{"_id":"5e03aafd8ebc3e87ea506869","slug":"sushant-singh-talks-about-rangbaaz-to-rangbaaz-phirse","type":"story","status":"publish","title_hn":"यूपी के पहले 'रंगबाज' से लेकर 'रंगबाज फिर से' तक सुशांत की बात बेबाक, बोले- अभी तो मेरे हाथ खाली हैं","category":{"title":"Bollywood","title_hn":"बॉलीवुड","slug":"bollywood"}}
यूपी के पहले 'रंगबाज' से लेकर 'रंगबाज फिर से' तक सुशांत की बात बेबाक, बोले- अभी तो मेरे हाथ खाली हैं
Thu, 26 Dec 2019 12:19 AM IST
Mishra Mishra
मुंबई ब्यूरो, अमर उजाला
मुंबई ब्यूरो, अमर उजाला
Published by: Mishra Mishra
Updated Thu, 26 Dec 2019 12:19 AM IST
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Sushant Singh
- फोटो : amar ujala, mumbai
ओटीटी पर रिलीज हुई भारतीय वेब सीरीज में रंगबाज का नाम चोटी की पांच सीरीज में लिया जाता है। इसके दूसरे सीजन ‘रंगबाज फिर से’ में मशहूर अभिनेता सुशांत सिंह एक दमदार किरदार में नजर आ रहे हैं। कम लोग ही जानते होंगे कि बड़े परदे पर यूपी के पहले रंगबाज का किरदार निभाने वाले सुशांत सिंह पहले अभिनेता हैं। वह कहते हैं, “मैंने रंगबाज का पहला सीजन नहीं देखा। अच्छी बात ये है कि उसी मुद्दे पर मैंने एक फिल्म 'सहर' की थी। इन दोनों का विषय एक ही है। लेकिन अब मैं उस सीजन को जरूर देखूंगा।” निर्देशक कबीर कौशिक की फिल्म सहर पूर्वी उत्तर प्रदेश के पहले डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला और उसका एनकाउंटर करने वाले आईपीएस अधिकारी अरुण कुमार पर आधारित थी।
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तो अब रंगबाज फिर से में सुशांत किस तरह के रंगबाज बने हैं? इस सवाल पर वह कहते हैं, “मेरे किरदार का नाम जयराम गोदारा है। यह मेरी पहली वेब सीरीज है और इसके लिए मुझे अपनी बोली पर बहुत काम करना पड़ा। बोली सिखाने वाले कोच महादेव ने इसमें मेरी काफी मदद की। वेब सीरीज में सबकुछ करने के लिए काफी समय मिलता है। ये बात मुझे बहुत अच्छी लगी।”
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डिजिटल क्रांति के बाद से मोबाइल से लेकर मल्टीप्लेक्स तक इतना कुछ देखने को है तो दर्शक सही सामग्री का चुनाव कैसे करे? इस पर सुशांत हंसते हुए कहते हैं, “ये तो मेरे लिए भी बहुत मुश्किल है। सर्फिंग में ही बहुत वक्त निकल जाता है। लेकिन खुशी भी है कि देखने को इतना सब कुछ है। ये बदलाव बहुत ही अच्छा हुआ है और अच्छे लोगों को काम भी मिल रहा है।” तो अब इसके आगे? “अभी तो मेरे हाथ बिल्कुल खाली हैं। मेरे पास कोई काम नहीं है। एक फ्रीलान्स एक्टर की जिंदगी ऐसी ही होती है। आपको एक काम मिलता है, उससे आप थोड़ा पैसा कमाते हैं। जब खत्म हो जाता है तो फिर से नए की तलाश में निकल पड़ते हैं।” संतोषी प्रकृति के सुशांत अपना ये आशावादी नजरिया सामने रखते हुए बातचीत को विराम देते हैं।
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