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विचार: निजी व सार्वजनिक भूमि पर धार्मिक गतिविधि में हाईकोर्ट की व्यवस्था

Tue, 05 May 2026 12:21 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्रा रितिका सिसोदिया
रितिका सिसोदिया Published by: कीर्तिवर्धन मिश्रा Updated Tue, 05 May 2026 12:21 PM IST
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Allahabad High Court Constitutional verdict Private and Public Land Religious Activity news and updates
Allahabad High Court - फोटो : एएनआई
लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उसमें अधिकार भी हैं और उन अधिकारों की सीमाएं भी स्पष्ट रूप से पारिभाषित हैं। एक माह के भीतर इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो फैसले, दो अलग-अलग समय में आए, लेकिन दोनों को मिलाकर पढ़ें तो एक स्पष्ट और संतुलित संवैधानिक दर्शन उभरकर सामने आता है। पहले फैसले में अदालत ने कहा था कि नमाजियों की संख्या सीमित करना गलत है, कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है। दूसरे फैसले में अदालत ने कहा कि सार्वजनिक भूमि पर सबका समान अधिकार है, और निजी स्थल पर भी धार्मिक स्वतंत्रता असीमित नहीं है। यदि कोई गतिविधि सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने लगे तो उसे नियंत्रित करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है। सरकार लोक व्यवस्था के छिन्न-भिन्न होने का इंतजार नहीं कर सकती। ये दोनों फैसले विरोधाभासी नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं और मिलकर उस व्यवस्था को रेखांकित करते हैं, जिसके भीतर एक लोकतांत्रिक, बहुलवादी समाज में धर्म और कानून को साथ-साथ चलना होता है।
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इस न्यायिक दृष्टिकोण ने इस मूल सिद्धांत को रेखांकित किया है कि किसी भी नागरिक या समूह का अधिकार तभी तक सुरक्षित है, जब तक वह दूसरे नागरिकों के अधिकारों, सार्वजनिक व्यवस्था और सामूहिक हितों से टकराव नहीं पैदा करता। यह केवल एक कानूनी व्याख्या नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक चेतना का संकेत है, जो यह बताता है कि आधुनिक राज्य व्यवस्था व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामूहिक हितों के बीच संतुलन बनाकर ही चल सकती है।

सबसे पहले संभल के मूल विवाद को समझते हैं। यह विवाद एक ऐसी भूमि से संबंधित है जिसे याचिकाकर्ता अपनी निजी भूमि बताता है और उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर वहां नमाज अदा करने के लिए परमादेश जारी करने की मांग की थी। प्रारंभ में जिला प्रशासन ने यह निर्णय लिया था कि एक विशेष परिसर में नमाजियों की संख्या को सीमित किया जाए। आधार यह था कि भीड़ बढ़ने से कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित हो सकती है। यह प्रशासनिक दृष्टिकोण एहतियात और व्यवस्था बनाए रखने की भावना से प्रेरित था, लेकिन इस आदेश को चुनौती देते हुए मामला न्यायालय तक पहुंचा। न्यायपालिका ने अपने पहले निर्णय में कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य का मूल दायित्व है। न्यायालय के उस आदेश का भावार्थ यह था कि यदि प्रशासन यह मान ले कि किसी धार्मिक गतिविधि के कारण स्वाभाविक रूप से व्यवस्था बिगड़ सकती है, और उसी आधार पर प्रतिबंधात्मक कदम उठाए जाएं, तो यह दृष्टिकोण संविधान की भावना के विपरीत होगा।
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लेकिन इस पूरे विवाद का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जिसे बाद में न्यायालय के एक अन्य निर्णय में अधिक स्पष्टता के साथ सामने रखा गया। इस दूसरे दृष्टिकोण ने सार्वजनिक भूमि, निजी संपत्ति और धार्मिक गतिविधियों के बीच संतुलन की संवैधानिक सीमा को विस्तार से समझाया। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि किसी भी अधिकार की रक्षा तभी तक की जा सकती है, जब तक वह सार्वजनिक हित और अन्य नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित नहीं करता।

इस संदर्भ में न्यायालय ने निजी और सार्वजनिक गतिविधियों के बीच अंतर को अत्यंत स्पष्ट शब्दों में रखा है कि निजी प्रार्थना, पारिवारिक पूजा, और ऐसी सीमित भक्ति गतिविधि जो वास्तव में परिसर के लिए आंतरिक रहती है, सामान्यतः अनुच्छेद 25 और 26 के संरक्षित क्षेत्र में आती है। यह पंक्ति इस बात की पुष्टि करती है कि संविधान व्यक्ति की आस्था और निजी जीवन की स्वतंत्रता को पूर्ण संरक्षण देता है, लेकिन इस संरक्षण की एक सीमा भी है। यह केवल तब तक लागू है जब तक गतिविधि वास्तव में निजी और सीमित बनी रहती है।
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संभल विवाद के संदर्भ में यही प्रश्न केंद्रीय था कि क्या किसी निजी या सीमित स्थान पर होने वाली गतिविधि धीरे-धीरे सार्वजनिक स्वरूप ग्रहण कर रही थी? न्यायालय ने इस पहलू को अत्यंत व्यावहारिक दृष्टि से देखा और कहा कि जैसे ही कोई गतिविधि ‘सामूहिक चरित्र’ ग्रहण करती है, वह केवल आंतरिक आस्था का विषय नहीं रह जाती। अदालत के शब्दों में, ‘एक बार जब गतिविधि ऐसा सामूहिक चरित्र ग्रहण कर लेती है, तो यह केवल आंतरिक आस्था का मामला नहीं रह जाता।’ इस परिवर्तन के साथ ही उसके प्रभाव भी व्यापक हो जाते हैं। प्रवेश और निकास से लेकर यातायात और पार्किंग संबंधी चिंताएं पैदा हो सकती है, इलाके का चरित्र बदल सकता है, शोर उत्पन्न हो सकता है, पुलिस व्यवस्था की आवश्यकता हो सकती है और संवेदनशील क्षेत्रों में, अंतर-समुदाय तनाव की आशंका पैदा कर सकती है। कोर्ट की अवधारणा स्पष्ट है कि अधिकार केवल घोषित नहीं होते, उनका प्रभाव भी उनकी प्रकृति निर्धारित करता है।  

प्रशासन का दायित्व केवल कानून लागू करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि किसी भी गतिविधि से समाज में असंतुलन न पैदा हो। यही कारण है कि न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई गतिविधि कानून-व्यवस्था को प्रभावित करने की संभावना रखती है, तो राज्य को हस्तक्षेप का पूरा अधिकार है।

संभल का यह विवाद अंततः हमें एक व्यापक सिद्धांत की ओर ले जाता है कि लोकतंत्र केवल अधिकारों का संग्रह नहीं है, बल्कि संतुलित जिम्मेदारियों का ढांचा है। भारत जैसे बहुलवादी लोकतंत्र की आत्मा एक ही सूत्र में बंधी है- सबके लिए एक कानून, सबके लिए एक मापदंड। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल के संदर्भ में जो रेखा खींची है, वह केवल एक जिले के एक मुकदमे की रेखा नहीं है, यह उस सिद्धांत की रेखा है जो कहती है कि भारत में न कोई भीड़ कानून से बड़ी है, न कोई धर्म, न कोई राजनीतिक दबाव। जो कानून के दायरे में है, वह स्वीकार्य है, जो उससे बाहर है, वह नहीं।

(ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक रितिका सिंह 'सिसोदिया' इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में अधिवक्ता हैं।)
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