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फूफा पर निबन्ध
फीचर डेस्क, अमर उजाला
Updated Thu, 01 Mar 2018 12:01 PM IST
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बूआ के पति को फूफा कहते हैं। फूफाओं का बड़ा रोना रहता है शादी ब्याह में। किसी शादी में जब भी आप किसी ऐसे अधेड़ शख़्स को देखें जो पुराना, उधड़ती सिलाई वाला सूट पहने, मुंह बनाए, तना-तना सा घूम रहा हो। जिसके आसपास दो-तीन ऊबे हुए से लोग मनुहार की मुद्रा में हों तो बेखटके मान लीजिए कि यही बंदा दूल्हे का फूफा है।
ऐसे मांगलिक अवसर पर यदि फूफा मुंह न फुला ले तो लोग उसके फूफा होने पर ही संदेह करने लगते हैं। अपनी हैसियत जताने का आखिरी मौका होता है यह उसके लिए और कोई भी हिंदुस्तानी फूफा इसे गंवाता नहीं।
फूफा करता कैसे है यह सब ?
वह किसी न किसी बात पर अनमना होगा। चिड़चिड़ाएगा। तीखी बयानबाजी करेगा। किसी बेतुकी सी बात पर अपनी बेइज्जती होने की घोषणा करता हुआ किसी ऐसी जानी-पहचानी जगह के लिये निकल लेगा, जहां से उसे मनाकर वापस लाया जा सके।
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अगला वाजिब सवाल यह है कि फूफा ऐसा करता ही क्यों है ?
दरअसल फूफा जो होता है, वह व्यतीत होता हुआ जीजा होता है। वह यह मानने को तैयार नहीं होता है कि उसके अच्छे दिन बीत चुके और उसकी सम्मान की राजगद्दी पर किसी नए छोकरे ने जीजा होकर कब्जा जमा लिया है। फूफा, फूफा नहीं होना चाहता। वह जीजा ही बने रहना चाहता है और शादी-ब्याह जैसे नाजुक मौके पर उसका मुंह फुलाना, जीजा बने रहने की नाकाम कोशिश भर होती है।
फूफा को यह ग़लतफ़हमी होती है कि उसकी नाराज़गी को बहुत गंभीरता से लिया जायेगा। पर अमूमन ऐसा होता नहीं। लड़के का बाप उसे बतौर जीजा ढोते-ढोते ऑलरेडी थका हुआ होता है। ऊपर से लड़के के ब्याह के सौ लफड़े। इसलिए वह एकाध बार खुद कोशिश करता है और थक-हारकर अपने इस बुढ़ाते जीजा को अपने किसी नकारे भाईबंद के हवाले कर दूसरे ज्यादा जरूरी कामों में जुट जाता है। बाकी लोग फूफा के ऐंठने को शादी के दूसरे रिवाजों की ही तरह लेते हैं। वे यह मानते हैं कि यह यही सब करने ही आया था और वह अगर यही नहीं करेगा तो क्या करेगा।
जाहिर है कि वे भी उसे कतई तवज्जो नहीं देते। फूफा यदि थोड़ा-बहुत भी समझदार हुआ तो बात को ज्यादा लम्बा नहीं खींचता। वह माहौल भांप जाता है। मामला हाथ से निकल जाए, उसके पहले ही मान जाता है। बीबी की तरेरी हुई आंखें उसे समझा देती हैं कि बात को और आगे बढ़ाना ठीक नहीं। लिहाजा, वह बहिष्कार समाप्त कर ब्याह की मुख्य धारा में लौट आता है। हालांकि, वह हंसता-बोलता फिर भी नहीं और तना-तना सा बना रहता है। उसकी एकाध उम्रदराज सालियां और उसकी खुद की बीबी जरूर थोड़ी-बहुत उसके आगे-पीछे लगी रहती हैं। पर जल्दी ही वे भी उसे भगवान भरोसे छोड़-छाड़ दूसरों से रिश्तेदारी निभाने में व्यस्त हो जाती हैं।
फूफा बहादुर शाह जफर की गति को प्राप्त होता है। अपना राज हाथ से निकलता देख कुढ़ता है, पर किसी से कुछ कह नहीं पाता। मनमसोस कर रोटी खाता है और दूसरों से बहुत पहले शादी का पंडाल छोड़ खर्राटे लेने अपने कमरे में लौट आता है। फूफा चूंकि और कुछ कर नहीं सकता, इसलिए वह यही करता है।
इन हालात को देखते हुए मेरी आप सबसे यह अपील है कि फूफाओं पर हंसिये मत। आप आजीवन जीजा नहीं बने रह सकते। आज नहीं तो कल आपको भी फूफा होकर मार्गदर्शक मंडल का हिस्सा हो ही जाना है। आज के फूफाओं की आप इज्जत करेंगे, तभी अपने फूफा वाले दिनों में लोगों से आप भी इज्जत पा सकेंगे। एक फूफा की दर्द भरी दास्तान, सभी फुफओं को समर्पित।
ऐसे मांगलिक अवसर पर यदि फूफा मुंह न फुला ले तो लोग उसके फूफा होने पर ही संदेह करने लगते हैं। अपनी हैसियत जताने का आखिरी मौका होता है यह उसके लिए और कोई भी हिंदुस्तानी फूफा इसे गंवाता नहीं।
फूफा करता कैसे है यह सब ?
वह किसी न किसी बात पर अनमना होगा। चिड़चिड़ाएगा। तीखी बयानबाजी करेगा। किसी बेतुकी सी बात पर अपनी बेइज्जती होने की घोषणा करता हुआ किसी ऐसी जानी-पहचानी जगह के लिये निकल लेगा, जहां से उसे मनाकर वापस लाया जा सके।
अगला वाजिब सवाल यह है कि फूफा ऐसा करता ही क्यों है ?
दरअसल फूफा जो होता है, वह व्यतीत होता हुआ जीजा होता है। वह यह मानने को तैयार नहीं होता है कि उसके अच्छे दिन बीत चुके और उसकी सम्मान की राजगद्दी पर किसी नए छोकरे ने जीजा होकर कब्जा जमा लिया है। फूफा, फूफा नहीं होना चाहता। वह जीजा ही बने रहना चाहता है और शादी-ब्याह जैसे नाजुक मौके पर उसका मुंह फुलाना, जीजा बने रहने की नाकाम कोशिश भर होती है।
फूफा को यह ग़लतफ़हमी होती है कि उसकी नाराज़गी को बहुत गंभीरता से लिया जायेगा। पर अमूमन ऐसा होता नहीं। लड़के का बाप उसे बतौर जीजा ढोते-ढोते ऑलरेडी थका हुआ होता है। ऊपर से लड़के के ब्याह के सौ लफड़े। इसलिए वह एकाध बार खुद कोशिश करता है और थक-हारकर अपने इस बुढ़ाते जीजा को अपने किसी नकारे भाईबंद के हवाले कर दूसरे ज्यादा जरूरी कामों में जुट जाता है। बाकी लोग फूफा के ऐंठने को शादी के दूसरे रिवाजों की ही तरह लेते हैं। वे यह मानते हैं कि यह यही सब करने ही आया था और वह अगर यही नहीं करेगा तो क्या करेगा।
जाहिर है कि वे भी उसे कतई तवज्जो नहीं देते। फूफा यदि थोड़ा-बहुत भी समझदार हुआ तो बात को ज्यादा लम्बा नहीं खींचता। वह माहौल भांप जाता है। मामला हाथ से निकल जाए, उसके पहले ही मान जाता है। बीबी की तरेरी हुई आंखें उसे समझा देती हैं कि बात को और आगे बढ़ाना ठीक नहीं। लिहाजा, वह बहिष्कार समाप्त कर ब्याह की मुख्य धारा में लौट आता है। हालांकि, वह हंसता-बोलता फिर भी नहीं और तना-तना सा बना रहता है। उसकी एकाध उम्रदराज सालियां और उसकी खुद की बीबी जरूर थोड़ी-बहुत उसके आगे-पीछे लगी रहती हैं। पर जल्दी ही वे भी उसे भगवान भरोसे छोड़-छाड़ दूसरों से रिश्तेदारी निभाने में व्यस्त हो जाती हैं।
फूफा बहादुर शाह जफर की गति को प्राप्त होता है। अपना राज हाथ से निकलता देख कुढ़ता है, पर किसी से कुछ कह नहीं पाता। मनमसोस कर रोटी खाता है और दूसरों से बहुत पहले शादी का पंडाल छोड़ खर्राटे लेने अपने कमरे में लौट आता है। फूफा चूंकि और कुछ कर नहीं सकता, इसलिए वह यही करता है।
इन हालात को देखते हुए मेरी आप सबसे यह अपील है कि फूफाओं पर हंसिये मत। आप आजीवन जीजा नहीं बने रह सकते। आज नहीं तो कल आपको भी फूफा होकर मार्गदर्शक मंडल का हिस्सा हो ही जाना है। आज के फूफाओं की आप इज्जत करेंगे, तभी अपने फूफा वाले दिनों में लोगों से आप भी इज्जत पा सकेंगे। एक फूफा की दर्द भरी दास्तान, सभी फुफओं को समर्पित।