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कर्नाटक में जिसके साथ लिंगायत उसकी सरकार, जानिए क्या सचमुच हिंदुओं से अलग है यह समुदाय

Fri, 27 Apr 2018 12:06 PM IST
शरद गुप्ता, नई दिल्ली
शरद गुप्ता, नई दिल्ली Updated Fri, 27 Apr 2018 12:06 PM IST
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17% population of karnataka is lingayat, know how lingayat is different from hindus

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का लिंगायत को अल्पसंख्यक का दर्जा देने का फैसला कर्नाटक चुनाव का नतीजा प्रभावित कर सकता है? आखिर कौन हैं लिंगायत? क्या लिंगायत और वीरशैव एक ही हैं या अलग-अलग? क्या ये दोनों हिंदू धर्म का हिस्सा हैं? कर्नाटक में 17 फीसदी आबादी वाले लिंगायत राज्य का सबसे बड़ा वोट बैंक है। कर्नाटक में अधिकतर उसी पार्टी की सरकार बनती है, जिसके पक्ष में लिंगायत होते हैं। इसलिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी तक सभी लिंगायत धर्मगुरुओं के चक्कर काट रहे हैं ताकि यह समुदाय उन्हें एकमुश्त वोट दे।

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लिंगायत दरअसल, बारहवीं शताब्दी के संत वासवन्ना के शिष्य हैं। वासवन्ना ने हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ लिंगायत को एक अलग धर्म के रूप में स्थापित किया था। उन्होंने इसे शरण आंदोलन का नाम दिया था। उन्होंने अपने अनुयायियों से शास्त्रों का त्यागने करने का आह्वान किया था। उनकी जगह वह अपने उपदेशों (वचनों) को मानने को कहते थे।
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लिंगायत अलग कैसे?

लिंगायत मूर्ति पूजा नहीं करते हैं। वे शिवलिंग की तरह दिखने वाले एक छोटे लिंग की पूजा करते हैं और उसे तावीज की तरह हर समय साथ रखते हैं। उनमें जाति-भेद नहीं है और पुरुषों और महिलाओं को समान दर्जा प्राप्त है। उनमें शव का दाह संस्कार नहीं किया जाता, बल्कि दफनाया जाता है - वह भी बैठी हुई मुद्रा में। यही वजह है कि वे अपने को हिंदू धर्म से अलग दर्जे की मांग कर रहे हैं। वे कर्नाटक के अलावा तेलंगाना, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में भी रहते हैं।

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जानिए कौन हैं वीरशैव

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वीरशैव कौन हैं?

वहीं, सोलहवीं शताब्दी में बने वीरशैव वासवन्ना की जगह पांच पीठों को सर्वोच्च स्थान देते हैं जिन्हें पंचाचार्यों ने स्थापित किया था। वे शिवलिंग की ही नहीं, बल्कि शिवजी की मूर्ति पूजा भी करते हैं। वे वेद, पुराण, उपनिषद सभी हिंदू धर्मग्रंथों को मानते हैं। हालांकि उनका अपना भी एक धर्मग्रंथ कन्नड़ भाषा में है - सिद्धांत शिखामणि। वे जाति व्यवस्था को मानते हैं। लिंगानुभेद करते हैं। उनके यहां शव का दाह संस्कार किया जाता है। उनका मानना है कि पंचाचार्यों ने ही लिंगायत समुदाय की नींव रखी और वासवन्ना महज एक समाज सुधारक थे। कर्नाटक की आबादी का तीन फीसदी हिस्सा वीरशैव है। वे केवल कर्नाटक में ही रहते हैं।

भ्रम क्यों?

दरअसल, महाराजा बिजाला ने लिंगायतों को मान्यता नहीं दी थी। वासवन्ना के वचनों को जलवा दिया था। दूसरी ओर, हिंदू धर्म से लिंगायत बनने वाले बहुत से लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं को साथ ले आए। इसलिए, अब बहुत से लिंगायत खुद को हिंदू ही मानते हैं।

कांग्रेस को पसंद नहीं करते हैं लिंगायत

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कर्नाटक में माना जाता है कि उसी की सरकार बनती है, जिसके साथ लिंगायत होते हैं। चाहे वह जनता दल के रामकृष्ण हेगड़े हों या कांग्रेस के वीरेंद्र पाटिल। लेकिन राजीव गांधी द्वारा पाटिल का अपमान कर मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद से लिंगायतों ने कांग्रेस को वोट नहीं दिए। हेगड़े के बाद येदियुरप्पा उनके पसंदीदा नेता रहे।

सिद्धारमैया के कदम का क्या असर पड़ेगा?

सिद्धारमैया ने लिंगायत को अलग धर्म की मान्यता दी है, वीरशैव को नहीं। इससे वीरशैव नाराज हैं और सिद्धारमैया पर हिंदू धर्म को बांटने का आरोप लगा रहा है। लेकिन लिंगायत किसी हद तक खुश हैं। वे अपने को वैसे ही अलग धर्म मानते हैं जैसे जैन, बौद्ध या सिख। यही वजह है बीएस येद्दियुरप्पा ने मुख्यमंत्री रहते हुए लिंगायत को अलग धर्म की मान्यता देने की सिफारिश की थी। हालांकि तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार ने उसे खारिज कर दिया था लेकिन इस बार दोनों दलों ने अपने रुख बदल लिए हैं। लिंगायत किसका रुख पसंद कर रहे हैं, यह 12 मई को मतदान से ही पता चलेगा।

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