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क्या हमारे जवान सिर्फ शहीद होने के लिए हैं?

Tue, 02 Jan 2018 10:00 PM IST
अतुल सिन्हा/नई दिल्ली
अतुल सिन्हा/नई दिल्ली Updated Tue, 02 Jan 2018 10:00 PM IST
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Are our soldier just to be martyred?

क्या सेना के जवान सिर्फ शहीद होने के लिए होते हैं? क्या सैनिकों की शहादत पर दिए गए भाजपा सांसद नेपाल सिंह के बयान को उस मानसिकता का प्रतीक नहीं माना जाए, जिसके तहत शहीद होने वाले जवानों की फेहरिस्त लगातार लंबी होती जा रही है?

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आपको याद होगा कि कुछ साल पहले अभिनेता ओमपुरी ने जब ऐसा बयान दिया था तो उन्हें किस तरह देशद्रोही तक कहा गया था, बाद में उन्हें इसके लिए इस कदर पछतावा हुआ कि वो माफी मांगते रहे, रोते रहे, लेकिन उन्हें हाशिये पर ही धकेल कर रखा गया। इस सांसद ने भी दबाव में आकर माफी मांग ली और भाजपा ने मामला रफा दफा कर दिया। संसद में कांग्रेस ने जब ये मुद्दा उठाया तो कहा गया कि ऐसे मामलों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।
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हमारे देश के गृहमंत्री साल के पहले दिन सीमा पर आईटीबीपी के जवानों के बीच थे, पुलवामा में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान शहीद हुए पांच जवानों को लेकर उन्होंने पहले की ही तरह अफसोस जताया और शहादत पर गर्व करने, दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब देने का दावा करने के साथ साथ फिर से दोहराया कि ‘जवानों की शहादत बेकार नहीं जाएगी’।  
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कहने को कश्मीर में ‘ऑपरेशन ऑल आउट’ चल रहा है, इस ऑपरेशन के तहत भी करीब 200 आतंकी तो मारे गए लेकिन शहीद होने वाले हमारे जवानों की संख्या भी पहले से कहीं ज्यादा हो गई है। तीन सालों में 119 जवान शहीद हो चुके हैं और सेना के अधिकारी भी इस बात से चिंतित हैं कि आतंकवादियों और जवानों के मारे जाने का औसत लगातार कम हो रहा है।

पहले 1 जवान की शहादत 5 आतंकियों के मारे जाने पर होती थी, जबकि अब 5 आतंकियों के मारे जाने की तुलना में 2 से 3 जवानों को अपनी जान गंवानी पड़ रही है। लेकिन इसे हमारी सरकार और सत्ताधारी सांसद एक आम बात मानकर ऐसे बयान दे रहे हैं, जिससे सियासत तेज़ हो गई है

हर साल बढ़ रही शहीद होने वाले जवानों की संख्या

Are our soldier just to be martyred?

सियासत और कूटनीति के अपने मायने हैं। हमारे जवान जिन कठिन परिस्थितियों में सीमा की सुरक्षा में जुटे रहते हैं और लगातार अपनी जान पर खेलकर भी आतंकियों से लोहा लेते हैं, उसे हम महज उनकी शहादत पर सलामी देकर किनारे नहीं कर सकते।

पिछले कुछ सालों में जब से आतंकी हमलों की खबरें आना तेज़ हुई हैं, उससे कहीं ज्यादा ये खबरें भी आ रही हैं कि हमारे जवान बड़ी संख्या में शहीद हो रहे हैं, उन्हें राजकीय सम्मान या सैनिक सम्मान के साथ सलामी दी जा रही है, उनके परिवार वाले किस तरह अकेले पड़ गए हैं और किस तरह सरकार उनकी मदद कर रही है।

अक्सर हमारे जवानों की मिसाल देते हुए उनकी शहादत को पाकिस्तान को चुनौती देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन न तो घुसपैठ रुक पा रही है, न आतंकी हमले और न ही शहादत का सिलसिला।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद पर होने वाली खोखली बहसों और इसे खत्म कर देने के दावों को कैसे सच माना जाए जब आपसे मुट्ठी भर घुसपैठिए और आतंकी रोके नहीं जाते और उससे ज्यादा आपके जवान शहीद हो जाते हैं।

बेशक ये गंभीर मामला है कि क्या हमारे जवान सिर्फ शहादत के लिए तैयार किए जाते हैं, क्या उनकी शहादत को सलाम करने और बदला लेने के दावे करने भर से इसका इलाज संभव है या फिर इस मर्ज़ का कोई कारगर तरीका ढूंढना चाहिए?

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