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सीट का समीकरण: लंभुआ में बीते तीन में से दो चुनाव भाजपा के नाम, एक बार सपा ने मारी बाजी, ऐसा है इसका इतिहास
Mon, 26 Oct 2026 05:13 PM IST
अमन तिवारी
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
Published by: अमन तिवारी
Updated Mon, 26 Oct 2026 05:13 PM IST
सार
सुल्तानपुर जिले की लंभुआ विधानसभा सीट पर 1957 में पहला चुनाव हुआ था। शुरुआती दौर में कांग्रेस का दबदबा रहा, जबकि बाद के चुनावों में भाजपा, बसपा और सपा समेत कई दलों ने जीत दर्ज की। आइए इस विधानसभा सीट के बारे में विस्तार से जानते हैं...
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लंभुआ सीट का समीकरण
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
उत्तर प्रदेश की सियासत में विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर हलचल लगातार बढ़ रही है। राजनीतिक दलों ने अभी से चुनावी तैयारियां तेज कर दी हैं। भाजपा जहां अपनी सरकार को बरकरार रखने की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं विपक्ष सत्ता परिवर्तन के लिए नए समीकरण बनाने में जुटा है। उत्तर प्रदेश की चुनावी हलचल के बीच हम आपको प्रदेश की हर विधानसभा सीट के इतिहास और राजनीतिक परिदृश्य के बारे में विस्तार से बता रहे हैं। इसी कड़ी में आज बात सुल्तानपुर जिले की लंभुआ विधानसभा सीट की होगी। आइए, जानते हैं इस सीट का पूरा सियासी गणित और इतिहास क्या रहा है।
पहले जानते हैं लंभुआ विधानसभा सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं। इन्हीं में से एक जिला सुल्तानपुर है। जिले में कुल पांच विधानसभा सीटें आती हैं। इसमें- इसौली, सुल्तानपुर, सदर, लंभुआ और कादीपुर शामिल हैं। सीट का समीकरण की कड़ी में आज हम लंभुआ विधानसभा सीट की बात करेंगे। सुल्तानपुर जिले की लंभुआ विधानसभा सीट मूल रूप से साल 1957 में अस्तित्व में आई थी। यहां साल 1957 में पहला चुनाव हुआ था। यहां की पहली विधायक प्रभावती देवी बनी थीं। उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की थी।
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पहले जानते हैं लंभुआ विधानसभा सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं। इन्हीं में से एक जिला सुल्तानपुर है। जिले में कुल पांच विधानसभा सीटें आती हैं। इसमें- इसौली, सुल्तानपुर, सदर, लंभुआ और कादीपुर शामिल हैं। सीट का समीकरण की कड़ी में आज हम लंभुआ विधानसभा सीट की बात करेंगे। सुल्तानपुर जिले की लंभुआ विधानसभा सीट मूल रूप से साल 1957 में अस्तित्व में आई थी। यहां साल 1957 में पहला चुनाव हुआ था। यहां की पहली विधायक प्रभावती देवी बनी थीं। उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की थी।
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लंभुआ विधानसभा सीट का जातिगत समीकरण
लंभुआ विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में अनुसूचित जाति (दलित), ब्राह्मण, यादव, क्षत्रिय (ठाकुर) और मुस्लिम समुदाय की आबादी सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है। क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी अनुसूचित जाति (दलित) मतदाताओं की है, जो लगभग 22% हैं। इसके बाद ब्राह्मण मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 21% है, जबकि यादव मतदाताओं की आबादी लगभग 11% और क्षत्रिय (ठाकुर) मतदाताओं की हिस्सेदारी भी करीब 11% है। वहीं, मुस्लिम मतदाताओं की आबादी लगभग 10% है। अन्य प्रमुख वर्गों में कुर्मी समाज के मतदाता लगभग 8% हैं। इसके अलावा बाकी बचे मतदाता अन्य जातियों व समुदायों से आते हैं।
लंभुआ विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
1957: कांग्रेस के दबदबे के साथ शुरुआत
लंभुआ विधानसभा सीट के पहले यानी कि साल 1957 के चुनाव में कांग्रेस ने जीत हासिल की थी। चुनाव में कांग्रेस की प्रभावती देवी विजयी हुई थीं। उन्होंने निर्दलीय सावित्री देवी को 2,750 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में प्रभावती देवी को 11,917 वोट, जबकि सावित्री देवी को 9,167 वोट मिले।
लंभुआ विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में अनुसूचित जाति (दलित), ब्राह्मण, यादव, क्षत्रिय (ठाकुर) और मुस्लिम समुदाय की आबादी सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है। क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी अनुसूचित जाति (दलित) मतदाताओं की है, जो लगभग 22% हैं। इसके बाद ब्राह्मण मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 21% है, जबकि यादव मतदाताओं की आबादी लगभग 11% और क्षत्रिय (ठाकुर) मतदाताओं की हिस्सेदारी भी करीब 11% है। वहीं, मुस्लिम मतदाताओं की आबादी लगभग 10% है। अन्य प्रमुख वर्गों में कुर्मी समाज के मतदाता लगभग 8% हैं। इसके अलावा बाकी बचे मतदाता अन्य जातियों व समुदायों से आते हैं।
लंभुआ विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
1957: कांग्रेस के दबदबे के साथ शुरुआत
लंभुआ विधानसभा सीट के पहले यानी कि साल 1957 के चुनाव में कांग्रेस ने जीत हासिल की थी। चुनाव में कांग्रेस की प्रभावती देवी विजयी हुई थीं। उन्होंने निर्दलीय सावित्री देवी को 2,750 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में प्रभावती देवी को 11,917 वोट, जबकि सावित्री देवी को 9,167 वोट मिले।
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इन पार्टियों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : अमर उजाला
1962: लंभुआ में कांग्रेस ने दोहराई जीत
इस चुनाव में लंभुआ विधानसभा सीट पर कांग्रेस के उमा दत्ता विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनसंघ के उग्रसेन सिंह को 9,008 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में उमा दत्ता को 15,667 वोट, जबकि उग्रसेन सिंह को 6,659 वोट मिले।
1967: कांग्रेस ने लगाई जीत की हैट्रिक
1967 के यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस कं उमा दत्ता ने लगातार दूसरी बार और कांग्रेस ने लगातार तीसरी बार सीट पर जीत दर्ज की। उन्होंने भारतीय जनसंघ के यू.पी. सिंह को बेहद करीबी मुकाबले में 290 वोटों से हराया। चुनाव में उमा दत्ता को 20,773 वोट, जबकि यू.पी. सिंह को 20,483 वोट मिले।
1969: लंभुआ में पहली बार जीती भारतीय जनसंघ
1969 के चुनाव में लंभुआ विधानसभा सीट पर पहली बार भारतीय जनसंघ ने जीत दर्ज की। चुनाव में उदय प्रताप सिंह विजयी हुए। उन्होंने भारतीय क्रांति दल के श्रीपति मिश्र को 10,177 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में उदय प्रताप सिंह को 23,594 वोट, जबकि श्रीपति मिश्र को 13,417 वोट मिले।
1969 के चुनाव के बाद लंभुआ विधानसभा सीट का नाम बदलकर चांदा कर दिया गया, जिसके बाद यहां 2007 तक इसी नाम से चुनाव हुए। हालांकि, 2008 में परिसीमन के बाद चांदा सीट का नाम एक बार फिर से लंभुआ कर दिया गया।
इस चुनाव में लंभुआ विधानसभा सीट पर कांग्रेस के उमा दत्ता विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनसंघ के उग्रसेन सिंह को 9,008 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में उमा दत्ता को 15,667 वोट, जबकि उग्रसेन सिंह को 6,659 वोट मिले।
1967: कांग्रेस ने लगाई जीत की हैट्रिक
1967 के यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस कं उमा दत्ता ने लगातार दूसरी बार और कांग्रेस ने लगातार तीसरी बार सीट पर जीत दर्ज की। उन्होंने भारतीय जनसंघ के यू.पी. सिंह को बेहद करीबी मुकाबले में 290 वोटों से हराया। चुनाव में उमा दत्ता को 20,773 वोट, जबकि यू.पी. सिंह को 20,483 वोट मिले।
1969: लंभुआ में पहली बार जीती भारतीय जनसंघ
1969 के चुनाव में लंभुआ विधानसभा सीट पर पहली बार भारतीय जनसंघ ने जीत दर्ज की। चुनाव में उदय प्रताप सिंह विजयी हुए। उन्होंने भारतीय क्रांति दल के श्रीपति मिश्र को 10,177 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में उदय प्रताप सिंह को 23,594 वोट, जबकि श्रीपति मिश्र को 13,417 वोट मिले।
1969 के चुनाव के बाद लंभुआ विधानसभा सीट का नाम बदलकर चांदा कर दिया गया, जिसके बाद यहां 2007 तक इसी नाम से चुनाव हुए। हालांकि, 2008 में परिसीमन के बाद चांदा सीट का नाम एक बार फिर से लंभुआ कर दिया गया।
चांदा विधानसभा सीट का इतिहास
लंभुआ के बदले हुए नाम चांदा के नाम से यहां साल 1974 में पहला चुनाव हुआ। इसमें भारतीय जनसंघ के कुंवर श्रीपाल सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के ऋषि देव पांडे को 3,477 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में भारतीय जनसंघ के श्रीपाल सिंह को 21,511 वोट, जबकि ऋषि देव पांडे को 18,034 वोट मिले।
आपातकाल का समय
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
लंभुआ के बदले हुए नाम चांदा के नाम से यहां साल 1974 में पहला चुनाव हुआ। इसमें भारतीय जनसंघ के कुंवर श्रीपाल सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के ऋषि देव पांडे को 3,477 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में भारतीय जनसंघ के श्रीपाल सिंह को 21,511 वोट, जबकि ऋषि देव पांडे को 18,034 वोट मिले।
आपातकाल का समय
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
1977 के चुनाव में चांदा सीट पर पहली बार जीती जनता पार्टी
इस चुनाव में सुल्तानपुर जिले की चांदा विधानसभा सीट पर पहली बार जनता पार्टी की एंट्री हुई। चुनाव में उदय प्रताप सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के श्रीपति मिश्र को 11,494 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में उदय प्रताप सिंह को 25,922 वोट, जबकि श्रीपति मिश्र को 14,428 वोट मिले।
1980 में कांग्रेस ने मारी बाजी
इस चुनाव में चांदा विधानसभा सीट से कांग्रेस (आई) के राम सिंह विजयी हुए। उन्होंने जनता पार्टी (सेक्युलर) के ईश्वर दास वर्मा को 14,528 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में राम सिंह को 24,485 वोट, जबकि ईश्वर दास वर्मा को 9,957 वोट मिले।
1985: कांग्रेस ने दोहराई जीत
इस चुनाव में कांग्रेस के शिव नारायण मिश्रा विजयी हुए। उन्होंने लोकदल के सुभाष चंद्र त्रिपाठी को 9,846 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में शिव नारायण मिश्रा को 25,824 वोट, जबकि सुभाष चंद्र त्रिपाठी को 15,978 वोट मिले।
इस चुनाव में सुल्तानपुर जिले की चांदा विधानसभा सीट पर पहली बार जनता पार्टी की एंट्री हुई। चुनाव में उदय प्रताप सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के श्रीपति मिश्र को 11,494 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में उदय प्रताप सिंह को 25,922 वोट, जबकि श्रीपति मिश्र को 14,428 वोट मिले।
1980 में कांग्रेस ने मारी बाजी
इस चुनाव में चांदा विधानसभा सीट से कांग्रेस (आई) के राम सिंह विजयी हुए। उन्होंने जनता पार्टी (सेक्युलर) के ईश्वर दास वर्मा को 14,528 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में राम सिंह को 24,485 वोट, जबकि ईश्वर दास वर्मा को 9,957 वोट मिले।
1985: कांग्रेस ने दोहराई जीत
इस चुनाव में कांग्रेस के शिव नारायण मिश्रा विजयी हुए। उन्होंने लोकदल के सुभाष चंद्र त्रिपाठी को 9,846 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में शिव नारायण मिश्रा को 25,824 वोट, जबकि सुभाष चंद्र त्रिपाठी को 15,978 वोट मिले।
इन चेहरों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : अमर उजाला
1989 में जनता दल ने मारी बाजी
1989 के विधानसभा चुनाव में चांदा सीट पर पहली बार जनता दल ने जीत दर्ज की। चुनाव में अशोक कुमार पांडेय विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के शिव नारायण मिश्रा को 10,880 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में अशोक कुमार पांडेय को 37,216 वोट, जबकि शिव नारायण मिश्रा को 26,336 वोट मिले।
इन चुनावों के बाद राज्य में राजनीतिक अस्थिरता के चलते साल 1991, 1993 और 1996 के चुनाव हुए। इस दौरान सुल्तानपुर सीट का समीकरण बदलता रहा।
1991: पहली बार चांदा सीट पर भाजपा जीती
साल 1991 के चुनाव में चांदा सीट पर पहली बार भाजपा ने जीत दर्ज की। चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के अरुण प्रताप सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस (INC) के सुभाष चंद्र त्रिपाठी को 17,460 वोटों के अंतर से हराया।
1993: चुनाव में चांदा सीट पर बसपा की जीत
इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के सफदर रजा खान विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के अरुण प्रताप सिंह को 9,687 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में सफदर रजा खान को 44,920 वोट, जबकि अरुण प्रताप सिंह को 35,233 वोट मिले।
1989 के विधानसभा चुनाव में चांदा सीट पर पहली बार जनता दल ने जीत दर्ज की। चुनाव में अशोक कुमार पांडेय विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के शिव नारायण मिश्रा को 10,880 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में अशोक कुमार पांडेय को 37,216 वोट, जबकि शिव नारायण मिश्रा को 26,336 वोट मिले।
इन चुनावों के बाद राज्य में राजनीतिक अस्थिरता के चलते साल 1991, 1993 और 1996 के चुनाव हुए। इस दौरान सुल्तानपुर सीट का समीकरण बदलता रहा।
1991: पहली बार चांदा सीट पर भाजपा जीती
साल 1991 के चुनाव में चांदा सीट पर पहली बार भाजपा ने जीत दर्ज की। चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के अरुण प्रताप सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस (INC) के सुभाष चंद्र त्रिपाठी को 17,460 वोटों के अंतर से हराया।
1993: चुनाव में चांदा सीट पर बसपा की जीत
इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के सफदर रजा खान विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के अरुण प्रताप सिंह को 9,687 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में सफदर रजा खान को 44,920 वोट, जबकि अरुण प्रताप सिंह को 35,233 वोट मिले।
1996: भाजपा की हुई वापसी
इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के अरुण प्रताप सिंह विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के राम राज चौरसिया को 8,969 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में अरुण प्रताप सिंह को 45,421 वोट, जबकि राम राज चौरसिया को 36,452 वोट मिले।
2002: चांदा में पहली बार जीती सपा
इसके बाद राज्य में 2002 के चुनाव हुए। इस चुनाव में चांदा विधानसभा सीट पर पहली बार समाजवादी पार्टी (सपा) ने जीत दर्ज की। चुनाव में सपा के अनिल कुमार पांडेय विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के राम शिरोमणि वर्मा को 1,447 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में अनिल कुमार पांडेय को 36,078 वोट, जबकि राम शिरोमणि वर्मा को 34,631 वोट मिले।
2007: बसपा की हुई वापसी
इस चुनाव में 1993 के बाद बहुजन समाज पार्टी ने वापसी की। चुनाव में विनोद कुमार विजयी हुए। उन्होंने समाजवादी पार्टी के मनोज कुमार पांडेय को 15,764 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में विनोद कुमार को 40,537 वोट, जबकि मनोज कुमार पांडेय को 24,773 वोट मिले।
इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के अरुण प्रताप सिंह विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के राम राज चौरसिया को 8,969 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में अरुण प्रताप सिंह को 45,421 वोट, जबकि राम राज चौरसिया को 36,452 वोट मिले।
2002: चांदा में पहली बार जीती सपा
इसके बाद राज्य में 2002 के चुनाव हुए। इस चुनाव में चांदा विधानसभा सीट पर पहली बार समाजवादी पार्टी (सपा) ने जीत दर्ज की। चुनाव में सपा के अनिल कुमार पांडेय विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के राम शिरोमणि वर्मा को 1,447 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में अनिल कुमार पांडेय को 36,078 वोट, जबकि राम शिरोमणि वर्मा को 34,631 वोट मिले।
2007: बसपा की हुई वापसी
इस चुनाव में 1993 के बाद बहुजन समाज पार्टी ने वापसी की। चुनाव में विनोद कुमार विजयी हुए। उन्होंने समाजवादी पार्टी के मनोज कुमार पांडेय को 15,764 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में विनोद कुमार को 40,537 वोट, जबकि मनोज कुमार पांडेय को 24,773 वोट मिले।
2022 का नतीजा
- फोटो : अमर उजाला
इस चुनाव के बाद वर्ष 2008 में राज्य में परिसीमन हुआ। इसके तहत चांदा विधानसभा सीट का नाम बदलकर फिर से 'लंभुआ ' कर दिया गया। परिसीमन के बाद वर्ष 2012 में आयोजित 16वें उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र में लंभुआनाम से चुनाव संपन्न हुआ।
2012: लंभुआ से सपा ने जीती बाजी
2012 के चुनाव में सुल्तानपुर जिले की लंभुआ विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के संतोष पांडेय विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के विनोद सिंह को 17,372 वोटों के अंतर से हराया। संतोष पांडेय को 74,352 वोट, जबकि विनोद सिंह को 56,980 वोट मिले। वहीं, कांग्रेस के राम शिरोमणि वर्मा 24,534 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2017: लंभुआ विधानसभा सीट पर भाजपा ने मारी बाजी
इसके बाद राज्य में 2017 के चुनाव हुए। इस चुनाव में सुल्तानपुर जिले की लंभुआ विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के देवमणि द्विवेदी विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के विनोद सिंह को 12,903 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में देवमणि द्विवेदी को 78,627 वोट, जबकि विनोद सिंह को 65,724 वोट मिले। वहीं, समाजवादी पार्टी के संतोष पांडेय 47,633 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। ये आंकड़े ECI के विस्तृत चुनाव परिणाम से हैं।
2022: भाजपा की लगातार दूसरी जीत
इस चुनाव में सुल्तानपुर जिले की लंभुआ विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सीताराम वर्मा विजयी हुए। उन्होंने समाजवादी पार्टी (सपा) के संतोष पांडेय को 9,533 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में सीताराम वर्मा को 82,999 वोट, जबकि संतोष पांडेय को 73,466 वोट मिले। वहीं, बहुजन समाज पार्टी के अवनीश कुमार सिंह 42,119 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2012: लंभुआ से सपा ने जीती बाजी
2012 के चुनाव में सुल्तानपुर जिले की लंभुआ विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के संतोष पांडेय विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के विनोद सिंह को 17,372 वोटों के अंतर से हराया। संतोष पांडेय को 74,352 वोट, जबकि विनोद सिंह को 56,980 वोट मिले। वहीं, कांग्रेस के राम शिरोमणि वर्मा 24,534 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2017: लंभुआ विधानसभा सीट पर भाजपा ने मारी बाजी
इसके बाद राज्य में 2017 के चुनाव हुए। इस चुनाव में सुल्तानपुर जिले की लंभुआ विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के देवमणि द्विवेदी विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के विनोद सिंह को 12,903 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में देवमणि द्विवेदी को 78,627 वोट, जबकि विनोद सिंह को 65,724 वोट मिले। वहीं, समाजवादी पार्टी के संतोष पांडेय 47,633 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। ये आंकड़े ECI के विस्तृत चुनाव परिणाम से हैं।
2022: भाजपा की लगातार दूसरी जीत
इस चुनाव में सुल्तानपुर जिले की लंभुआ विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सीताराम वर्मा विजयी हुए। उन्होंने समाजवादी पार्टी (सपा) के संतोष पांडेय को 9,533 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में सीताराम वर्मा को 82,999 वोट, जबकि संतोष पांडेय को 73,466 वोट मिले। वहीं, बहुजन समाज पार्टी के अवनीश कुमार सिंह 42,119 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।