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बास्केटबॉल की इस खिलाड़ी ने कभी जिंदगी में नहीं मानी हार, व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे जीते कई गोल्ड मेडल

Fri, 16 Feb 2018 04:15 PM IST
रुपायन डेस्क, अमर उजाला
रुपायन डेस्क, अमर उजाला Updated Fri, 16 Feb 2018 04:15 PM IST
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wheelchair basketball champion Nisha gupta inspiring story
nisha gupta
तीस वर्षीय निशा गुप्ता मुंबई के भायंदर में अपने पति और ससुराल के अन्य सदस्यों के साथ रहती हैं। निशा की जिंदगी बहुत उठा पटक वाली रही है और उन्होंने जिंदगी की हर परेशानी का डटकर सामना किया। निशा ऐसा इसलिए कर सकीं, क्योंकि वे मानसिक रूप से मजबूत थीं। निशा ने निश्चय किया था कि वह अपनी शारीरिक अक्षमता को खुद की कमजोरी नहीं बनने देंगी और उनका यही दृढ़-विश्वास था कि वह आज एक अच्छी पैराप्लेजिक (पैरों या शरीर के निचले हिस्से से अक्षम) खिलाड़ी हैं।
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निशा आज राष्ट्रीय स्तर की अच्छी तैराक हैं और साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर की बास्केट बॉल खिलाड़ी भी। उन्होंने तैराकी में राज्य स्तरीय तीन स्वर्ण पदक और राष्ट्रीय स्तर के तीन कांस्य पदक जीते हैं। निशा ने 2015 में दिल्ली में हुए द्वितीय व्हीलचेयर बास्केटबॉल प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता था। यह पहला मौका था, जब वह किसी खेल प्रतियोगिता में भाग ले रही थीं। निशा ने 2017 में अंतरराष्ट्रीय बाली प्रतियोगिता में तृतीय स्थान हासिल किया था। इस समय निशा महाराष्ट्र की महिला व्हीलचेयर बास्केटबॉल टीम के लिए खेलती हैं। इस टीम ने 2017 में राष्ट्रीय स्तर पर चौथा स्थान हासिल किया था। निशा को महिला दिवस पर उनकी उपलब्धियों के लिए सुधा चंद्रन द्वारा सम्मानित किया गया था।
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जीवन में उतार चढ़ाव- एक दुर्घटना में कमर के निचले हिस्से से अक्षम हो जाने के बाद 18 वर्ष की उम्र में निशा व्हीलचेयर पर आ गईं थीं। निशा याद करती हैं कि नीना नामक एनजीओ जागरूकता संबंधी एक कार्यक्रम का आयोजन कर रहा था, वहां मैं पहली बार गई। वहां कई लोगों से मिली, जो खुद व्हीलचेयर पर थे और वहां तरह-तरह की प्रतियोगिता में भाग ले रहे थे। निशा कहती हैं कि इसके बाद मैंने अपनी जिंदगी में एक नई आशा देखी और वहां (एनजीओ) मैराथन जैसी अन्य गतिविधियों में भाग लेने लगी। वहां ओलिवर डिसूजा जैसा दोस्त मिला, जो खुद व्हीलचेयर पर था। ओलिवर ने मुझे बहुत प्रेरित किया और ज्यादा स्वतंत्र रहने एवं अकेले यात्रा करने की बात कही। वह तैराकी करता था और उसने मुझे भी यह सीखने के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार मैं तैराकी करने लगी और साथ में बास्केटबाॅल खेलना भी शुरू कर दिया।’

इस दौरान निशा के परिवार और दोस्तों से उनके निर्णय का समर्थन किया। कई घंटों के अभ्यास की मेहनत का ही नतीजा है कि निशा कई पैरा खेल आयोजनों में मेडल जीत सकीं। निशा कहती हैं कि मैं चाहती हूं कि घर से बाहर निकलो और जीवन में कुछ करें। आप अपनी जिंदगी जिएं। ‘ निशा महसूस करती हैं कि वह आज भी इन्हीं (शरीर से अक्षम) लोगों की तरह हैं और यही लोग हैं, जो उनकी बातों को समझ सकते हैं। निशा कहती हैं कि जब वे मेरे जैसी एक सफल महिला को देखते हैं, तब उनको बहुत प्रेरणा मिलती है। सच! निशा गुप्ता की जिंदगी एक महिला के साहस की जीती जागती मिसाल है।
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