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दूसरों की दया पर बीता बचपन, इस मशहूर डॉक्टर की कहानी रुला देगी

Wed, 29 Jun 2016 05:12 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, नई दिल्ली
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 29 Jun 2016 05:12 PM IST
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This man started life from Mumbai slum area and now a successful dentist

वो कहते हैं न जहां चाह वहां राह। ये कहावत साबित की है डॉक्टर सुवास दारवेकर ने। उनकी कहानी मुंबई के स्लम से शुरु होकर एक सफल डेंटिस्ट बनने पर जाकर खतम होती है। बचपन में उनके लिए भूख और फटे कपड़ों के साथ जिंदगी जीना बहुत मुश्किल था। 

दूसरों की दया पर बीता बचपन, इस मशहूर डॉक्टर की कहानी रुला देगी

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आज वो मुंबई के एक सफल डेंटिस्ट हैं। विपरीत परिस्थितियों से लड़ने के जज्बे की वजह से आज वो इस मुकाम तक पहुंच पाएं हैं। वो बताते हैं कि जब वो छोटे थे तो एक दुर्घटना में उनके पिता की आंखें चली गईं। उनकी स्थिति की वजह से उनके परिवार को एक वक्त का खाना मिलना भी मुश्किल हो गया था।

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लेकिन फिर भी उनकी मेहनत और लगन में कोई कमी नहीं आई। पढ़ाई के लिए वो शहर के स्ट्रीट लैंप का सहारा लेते थे। अपने आपको स्कूल तक पहुंचाने और बिना रुकावट के पढ़ाई करने के लिए भी उन्हें बहुत सी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता था। 

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वो बताते हैं कि स्कूल का अच्छा छात्र होने और दयावान हेडमास्टर की वजह से उन्हें स्कूल चप्पल पहन कर आने की छूट मिल गई थी। लेकिन उनके फटे पहनावे की वजह से स्कूल के कुछ बच्चे उनका मजाक भी उड़ाते थे। 

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फिर भी उनकी मदद के लिए बढ़ने वाले हाथों की भी कोई कमी नहीं थी। जब वो आठवीं क्लास में थे तब उनका एक सीनियर उनके पास आया और उनसे पूछा कि क्या तुम स्कूल यूनिफॉर्म लेना चाहते हो और उनके हां कहने पर दूसरे दिन वो उनके लिए एक ब्रांडेड स्कूल यूनिफॉर्म ले आया। ऐसा सिर्फ एक बार नहीं हुआ वो कहते हैं कि मुसीबत आने पर भगवान मदद के लिए किसी न किसी को जरुर भेजता है। उनके साथ भी ऐसा ही हुआ। जब वो बारहवीं कक्षा में थे तो केवल 50 रुपये फीस की वजह से उन्हें अपना एक साल खराब करना पड़ता, लेकिन एक दोस्त ने उनकी मदद की और उनका साल खराब होने से बचा लिया। 

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