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जान के साथ स्वदेशी करोबार पर भी भारी पड़ रहा चीनी मांझा

Sat, 20 Aug 2016 05:18 AM IST
गजेंद्र सिंह/ अमर उजाला,बरेली
गजेंद्र सिंह/ अमर उजाला,बरेली Updated Sat, 20 Aug 2016 05:18 AM IST
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along lives Chinese Manjha also took indigenous businesses
दिल्ली, गाजियाबाद, रामपुर समेत कई शहरों में उलझकर जान गंवा चुके हैं लोग - फोटो : getty
चाइनीज मांझा लोगों की जान पर ही नहीं देश के कारोबार पर भी भारी पड़ रहा है। दिल्ली में बीते 15 अगस्त को इसमें उलझ कर तीन लोगों की मौत हो गई और कई घायल हुए जबकि बुरी तरह जख्मी 800 पक्षियों को अस्पताल पहुंचाया गया। गाजियाबाद, रामपुर समेत अन्य जगहों पर भी इसमें उलझकर लोग जान गंवा चुके हैं। इसने देशभर में चर्चित रहे बरेली के दो सौ साल पुराने स्वदेशी मांझे के कारोबार को बुरी तरह प्रभावित किया है, नतीजतन बरेली का स्वदेशी मांझा कारोबार अंतिम सांसें गिन रहा है। 250 करोड़ रुपये का यह कारोबार अब महज सौ करोड़ पर सिमट गया है।
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गौरतलब है कि सात साल पहले बनना शुरू हुए चाइनीज मांझे ने जब धीरे-धीरे स्वदेशी मांझे के गढ़ बरेली में दस्तक देना शुरू किया तो शुरुआती हादसों को लेकर स्थानीय कारोबारियों ने इसका विरोध करना शुरू किया। तत्कालीन केंद्रीय मंत्रियों तक बात पहुंची, प्रदर्शन हुए, लेकिन नतीजा कुछ न निकला। जब चाइनीज मांझे की वजह से बरेलवी मांझे का निर्यात घटने लगा तो यह प्रधानमंत्री तक के चुनावी भाषणों का हिस्सा भी बना। हालांकि इसके संरक्षण के लिए सरकारी स्तर पर कोई कदम नहीं उठाए गए। हाल यह है कि दिल्ली के बाजार में बरेलवी मांझे की आमद नाममात्र है। मेरठ, बनारस में भी बरेलवी मांझे का कारोबार लगभग खत्म सा हो गया है। इस कारोबार से जुड़े 10 हजार से अधिक लोगों में से ज्यादातर ने दूसरे धंधे की ओर रुख किया है।
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कारोबारी इनाम अली बताते हैं कि पहले बरेली के बाकरगंज, नवदिया, स्वालेनगर, अशरफ खां छावनी समेत कई इलाकों में बनने वाले इस मांझे के दो-दो सौ कार्टून एक सीजन में निर्यात होते थे, लेकिन अब मात्र पांच से 10 कार्टून ही निर्यात होते हैं। बरेली का मांझा अब केवल लखनऊ, फ र्रु खाबाद, मेरठ, बनारस, कानपुर, औरंगाबाद, नागपुर, नासिक, अहमदाबाद, सूरत, जयपुर, पंजाब, मलेशिया, सउदी अरब, नेपाल के बाजार में जा रहा है। इनाम बताते हैं कि पहले के मुकाबले सिर्फ 20 फीसदी माल ही बरेली में तैयार हो रहा है। 
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चाइनीज मांझे पर इसलिए नहीं लग पा रही रोक

along lives Chinese Manjha also took indigenous businesses
- ढाई सौ करोड़ रुपये से सिमटकर सौ करोड़ पर आया बरेलवी मांझे का कारोबार - फोटो : getty
कारोबारी निजाम अली के मुताबिक चाइनीज मांझे का कारोबार मजबूत लोग कर रहे हैं इसलिए उन पर कार्रवाई नहीं हो रही। शासन और प्रशासन को ऐसे कारोबारियों की पूरी सूची सौंपी गई है, माल पकड़वाया गया है लेकिन सब छूट गए। चाइनीज मांझे पर रोक इसलिए भी नहीं लग पा रही है क्योंकि यह काफी सस्ता है। जल्द खराब न होने के कारण यह बिकता भी अधिक है।

जानलेवा है चाइनीज मांझा
45 साल से मांझा बनाने के कारोबार से जुड़े इदरीस मंसूरी बताते हैं कि बरेली का मांझा बनाने में चावल, सरेस, रंग और सूती धागे का इस्तेमाल होता है। इसे धारदार बनाने के लिए कांच का बुरादा लगाया जाता है। दूसरी ओर चाइनीज मांझा प्लास्टिक के धागे से तैयार होता है। इस पर लोहे का बुरादा लगा होता है, जिससे करेंट प्रवाहित होने का खतरा बना रहता है। यह गलता भी नहीं है। जब यह गर्दन में फंसता है तो टूटता नहीं है और लोग जान तक गवां बैठते हैं। चाइनीज मांझा नॉन बायो डिग्रेडेबिल होता है, यानि इसका विघटन जमीन में नहीं हो पाता है। बरेलवी मांझा सूती धागे का होने के कारण पानी में गिरकर गल जाता है।  

इस तरह से चाइनीज मांझे ने जमाई जड़
ईनाम अली ने बताया कि शुरू में मुंबई के हाजी शाहवान ने चीन से लाकर इसे मुंबई में बेचा था। इसके बाद मुंबई में ही बनना शुरू हुआ, फिर सप्लाई शुरू हुई। कई हादसे होने के बाद बरेली में बिक्री बंद होने पर लोग मुरादाबाद, रामपुर से प्लास्टिक मांझा लाकर बेचने लगे और मात्र सात साल में स्वदेशी मांझे के कारोबार को चौपट कर दिया। 

दिल्ली में प्रतिबंधित
16 अगस्त 2016 को दिल्ली सरकार ने राजधानी में चीनी मांझे की बिक्री और उसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया। साथ ही इससे संबंधित ड्रॉफ्ट अधिसूचना भी जारी कर दी। अंतिम अधिसूचना 60 दिन बाद जारी होगी।
 
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