ट्रक ड्राइवर के बेटों ने पास की NEET और JEE Advance की परीक्षा, कभी उधार लिया तो कभी लोन
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ट्रक ड्राइवर मंगनाराम बिश्नोई के लिए खुशी का ठिकाना नहीं था जब उन्हें एक साथ दो खुशखबरी मिली। उनके एक बेटे महेंद्र ने नीट और दूसरे श्याम सुंदर ने इस साल जेईई-एडवांस परीक्षा पास कर ली है। मंगनाराम बिश्नोई ट्रक ड्राइवर और उनकी पत्नी चंद्रादेवी मनरेगा में काम करती हैं। आर्थिक रूप से कमजोर इस परिवार का एक बेटा श्याम सुंदर अब IIT में पढ़ेगा। वहीं, दूसरा बेटा महेंद्र मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेगा। वे जोधपुर के फालदोई तहसील के कंसार गांव के निवासी हैं। महेंद्र और श्याम ने पिछले एक साल से जमकर तैयारी की। वह दोनों पिछले एक साल के दौरान एक बार भी अपने घर नहीं गए थे।
हैरानी की बात तो यह है कि पिता मंगनाराम ने भी पिछले साल एक साल से अपने बेटों को देखा तक नहीं। उन्होंने दोनों बेटों को पैसे उधार लेकर इंजीनियरिंग और मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम्स की तैयारी कराने पिछले साल कोटा भेजा। अपनी ट्रक ड्राइवरी की नौकरी के कारण वे परिवार के साथ समय ही नहीं बिता पाते थे। उनकी अधिकांश कमाई बच्चों की पढ़ाई के लिए लोन में ही खर्च होती थी, लेकिन उन्हें डॉक्टर और इंजीनियर का पिता कहलाने पर गर्व होगा।
महेंद्र ने गुजरे हुए दिनों को याद करते हुए बताया कि जब वे कोटा जा रहे थे तो उनको कपड़े, बर्तन और बैग उधार लेने पड़े थे। अभी तक दोनों भाई काउंसिलिंग के लिए कोटा में हैं। वे अपने-अपने कॉलेजों में जाने से पहले अपने पिता से मिलना चाहते हैं।
फीस के लिए लेना पड़ा कर्ज
मंगनाराम ने दोनों बेटों को पैसे उधार लेकर इंजीनियरिंग और मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम्स की तैयारी कराने पिछले साल कोटा भेजा। दोनों ने कड़ी मेहनत की और सफल हुए। महेन्द्र गांव का पहला स्टूडेंट होगा जो डॉक्टर बनेगा। वहीं, श्याम सुंदर भी गांव का पहला स्टूडेंट होगा जो IIT से इंजीनियरिंग करेगा। महेन्द्र ने नीट में 545 मार्क्स लाकर ऑल इंडिया में 8592वीं रैंक व कैटेगरी में 5541वीं रैंक हासिल किया है। वहीं, श्याम सुंदर ने JEE(A) में 15949वीं रैंक हासिल किया है।
मंगनाराम ने बताया कि उनके तीन बेटे हैं। बड़ा बेटा सुरेन्द्र जोधपुर से बीएड कर रहा है। वह खुद दसवीं और पत्नी चंद्रादेवी चौथी पास हैं। उन्होंने बताया कि, 'हमारे पास जमीन तो है, लेकिन सूखा क्षेत्र होने से बंजर है। परिवार चलाने के लिए 12 हजार रुपए प्रतिमाह की पगार पर ट्रक चलाता हूं। फीस के लिए कर्ज लेकर दो बेटों को कोटा पढ़ने भेजा।' पिता के मुताबिक, 'दोनों ने मेडिकल और इंजीनियरिंग के लिए अपनी रूचि के बारे में 12वीं में ही बता दिया था। मैं ज्यादा पैसा कमाने के लिए लंबे और कठिन रूट के काम लेने लगा। लेकिन फिर भी कोटा में रहने और कोचिंग के खर्च में कमी ही थी। इसलिए मैंने कई लोगों से कर्ज लिया, कुछ ज्वेलरी बेची और पैसों की व्यवस्था की।' उन्होंने कहा कि अगर इस बार वे क्वालीफाई नहीं करते, तो शायद उनकी अगले साल की पढ़ाई नहीं करवा सकता था।
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