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सफल नतीजों के शाह: जिम्मेदारी और नतीजे हर बार उन्हें सही ठहराते हैं
Fri, 24 May 2019 09:39 AM IST
गौरव द्विवेदी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: गौरव द्विवेदी
Updated Fri, 24 May 2019 09:39 AM IST
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अमित शाह (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
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अमित शाह भाजपा के अध्यक्ष बने ही थे। पहली परीक्षा महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में थी। वैचारिक साम्यता के बावजूद शिवसेना जब सीटों को लेकर ज्यादा मोल-भाव करने लगी तो भाजपा ने अकेले चुनाव लड़ा। ये फैसला अमित शाह का था। पार्टी व संघ के कई दिग्गज उनसे सहमत नहीं थे, लेकिन वह अपने फैसले पर आगे बढ़े।
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चुनाव के बाद जब सरकार बनाने के लिए संख्या बल कम पड़ी तो शिवसेना को फिर साथ लेने में गुरेज नहीं किया। शाह की यही खासियत है, फैसला लेना और साहस के साथ जिम्मेदारी भी लेना। भाजपा के घोषणा पत्र में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के मुद्दे को शामिल करने पर पार्टी में एक राय नहीं थी। कुछ की यह राय भी थी कि इससे पूर्वोत्तर में आग लग जाएगी, लेकिन शाह का कहना था कि इसके बिना हम दूसरों से अलग कैसे दिखेंगे। नतीजों ने यहां भी उन्हें सही साबित किया।
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भाजपा संगठन की मजबूती और विस्तार में शाह की यही दृष्टि काम आई। लक्ष्य को दृढ़ता के साथ हासिल करने में उनका भरोसा है। वह दुस्साहस की हद तक साहस दिखाते हैं। और, यह चल इसलिए जाता है कि भले ही कितने आरोप लगें, निजी जीवन में वे सात्विक हैं। सुबह 5 बजे उठना, 8 बजे तक काम पर लग जाना और देर रात तक काम में जुटे रहना उनकी रोजमर्रा की दिनचर्या है। वह इतिहास और ज्योतिष के जानकार हैं। किसी भी राजनीतिक दल के वह पहले अध्यक्ष हैं, जिन्होंने अपने कार्यकाल में पूरे भारत के तीन दौरे किए हैं।
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बंगाल में जो नतीजे आए हैं, वे यूं ही नहीं है। बीते एक साल में उन्होंने 72 दिन बंगाल में गुजारे और पार्टी को बूथ स्तर तक पहुंचाने के लिए कड़ी मशक्कत की। 2014 में हारी हुईं 120 सीटों पर एक साल पहले से लक्ष्य बनाकर तैयारी शुरु की।
सबसे बड़ी खासियत बेबाकी है। उनके दिल में जो है, उसे छिपाने की कोशिश नहीं करते। यह भी चिंता नहीं रहती कि उनकी स्पष्टवादिता से कौन खफा हो जाएगा? ईश्वर में भरोसा है, लेकिन आडंबर में नहीं। ज्योतिष के जानकार होने के बावजूद अंधविश्वासी नहीं हैं। उनके ड्राइंग रूम में वीर सावरकर और चाणक्य के फोटो लगे हैं। पार्टी को 10 करोड़ी बनाने और उनसे लगातार संवाद व संपर्क ने ही भाजपा को यह ऐतिहासिक जीत दिलाने में मदद की है।
गुजरातः सबसे बडा मुद्दा सिर्फ मोदी, शाह का हर दांव सटीक
भाजपा कांग्रेस अन्य
2019 26 00 00
2014 26 00 00
2009 15 11 00
नरेंद्र मोदी भले ही पांच साल पहले गुजरात छोड़कर देश की सत्ता संभालने दिल्ली आ गए हों, लेकिन राज्य के मतदाताओं के लिए आज भी वही सबसे बड़ा मुद्दा हैं। प्रदेश ने भाजपा की झोली में इस बार भी 26 सीटे डाली है। 2014 में यहां के मतदाताओं ने अपने मुख्यमंत्री को देश का प्रधानमंत्री बनाने के लिए भाजपा को राज्य की सभी 26 लोकसभा सीटों पर क्लीन स्वीप कराया, तो इस बार उन्होंने मोदी के ऊपर लगाए जा रहे राफेल घपले, चौकीदार चोर जैसे लांछनों का जवाब देने के लिए मतदान किया।
इसी का नतीजा रहा कि महज दो साल पहले विधानसभा चुनावों में भाजपा को नाकों चने चबवा देने वाली कांग्रेस का लगातार दूसरी बार सूपड़ा साफ हो गया। शहरी मतदाताओं के लिए रोजगार सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बताया जा रहा था। सुरक्षा व्यवस्था, फसलों की उचित कीमत और सार्वजनिक परिवहन जैसी सुविधाएं आैर अलग-अलग समुदायों द्वारा आरक्षण की मांग भी अपने आप में बड़ा मुद्दा थी, लेकिन परिणाम बताते हैं कि अंत में सिर्फ मोदी इस राज्य में बडा मुद्दा साबित हुए।
भाजपा विरोधी ‘युवा त्रिमूर्ति’ का जादू फेल
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सफलता का श्रेय अल्पेश ठाकोर, जिग्नेश मेवाणी और हार्दिक पटेल की ‘युवा त्रिमूर्ति’ के जादू को दिया गया था, लेकिन इस बार यह तिकड़ी फेल हो गई। ठाकोर कांग्रेस में नहीं थे और हार्दिक का नामांकन ही खारिज हो गया था। वहीं, जिग्नेश मेवाणी भी कांग्रेस के सदस्य नहीं है।
2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा से 20 सीटें छीनकर उसे 99 पर सिमटाते हुए जोड़तोड़ की सरकार बनाने को मजबूर कर दिया था, लेकिन बृहस्पतिवार को ईवीएम खुली तो मसला कुछ और ही था। पिछले लोकसभा चुनाव में 59.05 फीसदी मतों के साथ सभी 26 लोकसभा सीटों पर क्लीन स्वीप करने वाली भाजपा ने सफलता को दोहराया ही नहीं बल्कि अपना मत प्रतिशत भी 62.21 पर पहुंचा दिया।
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नरेंद्र मोदी भले ही पांच साल पहले गुजरात छोड़कर देश की सत्ता संभालने दिल्ली आ गए हों, लेकिन राज्य के मतदाताओं के लिए आज भी वही सबसे बड़ा मुद्दा हैं। प्रदेश ने भाजपा की झोली में इस बार भी 26 सीटे डाली है। 2014 में यहां के मतदाताओं ने अपने मुख्यमंत्री को देश का प्रधानमंत्री बनाने के लिए भाजपा को राज्य की सभी 26 लोकसभा सीटों पर क्लीन स्वीप कराया, तो इस बार उन्होंने मोदी के ऊपर लगाए जा रहे राफेल घपले, चौकीदार चोर जैसे लांछनों का जवाब देने के लिए मतदान किया।
इसी का नतीजा रहा कि महज दो साल पहले विधानसभा चुनावों में भाजपा को नाकों चने चबवा देने वाली कांग्रेस का लगातार दूसरी बार सूपड़ा साफ हो गया। शहरी मतदाताओं के लिए रोजगार सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बताया जा रहा था। सुरक्षा व्यवस्था, फसलों की उचित कीमत और सार्वजनिक परिवहन जैसी सुविधाएं आैर अलग-अलग समुदायों द्वारा आरक्षण की मांग भी अपने आप में बड़ा मुद्दा थी, लेकिन परिणाम बताते हैं कि अंत में सिर्फ मोदी इस राज्य में बडा मुद्दा साबित हुए।
भाजपा विरोधी ‘युवा त्रिमूर्ति’ का जादू फेल
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सफलता का श्रेय अल्पेश ठाकोर, जिग्नेश मेवाणी और हार्दिक पटेल की ‘युवा त्रिमूर्ति’ के जादू को दिया गया था, लेकिन इस बार यह तिकड़ी फेल हो गई। ठाकोर कांग्रेस में नहीं थे और हार्दिक का नामांकन ही खारिज हो गया था। वहीं, जिग्नेश मेवाणी भी कांग्रेस के सदस्य नहीं है।
2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा से 20 सीटें छीनकर उसे 99 पर सिमटाते हुए जोड़तोड़ की सरकार बनाने को मजबूर कर दिया था, लेकिन बृहस्पतिवार को ईवीएम खुली तो मसला कुछ और ही था। पिछले लोकसभा चुनाव में 59.05 फीसदी मतों के साथ सभी 26 लोकसभा सीटों पर क्लीन स्वीप करने वाली भाजपा ने सफलता को दोहराया ही नहीं बल्कि अपना मत प्रतिशत भी 62.21 पर पहुंचा दिया।