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कहानी चुनाव की: ढूंढने पर भी पहले नहीं मिलते थे उम्मीदवार, अब हर सीट पर औसत 14 प्रत्याशी, 1957 में 3 थी संख्या

Fri, 15 Mar 2024 06:28 AM IST
जलज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जलज मिश्रा Updated Fri, 15 Mar 2024 06:28 AM IST
सार

चुनाव आयोग ने 1996 के बाद जमानत राशि 500 रुपये से बढ़ाकर 10,000 रुपये कर दी। इसका असर 1998 के आम चुनाव में दिखा जब प्रति सीट प्रत्याशियों की औसत संख्या घटकर 8.75 रह गई। इस चुनाव में 4,750 उम्मीदवार लड़े जो 1996 के मुकाबले 9,202 कम थे।

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Earlier Shortage for candidates of lok sabha now 14 candidates per seat
भारतीय संसद - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लोकसभा चुनावों के शुरुआती दौर में जहां उम्मीदवार ढूंढ़े नहीं मिलते थे, वहीं अब ताल ठोकने वालों की कमी नहीं है। 1952 में हुए पहले आम चुनाव में हर सीट पर औसतन 3 प्रत्याशी थे। 2019 में 17वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में यह संख्या बढ़कर प्रति सीट 14 हो गई। यानी, 67 साल में हर सीट पर जोर-आजमाइश करने वालों की संख्या में औसतन चार गुना का इजाफा हुआ है।

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11वीं लोकसभा चुनाव (1996) में हर सीट से औसतन 25 उम्मीदवार मैदान में उतरे, जो अब तक का रिकॉर्ड है। तब कुल 13,952 प्रत्याशी थे। यह अब तक किसी भी लोकसभा चुनाव में उतरे उम्मीदवारों की सबसे अधिक संख्या है। दरअसल, 1996 के आम चुनाव तक उम्मीदवारों की जमानत राशि मात्र 500 रुपये थी। ऐसा माना जाता है कि 1980 से 1996 के बीच लोकसभा चुनावों में प्रत्याशियों की संख्या बढ़ने के पीछे यह एक महत्वपूर्ण कारण था।

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चुनावी ताल, जमानत राशि बढ़ी तो घटे उम्मीदवार
चुनाव आयोग ने 1996 के बाद जमानत राशि 500 रुपये से बढ़ाकर 10,000 रुपये कर दी। इसका असर 1998 के आम चुनाव में दिखा जब प्रति सीट प्रत्याशियों की औसत संख्या घटकर 8.75 रह गई। इस चुनाव में 4,750 उम्मीदवार लड़े जो 1996 के मुकाबले 9,202 कम थे। हालांकि, बाद में प्रत्याशियों की संख्या फिर बढ़ने लगी और 17वीं लोकसभा चुनाव तक प्रति सीट औसत संख्या 14 पहुंच गई। वर्तमान में चुनाव आयोग ने सामान्य प्रत्याशियों के लिए जमानत राशि 25 हजार रुपये कर दी है।

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जब नाराज किसानों ने ठोकी ताल, हार गई सीएम की बेटी
पिछले चुनाव में एक सीट पर जब रिकॉर्ड 185 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे तो लोग चौंक पड़े। यह स्थिति बनी तेलंगाना की निजामाबाद सीट पर, और नतीजा सामने आया सीएम की बेटी के हार के रूप में। दरअसल, हल्दी उत्पादक किसान सरकार से हल्दी की उपज पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाने और जिले में हल्दी बोर्ड की स्थापना की मांग कर रहे थे। मगर, सरकार किसानों की लगातार अनदेखी करती रही। इससे भड़के किसान खुद ही मैदान में उतर आए और 203 नामांकन हो गए। हालांकि अंतिम तौर पर 185 उम्मीदवार मैदान में थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की बेटी और इसी सीट से सांसद के कविता अपनी जीत को लेकर आश्वस्त थीं। 2014 में मोदी की प्रचंड लहर में भी वह 1.67 लाख वोटों से जीती थीं। पर, हल्दी उत्पादक किसानों के बीच वोटों का ऐसा बंटवारा हुआ कि कविता को करारी हार का सामना करना पड़ा। इन किसानों ने कुल 94,353 वोट हासिल किए, जबकि कविता की हार का अंतर 70,875 वोट का था। भाजपा उम्मीदवार अरविंद धर्मपुरी विजयी रहे।


चुनाव आयोग को मतदान के लिए 26 हजार से अधिक ईवीएम का इस्तेमाल करना पड़ा, जो रिकॉर्ड है। यही नहीं, तकनीकी समस्या से निपटने के लिए 15-16 इंजीनियरों को तैनात करने वाले आयोग को इस सीट के लिए 600 इंजीनियरों को लगाना पड़ा।

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