{"_id":"663d786e046ab134750c9246","slug":"pune-ground-report-fierce-battle-to-become-mp-in-pune-known-as-queen-of-deccan-2024-05-10","type":"story","status":"publish","title_hn":"Pune Ground Report: कभी कांग्रेस का गढ़ रही सीट पर भगवा परचम; दक्कन की रानी का राजा बनने के लिए जबर्दस्त जंग","category":{"title":"Lok Sabha","title_hn":"लोकसभा","slug":"lok-sabha"}}
Pune Ground Report: कभी कांग्रेस का गढ़ रही सीट पर भगवा परचम; दक्कन की रानी का राजा बनने के लिए जबर्दस्त जंग
Fri, 10 May 2024 06:59 AM IST
शिव शरण शुक्ला
विजय गुप्ता
विजय गुप्ता
Published by: शिव शरण शुक्ला
Updated Fri, 10 May 2024 06:59 AM IST
सार
महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी पुणे कभी पेशवाओं की राजधानी भी रही थी। आज यह देश में शिक्षा व आइटी का हब है लेकिन इसका नूर कम होता जा रहा है। इस चुनाव पर इसलिए महाराष्ट्र की नजरें हैं क्योंकि जो भी सांसद चुना जाएगा उस पर इसके उद्धार का दारोमदार होगा। भाजपा व कांग्रेस दोनों ने इसी कारण ऐसे प्रत्याशी उतारे हैं, जो विकास का पर्याय बन सकें। मुकाबला कड़ा है।
विज्ञापन
ग्राउंड रिपोर्ट।
- फोटो : amar ujala
विस्तार
क्वीन ऑफ डक्कन यानी दक्कन की रानी का राजा (सांसद) बनने के लिए जबरर्दस्त जंग देखने को मिल रही है। इस लोकसभा सीट पर लगातार दो बार से भाजपा की जीत हुई है। इस बार के चुनाव में भाजपा व कांग्रेस दोनों ने नए, पर पैठ वाले प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। इसलिए टक्कर भी कांटे की है। पेशवा बाजीराव के इस शहर में मेयर रह चुके भाजपा के मुरलीधर मोहोल का मुकाबला कांग्रेस के विधायक रहे रवींद्र ढांगेकर से है। वंचित बहुजन अघाड़ी (वीबीए) के फायर ब्रांड मराठा नेता वसंत मोरे मुकाबले को तिकोना बनाने का प्रयास कर रहे हैं। कई समस्याओं के दाग सह रही क्वीन की सूरत संवारने के जिसके वादों पर जनता विश्वास जताएगी, उसी के सिर पर ताज होगा।
करीब 1600 साल पहले पुणे की स्थापना पुण्य नगरी के नाम से हुई थी। 17वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी ने पुणे (तब इसका इलाका विस्तृत था) में ही मराठा साम्राज्य की स्थापना की थी। यह काफी समय पेशवा (मराठा साम्राज्य में प्रधानमंत्री) की राजधानी रहा। फिल्म बाजीराव मस्तानी से मशहूर हुए शनिवार वाड़ा को सहेजने वाला यह शहर आज किसी ऐसे सूरमा को ताज देना चाहता है जो, उसकी पीड़ा समझे और दूर करे। यहां न मोदी या मंदिर चर्चा में है और न ही कोई और मुद्दा। शहर का दम घोंटता ट्रैफिक, साठ लाख की आबादी के लिए पर्याप्त पेयजल न होना, मेट्रो व एयरपोर्ट के विस्तार के काम की सुस्त रफ्तार...यही मसले हैं, जिनकी गारंटी पुणे के मतदाता चाहते हैं। यह भाजपा और कांग्रेस को भी अहसास था, इसीलिए दोनों ने ऐसे चेहरों को झोंका है, जिन पर जनता यह विश्वास कर सके कि वह चुने गए तो विकास करेंगे। कैंट में रहने वाले मेजर रमन कहते हैं कि यहां ट्रैफिक इतना है कि हम जगह की दूरी किलोमीटर से नहीं, सफर के समय से तय करते हैं।
शहर में जहां भाजपा प्रत्याशी की पकड़ है, वहीं कस्बों में कांग्रेस प्रत्याशी की। कोरोना का प्रकोप जब था, उस समय मुरलीधर मोहोल मेयर थे। भाजपाई यह मानते हैं कि उन्होंने अच्छा काम किया इसलिए लोगों में उनकी अच्छी छवि है। भाजपा के अमोल कवित्कर कहते हैं कि मोहोल शहर का एक लोकप्रिय चेहरा हैं। लोगों को विश्वास है कि वह सांसद बनेंगे तो समस्याएं दूर होंगी। दूसरी ओर, कांग्रेस के प्रवक्ता मोहन जोशी कहते हैं कि अगर मेयर रहते उन्होंने इतना ही अच्छा काम किया होता तो इतनी मौतें न हुईं होतीं। वे मेयर थे तो सांसद भी भाजपा के थे, राज्य में सरकार भी भाजपा की थी, फिर भी काम नहीं हुए। यही कुछ प्रचार दोनों दल कर रहे हैं। बड़ी जनसभाओं के बजाय छोटी-छोटी सभाओं पर फोकस है। शहर में प्रचार का कोई हो-हल्ला नहीं है। हां, लोग खुलकर बात करते हैं। शिवाजी नगर के बिल्डर मनोज कुसालकर कहते हैं कि भाजपा को मोदी की वजह से दो बार चुना था, लेकिन अब कांग्रेस ने अच्छा कैंडिडेट दिया है जो हमेशा लोगों को उपलब्ध रहता है, विधायक रहते अच्छा काम किया है, इसलिए इस बार उसे मौका देंगे। आटो शॉप चलाने वाले श्याम कहते हैं कि गरीब के लिए सरकार ने कुछ खास नहीं किया। इस बार बदलाव जरूरी है। एक शोरूम में काम करने वाली कोठरुड की प्रतिमा कहती हैं कि कांग्रेस को वोट देंगे तो यही पता नहीं कि पीएम कौन बनेगा। क्या फायदा?
विज्ञापन
भाजपा प्रत्याशी के लिए एक चुनौती पार्टी के भीतर ही चल रही कशमकश भी है। इसकी वजह है कि एक ही विधानसभा क्षेत्र कोठरुड से भाजपा प्रत्याशी, प्रदेशाध्यक्ष, राज्यसभा सदस्य हो गए हैं। उधर, कांग्रेस के ढांगेकर की गांवों में पकड़ का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जब उन्होंने कस्बा पेठ से विधानसभा उप चुनाव लड़ा था तो मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस तक भाजपा प्रत्याशी के प्रचार के लिए आए थे, लेकिन उन्हें हरा नहीं पाए।
तीनों कॉरपोरेटर, तीनों सोशल मीडिया स्टार
मुरलीधर मोहोल, रवींद्र ढांगेकर और वसंत मोरे तीनों की राजनीति नगर निगम से शुरू हुई है। तीनों पुणे कार्पोरेशन के सदस्य रह चुके हैं। एक समानता यह भी है कि तीनों सोशल मीडिया स्टार हैं। एक्स व फेसबुक पर तीनों के काफी संख्या में फालोअर्स हैं। इस वजह से तीनों प्रचार अभियान में सोशल मीडिया का पूरा फायदा उठा रहे हैं।
कभी कांग्रेस की गढ़ रही सीट पर अब भगवा परचम
कांग्रेस के वर्चस्व वाली इस सीट पर 1951 से अब तक चार बार भाजपा विजयी हुई है, एक बार जनता पाार्टी। इस बार भाजपा जीतती है तो यह हैट्रिक होगी। लेकिन, इसके लिए काफी मशक्कत भाजपा को करनी होगी। लोकसभा क्षेत्र में आने वाले छह विधानसभा क्षेत्रों में से चार के विधायक भाजपा के हैं। यह भाजपा के पक्ष में है। पिछले कई चुनावों में ब्राह्मण प्रत्य़ाशी देती आई भाजपा ने इस बार मराठा प्रत्याशी दिया है जबकि कांग्रेस के प्रत्य़ाशी ओबीसी हैं। वीबीए के मोरे मराठा हैं इसलिए मराठा वोट बंटेगा।
वैसे कस्बों के वोट कांग्रेस को और शहर के भाजपा को जाते रहे हैं। एआईएमआईएम का प्रत्याशी मुस्लिम वोट ले जाता है तो कांग्रेस के और वोट कटेंगे। इस तरह से जातिगत समीकरणों में कांग्रेस को नुकसान होता है। एक मराठी अखबार के संपादक बताते हैं कि पहली बार जातिगत राजनीति इस तरह दिखी है। कांग्रेस की ओर से अभी तक कोई बड़ा नेता प्रचार के लिए नहीं आया है। भाजपा को उम्मीद है कि मोदी की सोमवार को हुई रैली से उसे और बल मिलेगा और वह हैट्रिक लगाएगी। अभी मतदान को करीब एक हफ्ता बाकी है और दोनों ओर से जोरआजमाइश जारी है।
पिछले दो चुनावों का हाल
2019
2014
विज्ञापन
करीब 1600 साल पहले पुणे की स्थापना पुण्य नगरी के नाम से हुई थी। 17वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी ने पुणे (तब इसका इलाका विस्तृत था) में ही मराठा साम्राज्य की स्थापना की थी। यह काफी समय पेशवा (मराठा साम्राज्य में प्रधानमंत्री) की राजधानी रहा। फिल्म बाजीराव मस्तानी से मशहूर हुए शनिवार वाड़ा को सहेजने वाला यह शहर आज किसी ऐसे सूरमा को ताज देना चाहता है जो, उसकी पीड़ा समझे और दूर करे। यहां न मोदी या मंदिर चर्चा में है और न ही कोई और मुद्दा। शहर का दम घोंटता ट्रैफिक, साठ लाख की आबादी के लिए पर्याप्त पेयजल न होना, मेट्रो व एयरपोर्ट के विस्तार के काम की सुस्त रफ्तार...यही मसले हैं, जिनकी गारंटी पुणे के मतदाता चाहते हैं। यह भाजपा और कांग्रेस को भी अहसास था, इसीलिए दोनों ने ऐसे चेहरों को झोंका है, जिन पर जनता यह विश्वास कर सके कि वह चुने गए तो विकास करेंगे। कैंट में रहने वाले मेजर रमन कहते हैं कि यहां ट्रैफिक इतना है कि हम जगह की दूरी किलोमीटर से नहीं, सफर के समय से तय करते हैं।
विज्ञापन
शहर में जहां भाजपा प्रत्याशी की पकड़ है, वहीं कस्बों में कांग्रेस प्रत्याशी की। कोरोना का प्रकोप जब था, उस समय मुरलीधर मोहोल मेयर थे। भाजपाई यह मानते हैं कि उन्होंने अच्छा काम किया इसलिए लोगों में उनकी अच्छी छवि है। भाजपा के अमोल कवित्कर कहते हैं कि मोहोल शहर का एक लोकप्रिय चेहरा हैं। लोगों को विश्वास है कि वह सांसद बनेंगे तो समस्याएं दूर होंगी। दूसरी ओर, कांग्रेस के प्रवक्ता मोहन जोशी कहते हैं कि अगर मेयर रहते उन्होंने इतना ही अच्छा काम किया होता तो इतनी मौतें न हुईं होतीं। वे मेयर थे तो सांसद भी भाजपा के थे, राज्य में सरकार भी भाजपा की थी, फिर भी काम नहीं हुए। यही कुछ प्रचार दोनों दल कर रहे हैं। बड़ी जनसभाओं के बजाय छोटी-छोटी सभाओं पर फोकस है। शहर में प्रचार का कोई हो-हल्ला नहीं है। हां, लोग खुलकर बात करते हैं। शिवाजी नगर के बिल्डर मनोज कुसालकर कहते हैं कि भाजपा को मोदी की वजह से दो बार चुना था, लेकिन अब कांग्रेस ने अच्छा कैंडिडेट दिया है जो हमेशा लोगों को उपलब्ध रहता है, विधायक रहते अच्छा काम किया है, इसलिए इस बार उसे मौका देंगे। आटो शॉप चलाने वाले श्याम कहते हैं कि गरीब के लिए सरकार ने कुछ खास नहीं किया। इस बार बदलाव जरूरी है। एक शोरूम में काम करने वाली कोठरुड की प्रतिमा कहती हैं कि कांग्रेस को वोट देंगे तो यही पता नहीं कि पीएम कौन बनेगा। क्या फायदा?
विज्ञापन
भाजपा प्रत्याशी के लिए एक चुनौती पार्टी के भीतर ही चल रही कशमकश भी है। इसकी वजह है कि एक ही विधानसभा क्षेत्र कोठरुड से भाजपा प्रत्याशी, प्रदेशाध्यक्ष, राज्यसभा सदस्य हो गए हैं। उधर, कांग्रेस के ढांगेकर की गांवों में पकड़ का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जब उन्होंने कस्बा पेठ से विधानसभा उप चुनाव लड़ा था तो मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस तक भाजपा प्रत्याशी के प्रचार के लिए आए थे, लेकिन उन्हें हरा नहीं पाए।
तीनों कॉरपोरेटर, तीनों सोशल मीडिया स्टार
मुरलीधर मोहोल, रवींद्र ढांगेकर और वसंत मोरे तीनों की राजनीति नगर निगम से शुरू हुई है। तीनों पुणे कार्पोरेशन के सदस्य रह चुके हैं। एक समानता यह भी है कि तीनों सोशल मीडिया स्टार हैं। एक्स व फेसबुक पर तीनों के काफी संख्या में फालोअर्स हैं। इस वजह से तीनों प्रचार अभियान में सोशल मीडिया का पूरा फायदा उठा रहे हैं।
कभी कांग्रेस की गढ़ रही सीट पर अब भगवा परचम
कांग्रेस के वर्चस्व वाली इस सीट पर 1951 से अब तक चार बार भाजपा विजयी हुई है, एक बार जनता पाार्टी। इस बार भाजपा जीतती है तो यह हैट्रिक होगी। लेकिन, इसके लिए काफी मशक्कत भाजपा को करनी होगी। लोकसभा क्षेत्र में आने वाले छह विधानसभा क्षेत्रों में से चार के विधायक भाजपा के हैं। यह भाजपा के पक्ष में है। पिछले कई चुनावों में ब्राह्मण प्रत्य़ाशी देती आई भाजपा ने इस बार मराठा प्रत्याशी दिया है जबकि कांग्रेस के प्रत्य़ाशी ओबीसी हैं। वीबीए के मोरे मराठा हैं इसलिए मराठा वोट बंटेगा।
वैसे कस्बों के वोट कांग्रेस को और शहर के भाजपा को जाते रहे हैं। एआईएमआईएम का प्रत्याशी मुस्लिम वोट ले जाता है तो कांग्रेस के और वोट कटेंगे। इस तरह से जातिगत समीकरणों में कांग्रेस को नुकसान होता है। एक मराठी अखबार के संपादक बताते हैं कि पहली बार जातिगत राजनीति इस तरह दिखी है। कांग्रेस की ओर से अभी तक कोई बड़ा नेता प्रचार के लिए नहीं आया है। भाजपा को उम्मीद है कि मोदी की सोमवार को हुई रैली से उसे और बल मिलेगा और वह हैट्रिक लगाएगी। अभी मतदान को करीब एक हफ्ता बाकी है और दोनों ओर से जोरआजमाइश जारी है।
पिछले दो चुनावों का हाल
2019
| उम्मीदवार | दल | मत% |
| गिरीश बापट | भाजपा | 61.13 |
| मोहन जोशी | कांग्रेस | 29.77 |
2014
| उम्मीदवार | दल | मत% |
| अनिल शिरोले | भाजपा | 57.33 |
| विश्वजीत कदम | कांग्रेस | 25.56 |