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370 हट सकती है या नहीं, इस अहम सवाल पर क्या कहते हैं कानून के जानकार

Sun, 24 Feb 2019 03:04 PM IST
संदीप भट्ट न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: संदीप भट्ट Updated Sun, 24 Feb 2019 03:04 PM IST
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Article 370 can be removed or not important points jammu kashmir Narendra modi BJP PDP NC
अनुच्छेद 370

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा हमले में आंतकी हमले में सैनिकों के शहीद होने के बाद देशभर में गुस्सा है। लोग अपनी भावनाएं हर माध्यम से बयां कर रहे हैं फिर चाहे मुख्यधारा की मीडिया या सोशल मीडिया  हो। इसमें देखा जा रहा है कि एक बार फिर जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने की मांग तेज हो गई है। पिछले साल जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली अनुच्छेद 370 की प्रकृति को अस्थायी मानने से इनकार कर चुका सुप्रीम कोर्ट भी इस पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया है। 

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गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालने से पहले पिछले लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि अनुच्छेद 370 पर देश भर में बहस होनी चाहिए। अब पुलवामा हमले के बाद एक बार यह मुद्दा गरमा गया है। आध्यात्मिक गुरु जग्गी वासुदेव, उद्योगपति सज्जन जिंदल और कई संगठन सरकार से अनुच्छेद 370 को हटाने की मांग कर चुके हैं।
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हालांकि कुछ लोग इस मांग से सहमत नहीं हैं। कुछ दिनों पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि जम्मू कश्मीर में आतंकी गतिविधियों की रोकथाम के लिए अनुच्छेद 370 को हटाने की जरूरत नहीं है। इतना ही नहीं नेता बन चुके मशहूर फिल्म अभिनेता कमल हासन तो जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह की मांग कर चुके हैं। यह वही मांग है जो जम्मू-कश्मीर में सक्रिय अलगाववादी ताकतें करती रही हैं। 

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धारा 370 को लेकर है यह विवाद

जम्मू-कश्मीर पर अनुच्छेद 370 लागू होने बाद क्या चीजें हैं जो बदल गईं। जानिए कुछ महत्वपूर्ण बातें:
  • जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है। 
  • जम्मू-कश्मीर की कोई महिला यदि भारत के किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से शादी कर ले तो उस महिला की जम्मू-कश्मीर की नागरिकता खत्म हो जाएगी। 
  • यदि कोई कश्मीरी महिला पाकिस्तान के किसी व्यक्ति से शादी करती है, तो उसके पति को भी जम्मू-कश्मीर की नागरिकता मिल जाती है। 
  • अनुच्छेद 370 के कारण कश्मीर में रहने वाले पाकिस्तानियों को भी भारतीय नागरिकता मिल जाती है। 
  • जम्मू-कश्मीर में भारत के राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं है। यहां भारत की सर्वोच्च अदालत के आदेश मान्य नहीं होते। 
  • जम्मू-कश्मीर का झंडा अलग होता है। 
  • जम्मू-कश्मीर में बाहर के लोग जमीन नहीं खरीद सकते हैं। 
  • कश्मीर में अल्पसंख्यक हिन्दूओं और सिखों को 16 फीसदी आरक्षण नहीं मिलता है। 
  • अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू-कश्मीर में सूचना का अधिकार (आरटीआई) लागू नहीं होता।  
  • जम्मू-कश्मीर में शिक्षा का अधिकार (आरटीई) लागू नहीं होता है। 
  • जम्मू-कश्मीर में महिलाओं पर शरियत कानून लागू है। 
  • जम्मू-कश्मीर में पंचायत के पास कोई अधिकार नहीं है।  
  • जम्मू-कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 साल होता है। जबकि भारत के अन्य राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल 5 साल होता है। 
  • भारत की संसद जम्मू-कश्मीर के संबंध में बहुत ही सीमित दायरे में कानून बना सकती है। 
  • जम्मू-कश्मीर में काम करने वाले चपरासी को आज भी ढाई हजार रूपये ही बतौर वेतन मिलते हैं। 

अनुच्छेद 370 पर कश्मीरी नेताओं का तर्क

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता उमर अब्दुल्ला का मानना है कि अनुच्छेद 370 ने ही जम्मू-कश्मीर और शेष भारत को जोड़ रखा है। यह दोनों के बीच एकमात्र संवैधानिक कड़ी है। संवैधानिक कड़ी को आधार बनाकर यह भी कहा जाता रहा है कि धारा हटते ही अलगाववादी जनमत संग्रह के मुद्दे को तूल देंगे और जम्मू-कश्मीर विवाद के अंतरराष्ट्रीयकरण का प्रयास करेंगे। 


मेजर जनरल शेरू थपलियाल (रिटायर्ड) कहते हैं, "अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के बाद लाया गया था। उस समय वहां प्रधानमंत्री का दर्जा प्राप्त शेख अब्दुल्ला ने भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से कहा कि जम्मू-कश्मीर और भारत के एकीकरण में थोड़ा वक्त लगेगा, ऐसे में राज्य को कुछ विशेष प्रावधान देने के लिए एक अनुच्छेद जरूरी है। पंडित नेहरू इसके लिए तैयार हो गए और अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का हिस्सा बन गया, लेकिन यह हमेशा के लिए नहीं था। धीरे-धीरे इसे समाप्त किया जाना था, लेकिन हुआ नहीं।" 

वैसे तब संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. भीमराव आंबेडकर कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने के पक्ष में नहीं थे। मगर पंडित नेहरू के कहने पर गोपाल स्वामी आयंगर ने अनुच्छेद 370 का प्रस्ताव संविधान सभा में प्रस्तुत किया था।

370 को हटाने की मांग के तर्क 

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Article 370

सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ विराग गुप्ता कहते हैं कि सिर्फ अनुच्छेद 370 की वजह से कश्मीर भारत से जुड़ा है यह कहना गलत है। भारतीय संविधान के अनेक पहलू जम्मू-कश्मीर में लागू हो गए हैं। संविधान के अनुच्छेद-356 के तहत कश्मीर में राष्ट्रपति शासन भी लगाया जा सकता है।

चुनाव आयोग, सीएजी समेत कई संवैधानिक संस्थाओं का जम्मू-कश्मीर में बराबर का अधिकार है। जम्मू-कश्मीर के हाईकोर्ट के पूर्ववर्ती फैसले से स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय जम्मू-कश्मीर में प्रभावी होते हैं। 

'जनमत संग्रह और 370 को ना जोड़ें'

वहीं रक्षा मामलों के जानकार मेजर जनरल शेरू थपलियाल (रिटायर्ड) कहते हैं कि जनमत संग्रह को अनुच्छेद 370 से जोड़कर देखना ही गलत है। दरअसल 13 अगस्त 1948 के संयुक्त राष्ट्र के संकल्प के आधार पर पाकिस्तान को पहले अपनी सेना पीछे हटानी थी। पूरा कश्मीर भारत को सौंपना था।

फिर जब स्थितियां सामान्य हो जातीं, तब संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में पूरे पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) सहित जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह होता। लेकिन पाकिस्तान ने इन शर्तों को नहीं माना। ऐसे में आज की स्थिति में जनमत संग्रह का सवाल ही नहीं उठता। 

बढ़ेगा रोजगार

वहीं कुछ जानकारों का मानना है कि अनुच्छेद 370 नहीं होती तो कोई भी नागरिक जम्मू-कश्मीर में जमीन खरीद पाता। इससे वहां निवेश आता, रोजगार आते। सेंटर फॉर दी स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज की पूर्व प्रोफेसर मधु किश्वर कहती हैं कि अनुच्छेद 370 का फायदा उठाकर अलगाववादी ताकतें कश्मीर को नया पाकिस्तान बनाना चाहती हैं। युवाओं के कई संगठन भी लंबे समय जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने की मांग करते रहे हैं।

कैसे बनी थी 370

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Kashmir Dispute

क्या है अनुच्छेद 370

भारतीय संविधान की अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा प्रदान करती है। अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का एक विशेष अनुच्छेद यानी धारा है, जो जम्मू-कश्मीर को भारत में अन्य राज्यों के मुकाबले विशेष अधिकार प्रदान करती है। भारतीय संविधान में अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबन्ध सम्बन्धी भाग 21 का अनुच्छेद 370 जवाहरलाल नेहरू के विशेष हस्तक्षेप से तैयार किया गया था। 

कैसे हुआ भारत में विलय

1947 में विभाजन के समय जब जम्मू-कश्मीर को भारतीय संघ में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू हुई तब जम्मू-कश्मीर के राजा हरिसिंह स्वतंत्र रहना चाहते थे। इसी दौरान तभी पाकिस्तान समर्थित कबिलाइयों ने वहां आक्रमण कर दिया जिसके बाद बाद उन्होंने भारत में विलय के लिए सहमति दी। 

कैसे बनी 370

उस समय की आपातकालीन स्थिति के मद्देनजर कश्मीर का भारत में विलय करने की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करने का समय नहीं था। इसलिए संघीय संविधान सभा में गोपालस्वामी आयंगर ने धारा 306-ए का प्रारूप पेश किया। यही बाद में अनुच्छेद 370 बनी। जिसके तहत जम्मू-कश्मीर को अन्य राज्यों से अलग अधिकार मिले हैं।

इन सवालों के जवाब से होगा समाधान

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supreme court - फोटो : ANI

सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि अनुच्छेद 370 अस्थायी या स्थायी 

अप्रैल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 को लेकर कहा था कि सालों से बने रहने के चलते अब यह धारा एक स्थायी प्रावधान बन चुकी है, जिससे इसको खत्म करना असंभव हो गया है। वैसे अब सुप्रीम कोर्ट इस पर सुनवाई के लिए तैयार है। कोर्ट जिस याचिका पर सुनवाई करेगा, उसमें तर्क दिया गया है कि यह धारा संविधान के भाग 21 के तहत एक प्रावधान है। इसके शीर्षक में ही अस्थायी प्रावधान होना लिखा था। यह स्थायी नहीं है। 

इस विवाद का दूसरा पहलू यह है कि अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा द्वारा साल 1951 से 1956 के दौरान बनाया गया था। मगर जनवरी 1957 में यह सभा भंग कर दी गई। क्योंकि उस वक्त यह मान लिया गया था कि जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय होने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है।

ऐसे में तर्क दिया जाता है कि अनुच्छेद 370 तभी खत्म हो सकती है, जब एक नई संविधान सभा चुनी जाए और वह इसे खत्म करने संबंधी सहमति प्रदान करे। मगर दूसरे पक्ष का मानना है कि 26 जनवरी 1957 को जम्मू-कश्मीर संविधान सभा के भंग होने के साथ अनुच्छेद 370 को भी खत्म हो जाना था। 

अनुच्छेद 370 पर संविधान संशोधन पर भी सवाल

संविधान में संशोधन कर इस धारा को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव पास होना जरूरी है। अगर यह पास हो भी जाता है तो मौजूदा कानून के तहत जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार से भी सहमति लेनी होगी।

लेकिन मौजूदा सरकार के कार्यकाल में लोकसभा का आखिरी सत्र भी पूरा हो चुका है और जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू है। जम्मू-कश्मीर की दो बड़ी क्षेत्रीय पार्टियां भी अनुच्छेद 370 हटाए जाने की विरोधी हैं। 

हालांकि भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी कहते हैं कि अनुच्छेद 370 हटाने के लिए संसद में कानून बनाने की जरूरत नहीं है। राष्ट्रपति एक अधिसूचना जारी कर इस धारा को खत्म कर सकते हैं।

सत्ता में आने के बाद भाजपा ने 370 पर साधी चुप्पी

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने दिसंबर 2013 में जम्मू में एलान किया था कि अनुच्छेद 370 पर देश भर में बहस होनी चाहिए। फिर पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनाव के अपने घोषणा-पत्र में वादा किया था कि अनुच्छेद 370 को हटाया जाएगा। लेकिन चुनावों में मिली अभूतपूर्व जीत और पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद भी भाजपा ना संसद में इस मुद्दे पर बोली और ना ही जनता के बीच। 

मार्च 2015 में जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार बनाने के बाद तो केंद्र सरकार ने जैसे इस मुद्दा को छोड़ ही दिया। वैसे भाजपा अनुच्छेद 370 को साल 1996, 1999 और 2004 के लोकसभा चुनावों से पहले भी उठा चुकी है।

लेकिन सत्ता में आने के बाद भाजपा, साल 1999 से 2004 तक और फिर 2014 से लेकर अब तक, इस मुद्दे पर चुप है। पुलवामा हमले के बाद लोगों के आक्रोश के मद्देनजर कुछ भाजपा नेता जरूर इसके खिलाफ बोल रहे हैं। 

सरकार 370 पर आरटीआई का भी जवाब नहीं दे रही

पिछले साल 30 जुलाई को सूचना अधिकार कार्यकर्ता नीरज शर्मा ने एक सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत प्रधानमंत्री कार्यालय से साल 2014 से 2018 के बीच अनुच्छेद 370 को हटाने को लेकर हुई कोशिशों के बारे में पूछा था। लेकिन सरकार ने इस पर कोई जानकारी नहीं दी। शर्मा ने 7 अक्टूबर 2018 को दूसरी आरटीआई लगाई। 6 नवंबर को पीएमओ की ओर से कहा गया कि जानकारी इकट्ठा की जा रही है। 

जब कोई सूचना नहीं दी गई तो आवेदनकर्ता ने सूचना अधिकार कानून के तहत प्रथम अपील अधिकारी को आवेदन दिया। 30 दिसंबर को प्रथम अपील अधिकारी ने आदेश जारी कर कहा कि 15 दिन के भीतर अपीलकर्ता को जवाब दिया जाए। मगर उस आदेश के लगभग दो महीने बाद भी कोई जवाब नहीं आया है।

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