रेस 2: शातिरपन और चालाकियों की कहानी
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अब्बास मस्तान की दूसरी फिल्मों की तरह 'रेस 2' भी चालाकियों और शातिरपन की फिल्म है। विदेशी लोकशन, बड़े होटल, भव्य कसिनो, पानी की तरह बहती महंगी शराब और हजारों डालरों की शब्दावली के बीच फिल्म के किरदार एक-दूसरे के खिलाफ साजिश रच रहे होते हैं। यहां कोई हीरो या कोई विलेन भी नहीं होता। जिसकी चाल सही पड़ जाए वह हीरो। फिल्म के किरदार काम नहीं कारनामे कर रहे होते हैं। 'रेस 2' एक सस्पेंस फिल्म न होकर एक बदले की फिल्म लगती है। फर्क बस इतना है कि फिल्म के किरदार 80 के दशक की फिल्मों की तरह एक-दूसरे को चाकू से गोदकर बदला लेने के बजाय कूल रहकर अपने शातिरपन से बदला लेते हैं।
फिल्म में यह बदले की कहानी जान अब्राहम और सैफ अली खान के बीच रची गयी है। इस बीच दर्शक इन दोनों की बड़ी-बड़ी कूटनीतिक बातों से बोर न होने लगे इसलिए बीच-बीच में अनिल कपूर और अमीषा पटेल के बीच होने वाली द्विअर्थी बातें जोक के रूप में डाल दी गयी है। जो हंसाती तो हैं लेकिन भद्दे तरीके से। दर्शकों की दिलचस्पी इस बात पर नहीं होती है कि फिल्म का क्लाइमेक्स क्या होता है। वह बस यह देखना चाहते हैं कि कौन सा किरदार किस पर भारी पड़ता है। अपनी चाल को अपनी जीत बनाने के लिए वह कौन सा मास्टर स्ट्रोक लगाता है। फिल्म के क्लाइमेक्स में यह साफ हो गया है कि 'रेस 2' के बाद अब 'रेस 3' भी दर्शकों को देखने को मिलेगी। क्योंकि बदला जितना पुराना होता है उतना ही मजेदार होता है।
कहानी
फिल्म का प्लांट इस्तांबुल में बुना गया होता है। फिल्म के पहले दृश्य में एक कार को बम से उड़ाते हुए दिखाया जाता है। बाद में पता चलता है कि इस कार में रणीवर सिंह (सैफ अली खान) की पत्नी बिपाशा बसु होती हैं। उनके मरवाने का काम अरमान मलिक (जॉन अब्राहम) ने किया होता है। तो रणवीर सिंह, अपनी पत्नी की मौत का बदला लेने के लिए अरमान मलिक को बर्बाद करने के लिए आते हैं। अरमान मलिक पांच कसीनो के मालिक हैं जिनके पास हजारों अरब डालर की संपत्ति होती है। अरमान मलिक से बदला लेने से पहले रणवीर उनका विश्वास जीतते हैं।
एक बार जब दोनों एक दूसरे से मिलकर काम करना शुरू कर देते हैं तो वहीं से शह और मात का खेल शुरू होता है। अरमान मलिक की बहन इलीना (दीपिका पादुकोण) और उसकी प्रेमिका अमीषा (जैकलीन फर्नांडीज) कभी इस पाले तो कभी उस पाले दिखती हैं। फिल्म दिखाती है कि दोनों ही पक्ष एक-दूसरे की प्लानिंग के बारे में पहले से जानते हैं। फाइनल क्लाइमेक्स के पहले शह और मात के छोटे-छोटे खेल हैं। यह एक ऐसी रेस होती हैं जहां कोई किसी का नहीं होता। क्लाइमेक्स बस यह दिखाता है कि इस फाइनल रेस में कौन जीतता है। एक दोस्त के रूप में अनिल कपूर और उसकी सीक्रेट अमीषा पटेल की भी गैरजरूरी से भूमिकाएं फिल्म में बीच-बीच में आती रहती हैं।
अभिनय
इस फिल्म में हर किरदार का अपना एक नेचर है। उसे उस बस उस नेचर के अनुरूप ऐक्टिंग करनी थी। जैसे सैफ अली खान को चुप- चुप रहकर गिने-गुने संवाद बोलने थे तो दीपिका को एक शातिर पर नेकदिल लड़की दिखाना था। ऐसे में सभी किरदारों ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है। स्क्रिप्ट में ओवरऐक्टिंग की भरपूर गुंजाइश थी तो सबने ओवरऐक्टिंग भी की है। ऐक्टिंग के मामले में जॉन अब्राहम को सबसे बेहतर कहा जा सकता है। फिल्म में जैकलीन फर्नांडीज की भूमिका लगभग दीपिका पादुकोन जितनी ही है। उस भूमिका में जैकलीन अच्छी लगी है। सबसे ज्यादा निराश अनिल कपूर और अमीषा पटेल करते हैं। इस बात से नहीं कि उन्होंने अभिनय खराब किया बल्कि इस बात से कि इतना अधकचरा और बेतुका किरदार उन्होंने चुना क्यों। उन्हें इस फिल्म से निकाल भी दिया जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता। नायिकाओं की भूमिका वैसे भी फिल्म में बहुत मजबूत नहीं है। उन्हें डील हो जाने के बाद कैश के सूटकेश थामने होते हैं और बाद में होने वाली पार्टी में नायक के साथ नाचना होता है।
निर्देशन
फिल्म में सितारों की फौज खड़ा कर लेने पर एक खतरा यह हमेशा बना रहता है कि हर किरदार को कुछ-कुछ देर में स्क्रीन में लाया जरूर जाए। फिर उसकी जरूरत हो या न हो। कुछ ऐसा ही इस फिल्म के साथ भी हुआ है। अब्बास मस्तान की इस जोड़ी ने फिल्म में कुछ प्लाट ऐसे जोड़ दिए जिनको यदि हटा दिया जाता तो फिल्म और टाइट हो जाती। फिल्म के इन निर्देशकद्वय ने इस बात की पूरी कोशिश की है कि कोई भी किरदार निगेटिव या पॉजटिव न लगे। यहां पर वह कभी एक किरदार के दिमाग को तेज दिखाते तो कभी दूसरे को। शह और मात वाली फिल्मों का क्लाइमेक्स बहुत ही जबर्दस्त होना चाहिए। चूंकि दर्शक पूरी फिल्म में ही छोटे-छोटे कारनामे देख रहे होते हैं इसलिए वह अंत में एक बड़े क्लाइमेक्स की उम्मीद करते हैं। 'रेस 2' का क्लाइमेक्स उन्हें हैरान या प्रभावित नहीं कर पाया। उड़ते हुए प्लेन में फाइट के दृश्य को और भी बेहतर फिल्माया जा सकता था। कार के चारों कोनों पर पैराशूट बांधकर कार को प्लेन से नीचे कुदा देना रोमांच नहीं बल्कि हंसी पैदा करता है।
संगीत
फिल्म का संगीत फिल्म के किरदारों के अनुरूप है। जब फिल्म का ताना-बाना अंडरवर्ल्ड शातिरों के इर्द-गिर्द बुना गया है तो वहां गजल या ठुमरी की गुंजाइश तो बनती नहीं थी। और न ही प्रेम या बिछड़न गीतों की। फिल्म के सभी गाने तेज म्यूजिक के बीच में हैं। जहां तेज लेजर लाइटो और बैकग्राउंड म्यूजिक के बीच गाने के अल्फाज खो जैसे जाते हैं। फिर भी प्रीतम ने कई दृश्यों पर मौके के अनुरूप संगीत रचा है। 'पार्टी इन द माइंड' और 'लत लग गयी' गाने की फिल्मिंग अच्छी है।
क्यों देखें
यह देखने के लिए कि फिल्म के किरदार कितनी लंबी और बड़ी प्लानिंग कर सकते हैं। साथ ही यदि आपको सस्पेंस या हॉलीवुड की नकल में बनाए गए एक्शन दृश्यों को देखने का शौक हो।
क्यों न देखें
यदि आपको ऐसा सिनेमा सूट करता हो जिसे आप अपने से रिलेट कर सके। इस फिल्म का कोई भी किरदार आपको अपने बीच का नहीं लगेगा।