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Election Flashback: विरोधियों के साथ खड़ी हुईं इंदिरा और हिंदी नहीं बन पाई राजभाषा, पढ़ें चुनावी किस्सा

Sun, 24 Mar 2024 06:53 AM IST
जलज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जलज मिश्रा Updated Sun, 24 Mar 2024 06:53 AM IST
सार

प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री हिंदी की व्यापक स्वीकार्यता के पक्षधर थे, इसलिए उन्होंने विरोध पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया लेकिन मद्रास के बड़े नेता के कामराज से जरूरी सलाह ले रहे थे।

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Indira Gandhi stood with her opponents and Hindi could not become official language Election Flashback story
इंदिरा गांधी - फोटो : amar ujala

विस्तार

पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय से ही केंद्र सरकार में इंदिरा गांधी का खूब दखल रहता था, और यह सिलसिला उनके बाद भी जारी रहा। यह कहानी जनवरी 1965 की है। विष्णु शर्मा अपनी किताब इंदिरा फाइल्स में लिखते हैं, संविधान के मुताबिक हिंदी को आधिकारिक रूप से राजभाषा के तौर पर लागू करने का वक्त आ चुका था लेकिन मद्रास में इसका विरोध होने लगा। प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री हिंदी की व्यापक स्वीकार्यता के पक्षधर थे, इसलिए उन्होंने विरोध पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया लेकिन मद्रास के बड़े नेता के कामराज से जरूरी सलाह ले रहे थे। कामराज की सलाह पर ही शास्त्री मद्रास नहीं गए लेकिन उस वक्त की सूचना प्रसारण मंत्री रहीं इंदिरा गांधी अचानक बिना किसी को बताए मद्रास पहुंच गईं। इंदिरा वहां प्रदर्शनकारियों से मिलीं और उनकी मांगों को मानने का आश्वासन भी दे दिया। संविधान के मुताबिक 15 साल के अंदर हिंदी को राजभाषा के तौर पर लागू किया जाना था। ऐसे में सरकार अगर अड़ी रहती तो हिंदी पूरे देश में लागू हो जाती, लेकिन इंदिरा के इस फैसले से प्रदर्शनकारियों का मनोबल बढ़ा और हिंदी आज तक लागू नहीं हो पाई। अलबत्ता इसे बढ़ाने की जब भी बात होती है तो गैर हिंदीभाषी राज्यों में विरोध शुरू हो जाता है।

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