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सीट का समीकरण: भाजपा-सपा-कांग्रेस तीनों लगा चुके हैं यहां जीत की हैट्रिक, इस बार बदल गए हैं गौरीगंज के हालात
Tue, 20 Oct 2026 05:20 PM IST
अमन तिवारी
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
Published by: अमन तिवारी
Updated Tue, 20 Oct 2026 05:20 PM IST
सार
अमेठी जिले की गौरीगंज विधानसभा 1967 के विधानसभा चुनाव में अस्तित्व में आई थी। यहां के पहले चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार ने जीत दर्ज की थी। इसके बाद यहां से कांग्रेस, जनता पार्टी, भाजपा, बसपा और सपा सहित कई दलों ने समय-समय पर जीत हासिल की। आइए इस विधानसभा सीट के बारे में विस्तार से जानते हैं...
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गौरीगंज सीट का समीकरण
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
क्या 2027 में उत्तर प्रदेश में फिर से भाजपा की सरकार बनेगी, या 10 साल बाद विपक्ष वापसी करेगा? इसका जवाब तो अगले चुनाव के नतीजे ही देंगे। इस बीच सभी पार्टियों ने 2027 के चुनाव को लेकर अभी से तैयारियां शुरू कर दी हैं, जिससे राजनीतिक माहौल गरमा गया है। उत्तर प्रदेश की इसी चुनावी सरगर्मी के बीच, हम आपको राज्य की हर सीट के इतिहास और राजनीतिक परिदृश्य के बारे में विस्तार से बता रहे हैं। इसी कड़ी में आज बात अमेठी जिले की गौरीगंज विधानसभा सीट की होगी। आइए, जानते हैं इस सीट का पूरा सियासी गणित और इतिहास।
पहले जानते हैं गौरीगंज विधानसभा सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं। इन्हीं में से एक जिला अमेठी है। जिले के अंतर्गत कुल चार विधानसभा सीटें आती हैं- तिलोई, जगदीशपुर, गौरीगंज और अमेठी। सीट का समीकरण की कड़ी में आज हम गौरीगंज विधानसभा सीट की बात करेंगे। अमेठी जिले की गौरीगंज विधानसभा सीट साल 1967 में गौरीगंज नाम से नए स्वरूप में स्वतंत्र सीट के रूप में अस्तित्व में आई। इससे पहले यह विधानसभा कई अलग-अलग हिस्सों में विभाजित थी। हालांकि सीट पर पहला चुनाव साल 1967 में हुआ था। यहां से पहले विधायक जी. सिंह बने थे, जिन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव में जीत हासिल की थी।
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पहले जानते हैं गौरीगंज विधानसभा सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं। इन्हीं में से एक जिला अमेठी है। जिले के अंतर्गत कुल चार विधानसभा सीटें आती हैं- तिलोई, जगदीशपुर, गौरीगंज और अमेठी। सीट का समीकरण की कड़ी में आज हम गौरीगंज विधानसभा सीट की बात करेंगे। अमेठी जिले की गौरीगंज विधानसभा सीट साल 1967 में गौरीगंज नाम से नए स्वरूप में स्वतंत्र सीट के रूप में अस्तित्व में आई। इससे पहले यह विधानसभा कई अलग-अलग हिस्सों में विभाजित थी। हालांकि सीट पर पहला चुनाव साल 1967 में हुआ था। यहां से पहले विधायक जी. सिंह बने थे, जिन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव में जीत हासिल की थी।
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गौरीगंज विधानसभा सीट का जातिगत समीकरण
गौरीगंज विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में ब्राह्मण, क्षत्रिय, अनुसूचित जाति (दलित), मुस्लिम और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की आबादी सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है। क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी ब्राह्मण मतदाताओं की है, जो कुल वोट बैंक का लगभग 19% हैं। इसके बाद अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की सामूहिक हिस्सेदारी करीब 18% है। अनुसूचित जाति (SC) और मुस्लिम मतदाता भी लगभग बराबरी पर हैं, जिनकी आबादी क्रमशः 16% और 16% है। वहीं, क्षत्रिय (ठाकुर) मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 15% है। अन्य प्रमुख जातियों में यादव मतदाता करीब 5%, लोध समाज लगभग 4% और वैश्य मतदाता करीब 4% हैं।
गौरीगंज विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
1967: पहले चुनाव में निर्दलीय ने मारी बाजी
गौरीगंज विधानसभा सीट के पहले चुनाव यानी की साल 1967 के चुनाव में निर्दलीय प्रत्यासी ने जीत दर्ज की थी। चुनाव में जी. सिंह विजयी हुए थे। उन्होंने कांग्रेस के के. आर. पी. सिंह को 7,649 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में जी. सिंह को 18,758 वोट, जबकि के. आर. पी. सिंह को 11,109 वोट मिले थे।
गौरीगंज विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में ब्राह्मण, क्षत्रिय, अनुसूचित जाति (दलित), मुस्लिम और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की आबादी सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है। क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी ब्राह्मण मतदाताओं की है, जो कुल वोट बैंक का लगभग 19% हैं। इसके बाद अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की सामूहिक हिस्सेदारी करीब 18% है। अनुसूचित जाति (SC) और मुस्लिम मतदाता भी लगभग बराबरी पर हैं, जिनकी आबादी क्रमशः 16% और 16% है। वहीं, क्षत्रिय (ठाकुर) मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 15% है। अन्य प्रमुख जातियों में यादव मतदाता करीब 5%, लोध समाज लगभग 4% और वैश्य मतदाता करीब 4% हैं।
गौरीगंज विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
1967: पहले चुनाव में निर्दलीय ने मारी बाजी
गौरीगंज विधानसभा सीट के पहले चुनाव यानी की साल 1967 के चुनाव में निर्दलीय प्रत्यासी ने जीत दर्ज की थी। चुनाव में जी. सिंह विजयी हुए थे। उन्होंने कांग्रेस के के. आर. पी. सिंह को 7,649 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में जी. सिंह को 18,758 वोट, जबकि के. आर. पी. सिंह को 11,109 वोट मिले थे।
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इन पार्टियों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : अमर उजाला
1969: पहली बार जीती कांग्रेस
इसके बाद राज्य में साल 1969 और 1974 के चुनाव हुए। इन दोनों चुनावों में कांग्रेस ने जीत दर्ज की। 1969 के चुनाव में कांग्रेस ने पहली बार इस सीट पर जीत दर्ज की। चुनाव में कांग्रेस की राजपति देवी विजयी हुईं। उन्होंने भारतीय जनसंघ के रविंद्र प्रताप सिंह को 4,768 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में राजपति देवी को 19,024 वोट, जबकि रविंद्र प्रताप सिंह को 14,256 वोट मिले।
वहीं 1974 के चुनाव में कांग्रेस की राजपति देवी लगातार दूसरी बार विजयी हुईं। उन्होंने भारतीय जनसंघ के जमुना प्रसाद शुक्ला को 11,727 वोटों के बड़े अंतर से हराया। चुनाव में राजपति देवी को 22,785 वोट, जबकि जमुना प्रसाद शुक्ला को 11,058 वोट मिले।
आपातकाल का समय
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत नौ राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
इसके बाद राज्य में साल 1969 और 1974 के चुनाव हुए। इन दोनों चुनावों में कांग्रेस ने जीत दर्ज की। 1969 के चुनाव में कांग्रेस ने पहली बार इस सीट पर जीत दर्ज की। चुनाव में कांग्रेस की राजपति देवी विजयी हुईं। उन्होंने भारतीय जनसंघ के रविंद्र प्रताप सिंह को 4,768 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में राजपति देवी को 19,024 वोट, जबकि रविंद्र प्रताप सिंह को 14,256 वोट मिले।
वहीं 1974 के चुनाव में कांग्रेस की राजपति देवी लगातार दूसरी बार विजयी हुईं। उन्होंने भारतीय जनसंघ के जमुना प्रसाद शुक्ला को 11,727 वोटों के बड़े अंतर से हराया। चुनाव में राजपति देवी को 22,785 वोट, जबकि जमुना प्रसाद शुक्ला को 11,058 वोट मिले।
आपातकाल का समय
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत नौ राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
1977: गौरीगंज में पहली बार जीती जनता पार्टी
इस चुनाव में गौरीगंज विधानसभा सीट पर पहली बार जनता पार्टी ने जीत दर्ज की। चुनाव में अमेठी जिले की गौरीगंज विधानसभा सीट से जनता पार्टी के तेजभान सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस की राजपति देवी को 2,759 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में तेजभान सिंह को 15,947 वोट, जबकि राजपति देवी को 13,188 वोट मिले।
कांग्रेस ने की वापसी
इसके बाद राज्य में 1980, 1985 और 1989 के चुनाव हुए और इन तीनों ही चुनावों में कांग्रेस ने जीत का परचम लहराया। 1980 के चुनाव में कांग्रेस (आई) की राजपति देवी विजयी हुईं, उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के तेजभान सिंह को 11,410 वोटों के अंतर से हराया। इसके बाद 1985 के चुनाव में कांग्रेस की राजपति देवी ने एक बार फिर जीत दर्ज की और भाजपा के तेजभान सिंह को 3,252 वोटों से शिकस्त दी।
कांग्रेस ने लगाई जीत की हैट्रिक
वहीं 1989 के चुनाव में कांग्रेस की राजपति देवी लगातार तीसरी बार विजयी होकर जीत की हैट्रिक लगाने में कामयाब रहीं। उन्होंने एक बार फिर भाजपा के तेजभान सिंह को 15,212 वोटों के बड़े अंतर से हराया। इस चुनाव में राजपति देवी को 39,716 वोट मिले, जबकि तेजभान सिंह के खाते में 24,504 वोट आए।
इस चुनाव में गौरीगंज विधानसभा सीट पर पहली बार जनता पार्टी ने जीत दर्ज की। चुनाव में अमेठी जिले की गौरीगंज विधानसभा सीट से जनता पार्टी के तेजभान सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस की राजपति देवी को 2,759 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में तेजभान सिंह को 15,947 वोट, जबकि राजपति देवी को 13,188 वोट मिले।
कांग्रेस ने की वापसी
इसके बाद राज्य में 1980, 1985 और 1989 के चुनाव हुए और इन तीनों ही चुनावों में कांग्रेस ने जीत का परचम लहराया। 1980 के चुनाव में कांग्रेस (आई) की राजपति देवी विजयी हुईं, उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के तेजभान सिंह को 11,410 वोटों के अंतर से हराया। इसके बाद 1985 के चुनाव में कांग्रेस की राजपति देवी ने एक बार फिर जीत दर्ज की और भाजपा के तेजभान सिंह को 3,252 वोटों से शिकस्त दी।
कांग्रेस ने लगाई जीत की हैट्रिक
वहीं 1989 के चुनाव में कांग्रेस की राजपति देवी लगातार तीसरी बार विजयी होकर जीत की हैट्रिक लगाने में कामयाब रहीं। उन्होंने एक बार फिर भाजपा के तेजभान सिंह को 15,212 वोटों के बड़े अंतर से हराया। इस चुनाव में राजपति देवी को 39,716 वोट मिले, जबकि तेजभान सिंह के खाते में 24,504 वोट आए।
इन चेहरों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : अमर उजाला
1989 के बाद राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में 1991, 1993 और 1996 में चुनाव हुए। इन तीनों चुनावों में भाजपा ने जीत दर्ज की।
गौरीगंज सीट पर पहली बार जीती भाजपा
वर्ष 1991 के विधानसभा चुनाव में गौरीगंज सीट पर भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार जीत दर्ज की। इस चुनाव में भाजपा के तेजभान सिंह विजयी हुए और उन्होंने कांग्रेस की राजपति देवी को महज 189 वोटों के बेहद करीबी अंतर से हराया।
1993: भाजपा ने दोहराई जीत
इस चुनाव में भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरे तेजभान सिंह ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। इस बार उन्होंने समाजवादी पार्टी के शिव हरि विजय को 11,278 वोटों के अंतर से शिकस्त दी।
भाजपा ने लगाई जीत की हैट्रिक
1993 के बाद 1996 के यूपी विधानसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में भाजपा के तेजभान सिंह ने गौरीगंज सीट पर लगातार तीसरी बार जीत हासिल कर अपनी हैट्रिक पूरी की। इस कड़े मुकाबले में उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार नूर मोहम्मद को 602 वोटों के अंतर से हराया।
गौरीगंज सीट पर पहली बार जीती भाजपा
वर्ष 1991 के विधानसभा चुनाव में गौरीगंज सीट पर भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार जीत दर्ज की। इस चुनाव में भाजपा के तेजभान सिंह विजयी हुए और उन्होंने कांग्रेस की राजपति देवी को महज 189 वोटों के बेहद करीबी अंतर से हराया।
1993: भाजपा ने दोहराई जीत
इस चुनाव में भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरे तेजभान सिंह ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। इस बार उन्होंने समाजवादी पार्टी के शिव हरि विजय को 11,278 वोटों के अंतर से शिकस्त दी।
भाजपा ने लगाई जीत की हैट्रिक
1993 के बाद 1996 के यूपी विधानसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में भाजपा के तेजभान सिंह ने गौरीगंज सीट पर लगातार तीसरी बार जीत हासिल कर अपनी हैट्रिक पूरी की। इस कड़े मुकाबले में उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार नूर मोहम्मद को 602 वोटों के अंतर से हराया।
कांग्रेस ने तोड़ा भाजपा की जीत का सिलसिला
इन चुनावों के बाद राज्य में 2002 के चुनाव हुए। इस चुनाव में कांग्रेस ने लगातार तीन बार से सीट पर काबिज भाजपा को मात दी। चुनाव में कांग्रेस के नूर मोहम्मद विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के तेजभान सिंह को महज 267 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में नूर मोहम्मद को 29,944 वोट, जबकि तेजभान सिंह को 29,677 वोट मिले।
2003: उपचुनाव में पहली बार जीती बसपा
हालांकि, वर्ष 2002 के आम चुनाव के कुछ ही समय बाद कांग्रेस विधायक नूर मोहम्मद का असमय निधन हो गया था। इस कारण गौरीगंज सीट पर 2003 में उपचुनाव कराने पड़े। इस उपचुनाव में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के प्रत्याशी जंग बहादुर ने जीत हासिल की। गौरीगंज सीट के इतिहास में यह पहला मौका था, जब बहुजन समाज पार्टी ने यहां अपना खाता खोला और पहली बार जीत दर्ज की।
2007: बसपा ने दोहराई जीत
इस विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने गौरीगंज सीट पर लगातार दूसरी बार अपना कब्जा बरकरार रखा। इस चुनाव में बसपा के चंद्र प्रकाश विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के मोहम्मद नईम को 5,988 वोटों के अंतर से हराया। इस मुकाबले में चंद्र प्रकाश को 34,386 वोट, जबकि मोहम्मद नईम को 28,398 वोट मिले।
साल 2002 और 2007 के चुनाव के बाद गौरीगंज सीट पर नया राजनीतिक समीकरण देखने को मिला, जहां 2012, 2017 और 2022 के तीनों चुनावों में समाजवादी पार्टी का कब्जा रहा।
इन चुनावों के बाद राज्य में 2002 के चुनाव हुए। इस चुनाव में कांग्रेस ने लगातार तीन बार से सीट पर काबिज भाजपा को मात दी। चुनाव में कांग्रेस के नूर मोहम्मद विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के तेजभान सिंह को महज 267 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में नूर मोहम्मद को 29,944 वोट, जबकि तेजभान सिंह को 29,677 वोट मिले।
2003: उपचुनाव में पहली बार जीती बसपा
हालांकि, वर्ष 2002 के आम चुनाव के कुछ ही समय बाद कांग्रेस विधायक नूर मोहम्मद का असमय निधन हो गया था। इस कारण गौरीगंज सीट पर 2003 में उपचुनाव कराने पड़े। इस उपचुनाव में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के प्रत्याशी जंग बहादुर ने जीत हासिल की। गौरीगंज सीट के इतिहास में यह पहला मौका था, जब बहुजन समाज पार्टी ने यहां अपना खाता खोला और पहली बार जीत दर्ज की।
2007: बसपा ने दोहराई जीत
इस विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने गौरीगंज सीट पर लगातार दूसरी बार अपना कब्जा बरकरार रखा। इस चुनाव में बसपा के चंद्र प्रकाश विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के मोहम्मद नईम को 5,988 वोटों के अंतर से हराया। इस मुकाबले में चंद्र प्रकाश को 34,386 वोट, जबकि मोहम्मद नईम को 28,398 वोट मिले।
साल 2002 और 2007 के चुनाव के बाद गौरीगंज सीट पर नया राजनीतिक समीकरण देखने को मिला, जहां 2012, 2017 और 2022 के तीनों चुनावों में समाजवादी पार्टी का कब्जा रहा।
2022 का नतीजा
- फोटो : 2022 का नतीजा
गौरीगंज में पहली बार जीती सपा
2012 के चुनाव में गौरीगंज सीट पर सपा ने पहली बार जीत का खाता खोला। इस चुनाव में सपा के राकेश प्रताप सिंह विजयी हुए, जिन्होंने कांग्रेस के मोहम्मद नईम को महज 503 वोटों के करीबी अंतर से हराया। चुनाव में राकेश प्रताप सिंह को 44,287 वोट और मोहम्मद नईम को 43,784 वोट मिले थे, जबकि भाजपा के तेजभान सिंह 34,893 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2017: सपा ने दोहराई जीत
इस चुनाव में समाजवादी पार्टी का दबदबा कायम रहा और राकेश प्रताप सिंह लगातार दूसरी बार विजयी हुए। इस बार उन्होंने कांग्रेस के मोहम्मद नईम को 26,419 वोटों के बड़े अंतर से शिकस्त दी। चुनाव में राकेश प्रताप सिंह को 77,915 वोट और मोहम्मद नईम को 51,496 वोट मिले, वहीं बसपा के विजय किशोर 33,848 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे।
सपा ने लगाई जीत की हैट्रिक
वहीं 2022 के हालिया चुनाव में समाजवादी पार्टी के राकेश प्रताप सिंह ने गौरीगंज सीट पर जीत की हैट्रिक लगाते हुए लगातार तीसरी बार जीत दर्ज की। उन्होंने भाजपा के उम्मीदवार चंद्र प्रकाश मिश्रा 'मटियारी' को 6,963 वोटों के अंतर से हराया। इस मुकाबले में राकेश प्रताप सिंह को 79,040 वोट और चंद्र प्रकाश मिश्रा को 72,077 वोट हासिल हुए, जबकि कांग्रेस के फतेह बहादुर 28,964 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे।
विधायक का मन बदला, क्या बदलेगा गौरीगंज का मिजाज?
गौरीगंज विधानसभा सीट पर सपा को लगातार तीन बार जीत दिलाने वाले राकेश प्रताप सिंह अब भाजपा मेंं शामिल हो चुके हैं। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव में ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या यहां की जनता का मिजाज भी बदलात है या राकेश प्रताप सिंह जीत का चौका लगाते हैं। हालांकि, भाजपा उन्हें टिकट देती है या नहीं ये भी देखना होगा।
2012 के चुनाव में गौरीगंज सीट पर सपा ने पहली बार जीत का खाता खोला। इस चुनाव में सपा के राकेश प्रताप सिंह विजयी हुए, जिन्होंने कांग्रेस के मोहम्मद नईम को महज 503 वोटों के करीबी अंतर से हराया। चुनाव में राकेश प्रताप सिंह को 44,287 वोट और मोहम्मद नईम को 43,784 वोट मिले थे, जबकि भाजपा के तेजभान सिंह 34,893 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2017: सपा ने दोहराई जीत
इस चुनाव में समाजवादी पार्टी का दबदबा कायम रहा और राकेश प्रताप सिंह लगातार दूसरी बार विजयी हुए। इस बार उन्होंने कांग्रेस के मोहम्मद नईम को 26,419 वोटों के बड़े अंतर से शिकस्त दी। चुनाव में राकेश प्रताप सिंह को 77,915 वोट और मोहम्मद नईम को 51,496 वोट मिले, वहीं बसपा के विजय किशोर 33,848 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे।
सपा ने लगाई जीत की हैट्रिक
वहीं 2022 के हालिया चुनाव में समाजवादी पार्टी के राकेश प्रताप सिंह ने गौरीगंज सीट पर जीत की हैट्रिक लगाते हुए लगातार तीसरी बार जीत दर्ज की। उन्होंने भाजपा के उम्मीदवार चंद्र प्रकाश मिश्रा 'मटियारी' को 6,963 वोटों के अंतर से हराया। इस मुकाबले में राकेश प्रताप सिंह को 79,040 वोट और चंद्र प्रकाश मिश्रा को 72,077 वोट हासिल हुए, जबकि कांग्रेस के फतेह बहादुर 28,964 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे।
विधायक का मन बदला, क्या बदलेगा गौरीगंज का मिजाज?
गौरीगंज विधानसभा सीट पर सपा को लगातार तीन बार जीत दिलाने वाले राकेश प्रताप सिंह अब भाजपा मेंं शामिल हो चुके हैं। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव में ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या यहां की जनता का मिजाज भी बदलात है या राकेश प्रताप सिंह जीत का चौका लगाते हैं। हालांकि, भाजपा उन्हें टिकट देती है या नहीं ये भी देखना होगा।