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Gorakhpur: यहां योगी के खिलाफ लड़ चुके हैं मनोज तिवारी, गोरक्षपीठ के महंतों का गढ़ रही सीट का ऐसा है समीकरण

Fri, 31 May 2024 05:59 AM IST
शिवेंद्र तिवारी स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Fri, 31 May 2024 05:59 AM IST
सार

Gorakhpur: लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश की गोरखपुर सीट की चर्चा हमेशा होती है।गोरखपुर की राजनीति में गोरक्षपीठ का काफी असर है। अमर उजाला की खास चुनावी सीरीज ‘सीट का समीकरण’ में जानते हैं यहां का पूरा सियासी गणित... 
 

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Gorakhpur Parliamentary Seat Profile History And Political Equation
गोरखपुर - फोटो : AMAR UJALA

विस्तार

लोकसभा का चुनावी रण अपने आखरी दौर में पहुंच चुका है। इस आखिरी चरण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र से लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पूर्व संसदीय क्षेत्र तक शामिल है। योगी आदित्यनाथ जिस गोरखपुर संसदीय क्षेत्र से कई बार सांसद रहे, वहां इस बार भोजपुरी सिनेमा की दो शख्सियतों की लड़ाई है। भाजपा उम्मीदवार और अभिनेता रवि किशन के सामने सपा की काजल निषाद चुनाव लड़ रही हैं, काजल भी भोजपुरी कलाकार हैं। 
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हमारी खास पेशकश ‘सीट का समीकरण’ में आज इसी गोरखपुर सीट की बात करेंगे। इसके चुनावी इतिहास की बात करेंगे। बात करेंगे यहां से जीते उम्मीदवारों की, पिछले चुनाव में इस सीट पर क्या हुआ था? इस बार कैसे समीकरण बन रहे हैं? ये भी जानेंगे…
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पहले गोरखपुर सीट के बारे में 
गोरखपुर की राजनीति में गोरक्षपीठ का काफी असर है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गोरखपीठ के महंत (मुख्य पुजारी) भी हैं। साल 1951-52 में देश के पहले आम चुनाव हुए तब गोरखपुर नाम से लोकसभा सीट अस्तित्व में नहीं थी। 1957 जब देश के दूसरे आम चुनाव हुए तब गोरखपुर नाम से लोकसभा सीट अस्तित्व आई। इस चुनाव में गोरखपुर में कांग्रेस को जीत मिली। यहां पार्टी के दो उम्मीदवार सिंहासन सिंह और महादेव प्रसाद को सफलता मिली। बता दें कि पहले दो आम चुनावों यानी 1952 और 1957 में कुछ सीटों पर दो-दो सांसद चुने गए थे। इनमें एक सामान्य श्रेणी से और एक अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से होते थे। यह व्यवस्था 1961 में एक कानून के जरिए खत्म की गई।

हिंदू महासभा के दिग्विजय नाथ को हार मिली
1962 में लोकसभा चुनाव में गोरखपुर में भी यहां कांग्रेस को ही जीत मिली। पार्टी की तरफ से उतरे सिंहासन सिंह ने हिंदू महासभा के दिग्विजय नाथ को कड़े मुकाबले में 3260 मतों हराया था। दिग्विजय नाथ गोरखनाथ मठ के महंत थे। गोरक्षपीठ और गोरखपुर लोकसभा सीट का संबंध कितना लंबा है इससे अंदाजा लगाया जा सकता है।

1967 में हुए चुनाव में एक बार फिर महंत दिग्विजय नाथ मैदान में उतरे। इस बार दिग्विजय नाथ बतौर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव में उतरे थे। दिग्विजय नाथ ने इस चुनाव में 1962 में मिली हार का बदला ले लिया। इस चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के एसएल सक्सेना को 42,715 वोट से हरा दिया। 1969 में दिग्विजयनाथ के निधन के बाद हुए उप-चुनाव में महंत अवैद्यनाथ जीतकर लोकसभा पहुंचे। अवैद्यनाथ महंत दिग्विजय नाथ के उत्तराधिकारी थे। अवैद्यनाथ बाद में रामजन्मभूमि आंदोलन के अहम किरदारों में शामिल हुए।

1971 में लोकसभा चुनाव में गोरखपुर में कांग्रेस ने वापसी की। पार्टी के तरफ से उतरे नरसिंह नारायण ने जीत का परचम लहराया। इस चुनाव में उन्होंने निर्दलीय उतरे महंत अवैद्यनाथ को 37,578 वोट से हरा दिया।

आपातकाल के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को मिली हार
साल 1977, आपातकाल के बाद देश में चुनाव होते हैं। देश के ज्यादातर हिस्सों में कांग्रेस को हार झेलनी पड़ी जिसमें गोरखपुर की असफलता भी शामिल थी। यहां भारतीय लोकदल के टिकट पर मैदान में उतरे हरिकेश बहादुर ने जीत दर्ज की। हरिकेश ने कांग्रेस उम्मीदवार नरसिंह नारायण को 1,83,054 मतों से शिकस्त दी। 

तीन साल बाद यानी 1980 में देश में मध्यावधि चुनाव हुए। इस बार इंडियन नेशनल कांग्रेस (आई) ने सफलता का स्वाद चखा। पार्टी के प्रत्याशी हरिकेश बहादुर ने जनता पार्टी (सेकुलर) के दीप नारायण यादव को 16,141 वोटों से हराया। 

1984 के लोकसभा चुनाव में गोरखपुर से कांग्रेस को सफलता मिली। सहानुभूति लहर पर सवार होकर कांग्रेस सत्ता में आई, जिसमें गोरखपुर में मिली जीत भी शामिल थी। यहां कांग्रेस के प्रत्याशी मदन पांडेय ने लोक दल के टिकट पर उतरे हरिकेश बहादुर को 96,600 वोटों से शिकस्त दी।

गोरखपुर में 18 साल बाद उतरे अवैद्यनाथ को मिली जीत
अब आया 1989 का लोकसभा चुनाव और इस बार हिंदू महासभा की तरफ से चेहरा बने महंत अवैद्यनाथ। महंत अवैद्यनाथ गोरखपुर के सियासी मैदान में 18 साल बाद उतरे। इससे पहले 1971 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। 1989 के चुनाव में गोरखपुर में हिंदू महासभा की तरफ से उतरे अवैद्यनाथ ने विजय पताका लहराई। उन्होंने जनता दल के रामपाल सिंह को 45,837 मतों से हरा दिया। 

दो साल बाद 1991 में देश में लोकसभा चुनाव हुए। इस बार भाजपा की तरफ से अवैद्यनाथ उम्मीदवार बनाए गए। उन्होंने जनता दल के प्रत्याशी शारदा प्रसाद रावत को 91,359 वोटों से हरा दिया। 

1996 के लोकसभा चुनाव में गोरखपुर में फिर महंत अवैद्यनाथ को सफलता मिली। भाजपा प्रत्याशी अवैद्यनाथ ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर उतरे को वीरेंदर प्रताप शाही को 56,880 मतों से हरा दिया।

जीत के साथ योगी आदित्यनाथ की एंट्री 
अब आया 1998 का लोकसभा चुनाव जब गोरखपुर की राजनीति में योगी आदित्यनाथ की एंट्री हुई। योगी आदित्यनाथ महंत अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी थे। अपने पहले ही चुनाव में योगी आदित्यनाथ ने विजयी शुरुआत की। 1998 में उन्होंने सपा उम्मीदवार जमुना प्रसाद निषाद को 26,206 वोटों से शिकस्त दी। इस जीत के साथ ही योगी आदित्यनाथ महज 26 साल की उम्र में सांसद बन गए।  

1998 के बाद 1999 में देश में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में भी भाजपा के योगी आदित्यनाथ के सामने सपा से जमुना प्रसाद निषाद थे। नतीजा एक बार फिर वही रहा और भाजपा को जीत मिली। इस चुनाव में योगी आदित्यनाथ ने सपा उम्मीदवार को 7,339 वोट से हरा दिया। 

2004 के चुनाव में यहां से योगी आदित्यनाथ ने जीत की हैट्रिक लगाई। इस बार उन्होंने सपा प्रत्याशी जमुना प्रसाद को 1,42,039 वोटों के बड़े अंतर से हराया। 

जब योगी के सामने उतरे थे अभिनेता मनोज तिवारी 
अब आती है 2009 के लोकसभा चुनाव की बारी। भाजपा की तरफ से योगी आदित्यनाथ ही चेहरा थे लेकिन सपा ने चर्चित भोजपुरी अभिनेता मनोज तिवारी को चुनाव मैदान में उतरा। ये वही मनोज हैं जो दिल्ली से भाजपा के सांसद हैं। हालांकि, 2009 में योगी आदित्यनाथ को टक्कर दी बसपा के विनय शंकर तिवारी ने। नतीजों में भाजपा उम्मीदवार को 2,20,271 मतों से बड़ी जीत मिली। इस मुकाबले में विनय शंकर तिवारी दूसरे जबकि मनोज तिवारी तीसरे स्थान पर रहे। 

2014 में मिली बड़ी जीत
2014 में गोरखपुर की सियासी लड़ाई एक बार फिर योगी आदित्यनाथ के नाम रही। भाजपा के टिकट पर उतरे आदित्यनाथ ने सपा प्रत्याशी राजमती निषाद को 3,12,783 मतों के बड़े अंतर से शिकस्त दी। इस चुनाव में भाजपा उम्मीदवार को 5,39,127 जबकि सपा प्रत्याशी को 2,26,344 वोट मिले थे। 

साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को जीत मिली। जीत के बाद कई दिनों तक चली अटलों के बाद योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाए गए। इसके बाद उन्होंने गोरखपुर सीट से इस्तीफा दे दिया। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही 26 साल से चल रहा गोरक्षपीठ का प्रतिनिधित्व गोरखपुर से खत्म हो गया। योगी आदित्यनाथ के इस्तीफे के बाद यहां गोरखपुर लोकसभा सीट पर उप-चुनाव हुआ। इस उप-चुनाव में भाजपा ने उपेंद्र दत्त शुक्ला को उम्मीदवार बनाया। वहीं, सपा की ओर प्रवीण निषाद को उतारा गया। इस उप-चुनाव में बसपा ने अपना उम्मीदवार नहीं उतारा। बसपा ने अपने मतदाताओं से सपा उम्मीदवार के पक्ष में वोट करने की अपील की। इसका असर यह हुआ की राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पार्टी यहां से हार गई। चुनावी विश्लेषक मानते हैं कि उप-चुनाव में मिली सपा की इस जीत ने ही सपा-बसपा को 26 साल बाद फिर से साथ आने की राह बनाई। 
 

2019 में रवि किशन ने जीती सीट
2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने भोजपुरी कलाकार रवि किशन को गोरखपुर सीट से उम्मीदवार बनाया। इस चुनाव में रविंद्र श्यामनारायण शुक्ल उर्फ रवि किशन ने सपा के रामभुआल निषाद को 3,01,664 वोटों के बड़े अंतर से परास्त कर दिया। भाजपा प्रत्याशी को 7,17,122 जबकि सपा प्रत्याशी को 4,15,458 वोट मिले। 

इस बार दो कलाकार आमने-सामने 
अब बात 2024 के चुनाव की कर लेते हैं। उत्तर प्रदेश की गोरखपुर सीट पर मुकाबला दिलचस्प हो गया है। भाजपा की तरफ से मौजूदा सांसद रवि किशन मैदान में हैं। वहीं सपा ने भोजपुरी कलाकार काजल निषाद को चेहरा बनाया है। इसके अलावा, बसपा ने जावेद सिमनानी को मैदान में उतारा है।
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