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Hindi News ›   Election ›   Lok Sabha ›   NDA BJP no alliance with Shiromani Akali Dal in Punjab after Sunil Jakhar and Amarinder Singh Suggestions

Punjab: अकाली दल की शर्त और अपनों की सलाह से नहीं हुआ गठबंधन, अमरिंदर-जाखड़ का तर्क भाजपा ने स्वीकारा

Wed, 27 Mar 2024 05:54 AM IST
गुलाम अहमद अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: गुलाम अहमद Updated Wed, 27 Mar 2024 05:54 AM IST
सार

भाजपा सूत्रों ने बताया कि पंजाब में दोनों दलों के बीच सीट की संख्या मुद्दा नहीं थी। अकाली दल ने गठबंधन के लिए किसान आंदोलन के संदर्भ में कुछ ठोस आश्वासन देने और अटारी बॉर्डर को व्यापार के लिए खोलने की शर्त रखी। इस पर भाजपा नेतृत्व ने राज्य इकाई के नेताओं से बात की तो ज्यादातर नेता गठबंधन के पक्ष में नजर नहीं आए।
 

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NDA BJP no alliance with Shiromani Akali Dal in Punjab after Sunil Jakhar and Amarinder Singh Suggestions
जेपी नड्डा के साथ सुनील जाखड़ (फाइल) - फोटो : Agency

विस्तार

लोकसभा चुनाव से पहले अकाली दल और बीजद की राजग में करीब-करीब तय वापसी टल गई। पंजाब में जहां अकाली दल की शर्त के साथ भाजपा के स्थानीय नेताओं की आपत्ति गठबंधन में बाधा बनी, वहीं ओडिशा में लोकसभा चुनाव के बाद गठबंधन की संभावना तलाशने पर बनी सहमति के बाद भाजपा और बीजद ने अलग-अलग चुनाव लड़ने का फैसला किया।

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भाजपा सूत्रों ने बताया कि पंजाब में दोनों दलों के बीच सीट की संख्या मुद्दा नहीं थी। अकाली दल ने गठबंधन के लिए किसान आंदोलन के संदर्भ में कुछ ठोस आश्वासन देने और अटारी बॉर्डर को व्यापार के लिए खोलने की शर्त रखी। इस पर भाजपा नेतृत्व ने राज्य इकाई के नेताओं से बात की तो ज्यादातर नेता गठबंधन के पक्ष में नजर नहीं आए।
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पार्टी सूत्र के मुताबिक पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर, सुनील जाखड़ सहित कई नेताओं ने कहा कि भाजपा के समक्ष सिख मतदाताओं के बीच पैठ बनाने का यह बड़ा अवसर है। इसेे खोना नहीं चाहिए। इन नेताओं ने लुधियाना के सांसद रवनीत सिंह बिट्टु के भाजपा में शामिल होने पर सहमति देने की जानकारी देते हुए कहा कि स्थानीय स्तर पर सिखों में भाजपा के प्रति नाराजगी नहीं है। ऐसे में पार्टी को मोदी सरकार के कार्यकाल में सिख अस्मिता से जुड़े निर्णयों के सहारे मैदान में उतरना चाहिए।
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ओडिशा में बिना खटास बनी दूरी
ओडिशा में भाजपा और बीजद गठबंधन को लेकर सैद्धांतिक तौर पर सहमत थे। हालांकि समस्या सीटों का बंटवारा बना। चूंकि विधानसभा की तीन चौथाई से अधिक सीटें बीजद के पास है और लोकसभा में भी उसका पलड़ा भारी है। ऐसे में उसके सामने भाजपा को अधिक सीटें देने के कारण पार्टी में नाराजगी बढ़ने की आशंका थी। चूंकि बातचीत ठीक चुनाव से पहले शुरू हुई, इसलिए सीट बंटवारे का कोई सर्वमान्य हल नहीं निकल पाया। इसके बाद दोनों दलों ने चुनाव के बाद गठबंधन पर बातचीत करने का फैसला किया।

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