Arvind Kejriwal Hindutva card: क्या केजरीवाल का साथ छोड़ देंगे मुसलमान? बड़ा उलटफेर कर सकते हैं मुस्लिम वोटर
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विस्तार
असदुद्दीन ओवैसी ने आरोप लगाया है कि अरविंद केजरीवाल हिंदुओं का वोट पाने के लिए नरेंद्र मोदी से बड़ा हिंदू नेता बनने की कोशिश कर रहे हैं। इस कोशिश में वे मुसलमानों के मुद्दे पर कुछ भी नहीं बोल रहे हैं। बिलकिस बानो के दुष्कर्म के दोषियों की रिहाई के मामले पर भी अब तक उन्होंने कुछ नहीं कहा है। उनका आरोप है कि शाहीन बाग़ आंदोलन में भी वे मुसलमानों के साथ खड़े नहीं हुए। जहांगीरपुरी मामले में आम आदमी पार्टी ने खुलकर बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों का विरोध किया और उन पर कार्रवाई करने की मांग कर दी। कोरोना काल के दौरान दिल्ली सरकार ने तबलीगी जमात के लोगों के द्वारा कोरोना फैलने की तथ्यात्मक रूप से गलत बात एक अलग कालम में दिखाकर भी मुसलमानों को नाराज कर दिया।
क्या अरविंद केजरीवाल स्वयं को बड़े हिंदू नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं? और क्या इससे अब तक आम आदमी पार्टी का एकमुश्त समर्थन करता आ रहा मुसलमान मतदाता उनसे दूर जा सकता है। यदि ऐसा हुआ तो इस परिस्थिति का लाभ कांग्रेस को हो सकता है और दिल्ली में वापसी की कांग्रेस की कोशिश कामयाब हो सकती है।
‘मुसलमानों के साथ खड़े नहीं हुए’
शाहीन बाग़ आंदोलन के आयोजक रहे शहजाद अली ने अमर उजाला से कहा कि इस आंदोलन में अरविंद केजरीवाल एक बार भी मुसलमानों के साथ खड़े नहीं हुए। उनका मुसलमानों के प्रति यह रुख तब था, जबकि दिल्ली के मुसलमानों ने विधानसभा चुनावों में दो बार उन्हें एकमुश्त समर्थन दिया था। कोरोना काल के कारण इस आंदोलन को स्थगित करना पड़ा, लेकिन इसी कोरोना काल में अरविंद केजरीवाल सरकार ने मुसलामानों के लिए बेहद ख़ास अहमियत रखने वाले तबलीगी जमात के लोगों को कोरोना फैलाने का आरोपी ठहरा दिया।
मुस्लिम बहुल इलाके जाफराबाद के निवासी मुश्ताक अहमद ने कहा कि हाल के दिनों में अरविंद केजरीवाल ने कई इस तरह के काम किये हैं, जिससे मुसलमानों में उनके प्रति निराशा पैदा हुई है। उन्होंने कहा कि पुलिस रिपोर्ट में भी यह बात सामने आ गई है कि जहांगीरपुरी मामले में कुछ शरारती तत्वों के कारण जानबूझकर हिंसा भड़काई गई थी, लेकिन आम आदमी पार्टी ने बिना कुछ सोचे-समझे विश्व हिंदू परिषद की तरह का बयान देना शुरू कर दिया और बांग्लादेशी मुसलमानों-रोहिंग्या मुसलमानों पर कार्रवाई करने की बात शुरू कर दी। उन्होंने कहा कि केजरीवाल के इसी रुख का परिणाम है कि अनेक मुसलमान एक बार फिर कांग्रेस को अपनी पहली पसंद बताने लगे हैं। आम आदमी पार्टी को दिल्ली नगर निगम चुनाव के साथ-साथ गुजरात में भी इसका नुकसान हो सकता है।
बड़ा उलटफेर संभव
राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ सुनील पांडे ने कहा कि भारतीय राजनीति में भाजपा हिंदू वोटों के बड़े दावेदार के रूप में पहले से ही मौजूद है। यदि अरविंद केजरीवाल हिंदुओं के बड़े नेता के रूप में स्वयं को स्थापित करने की कोशिश करते हैं, तो इसमें उन्हें लाभ मिलने की संभावना बहुत कम है, लेकिन इस कोशिश में मुसलमान मतदाता उनसे अवश्य छिटक सकता है। चूंकि, ऐसी स्थिति में मुसलमानों के पास कांग्रेस ही एकमात्र विकल्प बचती है, कांग्रेस को इसका लाभ हो सकता है।
उन्होंने कहा कि अरविंद केजरीवाल एक साथ दो विपरीत ध्रुवों को साधने की कोशिश करते दिखाई पड़ रहे हैं। उन्हें पता है कि किसी विकल्प की कमी में मुस्लिम मतदाता उनके साथ जुड़ा हुआ है। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि केवल मुस्लिम मतदाताओं के बल पर सत्ता तक नहीं पहुंचा जा सकता, लिहाजा वे अब अन्य वर्गों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इसी कोशिश में वे स्वयं को बड़ा हिंदू नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन उनकी इस कोशिश से मुसलमानों के मन में उन्हें लेकर संदेह पैदा हो सकता है, जिससे उन्हें नुक्सान हो सकता है। उन्होंने कहा कि नोटों पर लक्ष्मी-गणेश की छवि अंकित कराने के बेहद गैरजरूरी प्रस्ताव ने मुस्लिम मतदाताओं में उन्हें हिंदूवादी राजनीति को ही आगे बढ़ाने वाले नेता के रूप में स्थापित करने का काम किया है।
कांग्रेस को लाभ क्यों?
लेकिन इसी दौरान कांग्रेस ने न केवल मुसलमानों के मुद्दे पुरजोर तरीके से उठाये हैं, बल्कि केंद्र सरकार की जबर्दस्त घेरेबंदी की है। राहुल गांधी ने बिलकिस बानो के आरोपियों की रिहाई पर कठोर रुख अपनाया है, तो जहांगीरपुरी-शाहीन बाग़ मामले में सरकार के खिलाफ भी कठोर रुख अपनाया है। इससे मुसलमानों के मन में कांग्रेस के प्रति भरोसा बढ़ सकता है जिससे उसे इसका लाभ मिल सकता है।
मजबूत उम्मीदवार देने से ही बनेगी बात
जामिया नगर के ताहिर सिद्दीकी ने कहा कि यह ध्यान रखना चाहिए कि मुसलमान मतदाता हमेशा रणनीतिक वोटिंग करने के लिए जाना जाता है। वह उस उम्मीदवार को ही वोट करता है, जो भाजपा उम्मीदवारों को हराने की काबिलियत रखते हैं। ऐसे में यदि कांग्रेस मुस्लिम बहुल इलाकों में मजबूत उम्मीदवार सामने रखे तो उसे इसका लाभ मिल सकता है। लेकिन यदि कांग्रेस ने मजबूत उम्मीदवार नहीं उतारे तो मुसलमान आम आदमी पार्टी के ही साथ बना रह सकता है।