इस 'गरीब बेटी' ने बैंक अधिकारी बन लौटा दिए कलेक्टर के रुपए
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वो आंखों से अक्षम है, उसके आस-पास की दुनिया बेरंग है, एक धुंधलका हरवक्त उसके सामने छाया रहता है। लेकिन उसकी हिम्मत उसे उस धुंधलके के पार देखने की ताकत देती है। वो पिछड़े, गरीब और आदिवासी इलाके की है, लेकिन अपनी प्रतिभा के उजाले से उसने चारों ओर प्रकाश फैला दिया है। आज वो अपने गृहनगर, जिले और सूबे का गर्व तो है ही, हर देशवासी उसकी कहानी सुनने के बाद उसे सिर-आंखों पर बैठा लेना चाहता है।
उसकी कहानी एक नहीं, लाखों लड़कियों और नौजवानों को रौशनी भरी राह दिखा सकती है, जिस पर चलकर वो अपनी मंजिल अपने मुकाम तक पहुंच सकते हैं।
कहानी मध्यप्रदेश के इंदौर के अलीराजपुर जिले के आदिवासी इलाके से शुरू होती है। शिक्षा के लिहाज से इलाका पिछड़ा है, साक्षरता दर न के बराबर है। संसाधनों और आंखों की रौशनी के अभाव में उसने पढ़ाई जारी रखी।
एक वक्त आया जब पैसे खत्म हो गए। आगे पढ़ाई करनी थी तो उसने इलाके के कलेक्टर से मदद की गुहार की। अलीराजपुर के कलेक्टर शेखर वर्मा ने भगवान साबित हुए। उन्होंने जरूरतमंद लड़की की मदद की। उसके बाद उसने सफलता की इबारत लिख दी। आगे की स्लाइड में पढ़ें पूरी सक्सेस स्टोरी।
'ये पैसे आप ले लो, इनसे किसी और जरूरतमंद की मदद कर दीजिएगा'
मध्य प्रदेश के इंदौर से करीब 170 किलोमीटर दूर जोबट तहसील का आदिवासी इलाका आज अपने की बीच की एक बेटी की सफलता का जश्न मना रहा है। कंदा गांव में बधाइयों का तांता लगा है। सरकारी महकमे का हर अधिकारी और स्थानीय नेता इस बेटी की सफलता पर फूले नहीं समा रहे हैं। सब उसके सम्मान में भव्य जश्न की तैयारी कर रहे हैं।
तीन बहनों एक भाई में सबसे बड़ी 24 वर्षीय शारदा गरीब पिता रायसिंह की बेटी है। लेकिन उसने आंखों की अक्षमता को कभी अपने सपनों में बाधा नहीं बनने दिया। बीते सोमवार को शारदा ने जब अलीराजपुर के कलेक्टर शेखर वर्मा को मदद के पैसे वापस लौटाए तो शारदा की सक्सेस स्टोरी से दुनिया वाकिफ हो गई। दरअसल, ग्रेजुएशन की पढ़ाई जारी रखने के लिए शारदा को पैसों की जरूरत थी। उसने कलेक्टर साहब से मदद की गुहार की थी।
कलेक्टर साहब नेक दिल इंसान निकले और उन्होंने शारदा को शासन की योजना के अंतर्गत 10,000 रुपए की आर्थिक मदद की थी। शारदा की मेहनत रंग लाई और उसे बैंक ऑफ इंडिया में बतौर बैंक पीओ (प्रमाणीकरण अधिकारी) की नौकरी मिल गई। शारदा बीते सोमवार को कलेक्टर साहब से फिर मिली और उनके दिए 10,000 रुपए उन्हें लौटा दिए। ये देख सब भौचक थे। इस पर शारदा ने कहा कि उसने इसलिए पैसे लौटाए हैं कि कलेक्टर साहब उन पैसों से किसी और जरूरतमंद की मदद कर सकेंगे। उसे नौकरी मिल गई है तो अब कोई दिक्कत नहीं है।
विषम परिस्थितियों में जीवन की कठिनाइयां भी शारदा का आत्मविश्वास नहीं डिगा पाई। मौका पड़ने पर असने पूरे साहस और आत्मसम्मान का परिचय दिया। यही वजह है कि शारदा की कहानी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। उसे लोगों से खूब सराहना मिल रही है। झोबाट आदिवासी इलाके के नेता राजेश भील के मुताबिक शारदा की कामयाबी का जश्न जोर-शोर से मनाया जाएगा।
आपको कैसी लगी लगी शारदा की ये सक्सेस स्टोरी, कमेंट बॉक्स में प्रतिक्रिया देना न भूलिएगा। अगर आपको भी इस कहानी से प्रेरणा मिली हो तो शेयर जरूर करें।
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