसम की बेरुखी रही। इसके अलावा पाकिस्तान सरकार के प्रभावी नियंत्रण कार्यक्रमों के अभाव के कारण प्रजनन के बाद अवयस्क (गुलाबी) टिड्डियों के दल दिसंबर के दूसरे सप्ताह में ही वापस देश में राजस्थान के जैसलमेर और बाड़मेर की ओर से घुसने लगे। यह टिड्डियां ऊंचे पेड़ों पर आकर बैठने लगी। झुंड के झुंड पेड़ों पर मंडराने लगे ।
लिहाजा नियंत्रण अभियान में दवा के छिड़काव के लिए फायर बिग्रेड को शामिल किया गया। इसके अलावा किसानों ने पॉवर ट्रैक्टर छिड़काव यंत्र की मदद से पेड़ों पर ही अवयस्क गुलाबी टिड्डियों को नियंत्रित किया। इसके अलावा सघन अभियान चला कर गुजरात और राजस्थान के रेतीले इलाकों बबूल के घने जंगलों और रेत के टिलों में छिपे टिड्डी दलों को समाप्त किया गया।
इसमें लगभग 3,14,300 लीटर मेलाथियान 96 फीसदी यूएलवी कीटनाशक इस्तेमाल हुआ। जिसकी आपूर्ति हिंदूस्तान इनसेक्टीसाइड लिमिटेड द्वारा की गई। केंद्र सरकार के अनुरोध पर विभिन्न कीटनाशक कंपनियों ने अपने सामाजिक सरोकार के दायित्व (सीएसआर) के तहत किसानों को कीटनाशक उपलब्ध कराए। इसके अलावा सरकार के नियंत्रण काम में बढ़ चढ़ कर सहयोग किया।
जनवरी में वरिष्ठ टिड्डी पूर्वानुमान अधिकारी कीथ क्रसमिन ने 16 से 17 जनवरी तक भारत का दौरा किया। उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट है कि भारत और उसके विभिन्न विभागों के अथक प्रयासों से टिड्डियों के प्रकोप को रोकने में सहायता मिली है। अन्यथा यह टिड्डियां 1950 की तरह उत्तरी भारत से बंग्लादेश में प्रवेश कर जाती और इनका कहर वहां की फसलों पर विनाश की तरह बरसता।