Ground Report: बिहार के मुजफ्फरपुर में दलों की हार-जीत से अधिक पलटू प्रत्याशियों की चर्चा; जानें सियासी मिजाज
बिहार की अन्य सीटों की तरह मुजफ्फरपुर भी शुरुआत में कांग्रेस का गढ़ रही। यहां 1952 में कांग्रेस के श्याम नंदन सहाय पहले सांसद बने। 57 में पीएसपी के अशोक मेहता जीते तो 62 और 67 में कांग्रेस के दिग्जिवय नारायण जीते। 1971 में कांग्रेस के बड़े नेता नवल किशोर सिन्हा यहां से जीते। 1977 और 80 में जनता पार्टी के टिकट पर जार्ज फर्नांडिस जीते।
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देश-विदेश में मुजफ्फरपुर की लीची की मिठास के चर्चे रहे हैं। लेकिन इस बार यह सीट दूसरी वजह से सुर्खियों में है। दिग्गज नेता रहे दिवंगत कैप्टन जयनारायण निषाद के बेटे और भाजपा से इस सीट पर दो बार 2014 और 2019 में जीते अजय निषाद कांग्रेस से टिकट पर चुनाव मैदान में हैं। भाजपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया, बताया जाता है पार्टी के आंतरिक सर्वे में उनकी रिपोर्ट ठीक नहीं थी। टिकट दिया तो किसको...2019 में निषाद के सामने विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) से लड़ चुके डॉ. राजभूषण चौधरी निषाद इस बार भाजपा से प्रत्याशी हैं। ऐसी उलटबांसी और कहीं देखने को नहीं मिलेगी। लेकिन मुजफ्फरपुर का मिजाज कुछ ऐसा ही है। कौन यकीन करेगा कि 2004 में इस सीट से जनता दल यू के टिकट पर विजयी रहे दिग्गज समाजवादी नेता जार्ज फर्नांडिस 2009 के चुनाव में जमानत भी नहीं बचा पाए थे। क्या कुछ ऐसा ही उलटफेर इस बार भी होगा। मतदाता कुछ भ्रमित हैं, पार्टी या प्रत्याशी में से किसे चुनें। इस सीट पर पांचवे चरण में 20 मई को मतदान होगा। पढ़ें, जॉर्ज फर्नांडिस व कैप्टन जयनारायण निषाद की सीट रही मुजफ्फरपुर से भूपेंद्र कुमार की रिपोर्ट...
मुजफ्फरपुर शहर बड़ा बेमेल सा है। नया और पुराना एकसाथ। नया ठीक से बना नहीं और पुराना रहा नहीं। शहर को स्मार्ट बनाने की तैयारी है, इसलिए जगह-जगह खोदाई चल रही है। यहां के लोगों को सबसे ज्यादा दिक्कत हर जगह खुदी पड़ी सड़कों से है। सरैयागंज में आर्य वस्त्रालय के विनय कुमार कहते हैं, यहां अजय निषाद ठीक काम कर रहे थे, पता नहीं उन्हें भाजपा ने टिकट क्यों नहीं दिया। शहर की हालत बेहद खराब है। हर जगह धूल उड़ती रहती है। महंगाई और बेरोजगारी प्रमुख मुददे हैं। बाबा गरीबानाथ मंदिर के पास प्रसाद की दुकान पर विजय कुशवाहा कहते हैं, भाजपा अगर मजबूत होती, तो भला जनता दल यू से हाथ क्यों मिलाती। न यहां फैक्टरी है न रोजगार है। नीतीश कुमार तो पलटू हैं। वहीं, मौजूद विमल जैन कहते हैं, कांग्रेस वाला कमल को लेकर आएगा तो कमल वाला कांग्रेस वाले को क्यों नहीं ले जाएगा। मैकेनिक जहांगीर कहते हैं मंदिर और मस्जिद से किसी का विकास नहीं होगा। मुद्दा तो विकास होना चाहिए। इस सीट पर करीब 17.5 लाख मतदाता हैं। सवर्ण मतदाता साढ़े तीन लाख हैं, यादव पौने दो लाख, मुस्लिम दो लाख, वैश्य सवा दो लाख हैं।
कोका कोला, डायनामाइट कांड, जेपी और चुनाव
जार्ज फर्नांडिस को बड़ौदा डायनामाइट कांड में पुलिस कोलकाता से गिरफ्तार कर मुजफ्फरपुर लाई थी, बाद में वे दिल्ली की तिहाड़ जेल में रहे। उन पर जून, 1976 में डायनाइट से रेल ट्रैक उड़ाने की साजिश रचने का आरोप था। तब जय प्रकाश नारायण ने सुझाव दिया कि जार्ज को मुजफ्फरपुर से ही लड़ाया जाए। उन्होंने यहां आईडीपीएल और थर्मल पावर प्लांट लगाने में योगदान किया।
कोका कोला को देश से भगाने का फैसला भी जार्ज ने मुजफ्फरपुर की एक बैठक में ही लिया था। पुराने लोग बताते हैं, जिले में भयंकर जल संकट था, एक बैठक में डीएम ने उन्हें कोक पेश किया। इस पर वे भड़क गए और फेरा नियमों के तहत कोक को भारत छोड़ना पड़ा।
ऐसे पड़ा नाम
वर्ष 1875 में प्रशासनिक सुविधा के लिए तिहहुत के पुराने जिले को अलग कर इसे बनाया गया। इसका नाम ब्रिटिश शासन के तहत एक आमिल मुजफ्फर खान के नाम पर रखा गया।
रोचक रहा है चुनावी इतिहास
बिहार की अन्य सीटों की तरह मुजफ्फरपुर भी शुरुआत में कांग्रेस का गढ़ रही। यहां 1952 में कांग्रेस के श्याम नंदन सहाय पहले सांसद बने। 57 में पीएसपी के अशोक मेहता जीते तो 62 और 67 में कांग्रेस के दिग्जिवय नारायण जीते। 1971 में कांग्रेस के बड़े नेता नवल किशोर सिन्हा यहां से जीते। 1977 और 80 में जनता पार्टी के टिकट पर जार्ज फर्नांडिस जीते। 84 की कांग्रेस लहर में पार्टी के ललितेश्वर शाही विजयी रहे। 89 और 91 में जनता दल के टिकट पर फर्नांडिस फिर जीते। 1996, 98 और 99 में जद से जय नारायण निषाद ने हैट्रिक बनाई। 2004 में जद-यू के टिकट पर फर्नांडिस को जीत मिली। 2009 में जय नारायण की जीत के बाद से यह सीट निषाद परिवार के पास रही। वे जद यू से जीते तो अजय 2014 और 19 में भाजपा के टिकट पर जीते।