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Gujarat Election: इस दोस्त के बिना चुनाव में हार्दिक की जीत नहीं है आसान! वीरमगाम सीट पर इस बार मुश्किल है डगर

Tue, 22 Nov 2022 02:40 PM IST
Harendra Chaudhary वीरमगाम, गुजरात से आशीष तिवारी
वीरमगाम, गुजरात से आशीष तिवारी Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 22 Nov 2022 02:40 PM IST
सार

Gujarat Election: अहमदाबाद जिले की वीरमगाम सीट पर इस बार भाजपा ने कभी अपने सबसे प्रबल विरोधी रहे हार्दिक पटेल को चुनावी मैदान में उतारा है। वीरमगाम के सियासी गलियारों में चर्चा इसी बात की हो रही है कि 2017 के विधानसभा चुनावों के दौरान जिस तरीके से हार्दिक पटेल ने भाजपा के बड़े नेताओं से लेकर स्थानीय नेताओं को निशाने पर लिया था वह अब उनसे नाराज हैं...

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Gujarat Election: Hardik Patel should influence Thakor and Dalit community in Viramgam for win
Gujarat Election- Jignesh Mevani, Alpesh Thakor and Hardik Patel - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

वह साल 2017 था। मौसम विधानसभा के चुनावों का था और गुजरात की राजनीति में पाटीदार आंदोलन की गूंज हर ओर सुनाई पड़ रही थी। उस वक्त इस आंदोलन की अगुवाई करने वाले तीन युवा नेता हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी और अल्पेश ठाकोर जमकर भाजपा पर भड़क रहे थे। वक्त बढ़ता गया और हालात बदलते गए। कभी भाजपा पर अपनी भड़ास निकालने वाले और बड़े-बड़े नेताओं को निशाने पर लेने वाले हार्दिक पटेल अब उसी वीरमगाम विधानसभा सीट पर चुनावी मैदान में हैं, जहां वह खुलकर भाजपा के नेताओं को निशाने पर लेते थे। यही वजह है कि इस विधानसभा सीट के पुराने कद्दावर नेता हार्दिक पटेल के लिए चुनावी राह आसान नहीं होने देना चाहते। दरअसल इस सीट के जातिगत समीकरणों के आधार पर और व्यक्तिगत विरोध के आधार पर हार्दिक पटेल की सीट बहुत आसान नजर नहीं आ रही है। सियासी गलियारों में चर्चा इस बात की है कि जब तक हार्दिक पटेल, ठाकोर समाज और दलित समुदाय में अपनी मजबूत पैठ नहीं बनाते हैं, तब तक यह सीट उनके लिए कांटे के टक्कर वाली ही बनी रहेगी। ऐसे में हार्दिक पटेल को ठाकोर समुदाय और दलित समुदाय को अपने पक्ष में करने के लिए अपने पुराने दोस्तों की जरूरत पड़ेगी।

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2017 में हार्दिक के निशाने पर थे भाजपा नेता

दरअसल अहमदाबाद जिले की वीरमगाम सीट पर इस बार भाजपा ने कभी अपने सबसे प्रबल विरोधी रहे हार्दिक पटेल को चुनावी मैदान में उतारा है। वीरमगाम के सियासी गलियारों में चर्चा इसी बात की हो रही है कि 2017 के विधानसभा चुनावों के दौरान जिस तरीके से हार्दिक पटेल ने भाजपा के बड़े नेताओं से लेकर स्थानीय नेताओं को निशाने पर लिया था वह अब उनसे नाराज हैं। इस नाराजगी का खामियाजा हार्दिक पटेल को चुनाव में विधानसभा के नतीजों में दिख सकता है। वीरमगाम के लाला भाई पटेल कहते हैं कि आंदोलन अपनी जगह था, लेकिन हार्दिक पटेल ने जिस तरीके से बीते विधानसभा चुनावों में और उसके बाद कांग्रेस में आने के बाद स्थानीय नेताओं को खुलकर खरी-खोटी सुनाई थी, उससे स्थानीय भाजपा नेता और जातिगत समीकरणों को साधने वाले वोटर नाराज बताए जा रहे हैं। लाला भाई कहते हैं कि सिर्फ पटेल का तमगा लगे होने से वीरमगाम की विधानसभा सीट पर जीत आसान नहीं हो जाती है।

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दरअसल वीरमगाम विधानसभा की सीट पर जातिगत समीकरणों का ऐसा ताना-बाना है, जिसमें सिर्फ पाटीदार होने का मतलब ही जीत का प्रमाण पत्र नहीं माना जाता है। इस विधानसभा सीट पर तकरीबन तीन लाख मतदाता हैं। इसमें सबसे ज्यादा 65 हजार के करीब ठाकोर (ओबीसी) मतदाता है। इस विधानसभा सीट पर 50 हजार मतदाता पाटीदार समुदाय के आते हैं। 35 हजार वोटर दलित समुदाय के जबकि 20 हजार भारवाड़ और रबारी समुदाय के मतदाता इस विधानसभा सीट पर हैं। वीरमगाम में करीब 20 हजार मतदाता मुस्लिम समुदाय से आते हैं। 18 हजार वोटर कोली समुदाय और 10 हजार कराड़िया (ओबीसी राजपूत) समुदाय के वोटर इस विधानसभा सीट पर हैं। वीरमगाम विधानसभा सीट पर इन जातिगत समीकरण के आधार पर पाटीदार मुस्लिम राजपूत और ओबीसी समुदाय से जुड़े हुए नेता विधायक भी बने हैं।

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हार्दिक के नामांकन से गायब रहे कई नेता

राजनीतिक मामलों के जानकार हरबेल कराडिया कहते हैं कि वीरमगाम सीट पर हार्दिक पटेल के लिए चुनौतियां सबसे ज्यादा हैं। इसकी कई वजह हैं, इसमें पहली वजह तो यही है कि भाजपा के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं में हार्दिक पटेल को लेकर जबरदस्त विरोध है। विरोध की वजह बिल्कुल सीधी और सपाट है कि बीते विधानसभा चुनावों में उन्होंने भाजपा को हराने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। इसके अलावा जब हार्दिक कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रहे, तो चुनाव लड़ने से चंद महीने पहले तक वह भाजपा की नीति और उनके कार्यकर्ताओं को हर वक्त निशाने पर लेकर रहते थे। वह कहते हैं कि गुजरात की राजनीति में इस बात की चर्चा खुले तौर पर हो रही है कि भाजपा के बड़े नेता और रणनीतिकार हार्दिक पटेल को पसंद नहीं करते हैं। यही वजह रही कि भाजपा की ओर से बीते मंगलवार को जब वीरमगाम में हार्दिक पटेल का नामांकन हुआ, तो मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री या पूर्व उप मुख्यमंत्री जैसे बड़े नेता हार्दिक पटेल के नामांकन से नदारद दिखे।

राजनीतिक विश्लेषक कराड़िया कहते हैं कि अगर हार्दिक पटेल को चुनावी मैदान में जीतना है तो उनको सिर्फ पाटीदार समुदाय ही नहीं बल्कि ठाकोर और दलितों को बेहतर तरीके से साधना होगा। इसके लिए हार्दिक पटेल को अपने दो चुनिंदा दोस्तों का सहारा लेना बेहद जरूरी है। इसमें पहला नाम अल्पेश ठाकोर और दूसरा जिग्नेश मेवानी का आता है। क्योंकि जिग्नेश मेवानी खुद कांग्रेस से चुनाव लड़ रहे हैं, इसलिए वह हार्दिक पटेल के साथ तो जुड़ने से रहे। रही बात अल्पेश ठाकोर की तो वह भी गुजरात के गांधीनगर से चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। कराड़या कहते हैं कि हार्दिक पटेल को सिर्फ मैदान में बाजी मारने के लिए पटेल समुदाय ही नहीं बल्कि ठाकोर समुदाय और दलित समुदाय का भी समर्थन चाहिए होगा। क्योंकि पिछले चुनाव में कांग्रेस के नेता लाखाभाई भरवाड ने भाजपा की पाटीदार नेता तेजश्री पटेल को चुनावी मैदान में परास्त कर दिया था। ऐसे में जातिगत समीकरणों को साधते हुए हार्दिक पाटिल को ठाकोर समुदाय से जुड़ने के लिए अपने दोस्त अल्पेश ठाकोर सहारा चाहिए होगा। हालांकि भाजपा के खाते में ठाकोर समुदाय शुरुआत से ही जुड़ा रहा है, लेकिन हार्दिक पटेल के पुराने विरोध के चलते ही समुदाय में भी उनके खिलाफ नाराजगी बनी हुई है।

नितिन भाई पटेल के बयान के सियासी मायने

गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश के कद्दावर पाटीदार नेताओं में शुमार किए जाने वाले नितिन भाई पटेल कहते हैं कि हार्दिक पटेल गुजरात के उन 182 प्रत्याशियों में से सिर्फ एक प्रत्याशी ही हैं, जो चुनावी मैदान में लड़ रहे हैं। नितिन भाई पटेल के इस बयान को राजनीतिक विश्लेषण केदारभाई राठौर एक दूसरे नजरिए से देख रहे हैं। राठौर कहते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री का यह कहना कि वह महज 182 प्रत्याशियों में से अकेले ऐसे प्रत्याशी ही हैं, इसका मतलब सियासी गलियारों में समझना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। वह कहते हैं कि स्थानीय स्तर पर हार्दिक पटेल को लेकर लोगों में नाराजगी चुनावी मैदान में रोड़े अटका रही है। यही वजह है कि अब सिर्फ हार्दिक पटेल ही नहीं और भाजपा को यह सीट निकलवाने के लिए पाटीदार, ठाकोर और दलित समेत भारवाड़ और रबारी समुदाय के मतदाओं को एकजुट करना ही होगा। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस सीट पर हार्दिक पटेल के लिए चुनौती यह भी है कि यहां के स्थानीय विधायक लाखाभाई भरवाड विपक्ष में रहने के बाद भी जनता से जुड़े रहे और जातिगत समीकरणों के आधार पर उन्होंने गोलबंदी भी मजबूत की है।

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