कहानी चुनाव की: नोटा से भी कम वोट पाकर 20 दलों ने भेजे 33 सांसद, 65,22,772 वोटरों ने 2019 में दबाया नोटा
2019 में 65,22,772 मतदाताओं ने नोटा के पक्ष में मतदान किया। इसका एक दिलचस्प आंकड़ा भी देखिये...देश में 20 दल ऐसे थे, जिनके कुल वोट नोटा से कहीं कम थे, मगर उनके 33 प्रत्याशी जीतकर संसद पहुंचे।
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2013 में जब नोटा का विकल्प देने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया होगा, तो उसने भी नहीं सोचा होगा कि बड़ी संख्या में लोग इसके पक्ष में मतदान करेंगे। प्रत्याशियों के खिलाफ अविश्वास जताने के इस बड़े हथियार का लोगों ने खूब इस्तेमाल किया है। पिछले आम चुनाव के आंकड़े देखिये। 2019 में 65,22,772 मतदाताओं ने नोटा के पक्ष में मतदान किया। इसका एक दिलचस्प आंकड़ा भी देखिये...देश में 20 दल ऐसे थे, जिनके कुल वोट नोटा से कहीं कम थे, मगर उनके 33 प्रत्याशी जीतकर संसद पहुंचे। अब बात 2014 की, जब आम चुनाव में पहली बाद नोटा का इस्तेमाल हुआ और 60 लाख से अधिक वोटरों ने नोटा का बटन दबाया। यह कुल मतदान का 1.08 फीसदी था। वहीं, जदयू, लोजपा, शिरोमणि अकाली दल, अपना दल, एआईयूडीएफ, सीपीआई, जदएस, इनेलो, झामुमो जैसे 20 दलों के कुल मत नोटा से कम रहे, मगर उसके 42 प्रत्याशी सांसद बने।
नोटा से कम वोट...मगर सरकार में हुए शामिल
- 2014 लोकसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल के चार प्रत्याशी जीते और वह सरकार में शामिल हुआ। उसे कुल 36.36 लाख वोट मिले थे, जो नोटा को मिले कुल वोट का 61 फीसदी ही था।
- 6 सांसदों वाली लोजपा को कुल 22.95 लाख वोट ही मिले थे, जो नोटा को मिले कुल वोट का सिर्फ 38.25 फीसदी था।
- यूपी में एनडीए की अहम सहयोगी अपना दल 8.21 लाख वोट लेकर दो सीटें जीतने में कामयाब रही थी। इसका मत फीसदी नोटा के मुकाबले सिर्फ 13.68 फीसदी था।
- दिलचस्प यह कि नोटा से भी कम महज 43.27 लाख वोट पाकर सिर्फ एक सीट जीतने वाली सीपीआई 2014 तक राष्ट्रीय दलों में शामिल थी।
23 सीटों पर जीत-हार के अंतर से ज्यादा नोटा
नोटा को 2014 में 60 लाख से ज्यादा ने चुना। यूपी में सबसे ज्यादा 6 लाख ने चुना। कुल 23 सीटें ऐसी रहीं, जहां हार-जीत के अंतर से ज्यादा नोटा को वोट मिले थे। 2014 में मध्य प्रदेश में 3.91 लाख, गुजरात में 4.54 लाख, बिहार में 5.80 लाख, ओडिशा में 3.32 लाख, छत्तीसगढ़ में 2.24 लाख, झारखंड में 1.90 लाख वोट मिले थे।
2.8 लाख कुल मत, मगर सीटें जीती तीन
नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 2019 में कुल 2.80 लाख मत हासिल किए, मगर तीन सीटें जीतने में कामयाब रहा। उसे नोटा का 0.04% मत ही मिला। आरएसपी, आरएलपी, एनपीपी, केरल कांग्रेस, नगा पीपुल्स फ्रंट, मिजो नेशनल फ्रंट जैसी पार्टियां भी एक-एक सीट जीतीं, पर कुल वोट नोटा से कम रहा।
गोपालगंज में सर्वाधिक तो लक्षदीप में सबसे कम
2019 के चुनाव में शिअद, सीपीआई, जदएस, अपना दल, लोजपा, आप, झामुमो, आईयूएमएल, एआईयूडीएफ, एआएमआईएम, आरएसपी, आजसू, एनडीपीपी, जेके नेशनल कांन्फ्रेंस समेत 20 दलों के 33 प्रत्याशी सांसद बने थे। इन दलों ने अलग-अलग जितने मत हासिल किए, उससे कहीं ज्यादा वोटा नोटा को मिले। इनमें से शिअद, लोजपा, अपना दल ने एनडीए के महत्वपूर्ण घटक दलों के तौर पर हिस्सा लिया था। बिहार की गोपालगंज सीट पर सबसे ज्यादा 51,660 लोगों ने नोटा चुना, जबकि लक्षदीप में नोटा के पक्ष में सबसे कम 100 वोट पड़े थे।