Dehati Disco Review: डांस मास्टर का बड़े परदे पर एक्टिंग डेब्यू, बेअसर रहा गणेश आचार्य का ‘देहाती डिस्को’
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डांस मूवीज सिनेमा की एक अहम श्रेणी रही है। मिथुन चक्रवर्ती को ‘डिस्को डांसर’ ने सुपर स्टार बनाया और गोविंदा को ‘इल्जाम’ और ‘लव 86’ ने। इन फिल्मों की जान इन फिल्मों के नायकों का नाच रहा। बाद में ऋतिक रोशन ने भी अपने डांस से ही करोड़ों फैंस बनाए और अपनी पिछली फिल्म ‘वॉर’ तक उनके ठुमके खूब कामयाब रहे। हिंदी फिल्मों के सितारों को परदे पर अलग अलग मुद्राओं के साथ नचाने वाले डांस मास्टर गणेश आचार्य का बड़ा नाम रहा है। नाम और पैसा कमाने के बाद अब वह अपना बचपन का सपना पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं फिल्म ‘देहाती डिस्को’ में। सनी देओल, सुनील शेट्टी जैसे तमाम बलिष्ठ नायकों की नकल करके अभिनय करने की कोशिश करते गणेश आचार्य इस फिल्म में वह सब करते दिख रहे हैं जो उन पर फबता नहीं है। उन पर सिर्फ डांस अच्छा लगता है और उसके लिए भी जो जरूरी लचक शरीर में चाहिए, वह उनका साथ छोड़ रही है।
प्यार को तरसते बेटे की कहानी
फिल्म ‘देहाती डिस्को’ अपने पिता के प्यार के लिए तरसते उस बेटे की कहानी है जिसे नाचने के कारण उसके महंत पिता ने बचपन में घर से निकाल दिया। ये बच्चा बड़ा होकर अपने बेटे में वह सब देखना चाहता है जो उसे कभी करने नहीं दिया गया। तीन पीढ़ियों के आदर्शों और उसूलों के टकराव, अलगाव और बिखराव की ये भावुक कहानी हो सकती थी। घर से निकाला गया बच्चा बढ़ी हुई दाढ़ी और 56 इंची सीना (इतना ही पेट भी) लेकर गांव वापस लौटता है। महंत के शिव मंदिर को इलाके के सांसद से खतरा है। वह विदेश से डांस सीखकर लौटे अपने बेटे के लिए मंदिर की जमीन पर डांस अकादमी खोलना चाहता है क्योंकि ऐसा उनके पुरोहित ने कह दिया है। मंदिर की जमीन बचाने के लिए डांस मुकाबला होता है और कहानी अपनी इति को पहुंचती है।
औसत कहानी पर बनी लचर फिल्म
गणेश आचार्य ने अपने बड़े परदे के लिए बनी फिल्म की कहानी खुद लिखी है। एक कोरियोग्राफर को बड़े परदे पर हीरो बनने के लिए डांस मूवी ही सबसे आसान रास्ता नजर आती है। प्रमुदेवा और रेमो डिसूजा शुरुआती कामयाबी पाने के बाद इस फॉर्मूले में फेल हो चुके हैं। गणेश आचार्य को इससे सबक लेना चाहिए था। उनकी कद काठी और चेहरा अब इस लायक नहीं है कि वह फिल्म ‘देहाती डिस्को’ के हीरो बनकर बड़े परदे पर डेब्यू करें। एक्टिंग बचपन से उनका सपना रहा। पिताजी भी उनके मुंबई हीरो बनने ही आए थे। अपने पिता के सपने को पूरा करने के लिए वह एक बेहतर कहानी पर इससे अच्छी फिल्म बना सकते थे।
गणेश आचार्य सबसे कमजोर कड़ी
फिल्म ‘देहाती डिस्को’ अपनी कहानी, अपनी पटकथा में ही पहली मात खाती है। एक चिर परिचित सी पृष्ठभूमि पर बनी ये फिल्म देखने के लिए हिम्मत बांधनी होती है। स्लो मोशन में संवाद बोलने का ये फिल्म रिकॉर्ड बना सकती है। गणेश आचार्य का अभिनय फिल्म की दूसरी बड़ी कमजोरी है। दृश्य कैसा भी हो, इसकी जरूरत का भाव कैसा भी हो, गणेश असित सेन की तरह संवाद बोलते बोलते बस फिल्म की लंबाई बढ़ाने की कोशिश करते दिखते हैं। फिल्म देखने भी लोग उन्हीं की वजह से पहुंचे तो जाहिर है कि पूरी समय ध्यान बस उनके अभिनय पर ही रहता है। फिल्म में अपने नाच का करतब दिखाने के मौके भी उन्होंने बहुत रखे हैं पर अब उनक शरीर में ‘मारा रे..’ जैसी लचक नहीं रही।
देखें कि न देखें...
फिल्म ‘देहाती डिस्को’ का मुख्य आकर्षण बस गणेश आचार्य ही हैं और वह ही दर्शकों को पूरी तरह निराश करते हैं। बाल कलाकार सक्षम प्रभावित करते हैं, लेकिन उनके अभिनय की मासूमियत बरकरार रहती तो अच्छा होता है। रवि किशन, राजेश शर्मा, मनोज जोशी जैसे कलाकारों ने अपना काम निपटा दिया है। तकनीकी रूप से भी फिल्म बहुत औसत है और वैसा ही साधारण सा है इसका संगीत। फिल्म को कुछ हफ्ते बाद ओटीटी पर देखना ही ठीक रहेगा। सिनेमाघरों मे जाकर समय निवेश लायक फिल्म नहीं है।