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सक्सेस स्टोरी : एक गाने ने बदल दिया मकसद
एजुकेशन डेस्क
Updated Tue, 23 Sep 2014 03:16 PM IST
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पढ़ाई में औसत दर्जे के छात्र रहे इलाहाबा के अंशुल को पता ही नहीं था कि आखिरकार उसकी मंजिल क्या है। उसने वाराणसी से इंजीनियरिंग की और दो साल दिल्ली में जॉब करता रहा। लेकिन फिर उसके दिल से आवाज आई कि मात्र पैसा कमाने के लिए ही जॉब की जाए..ऐसा जरूरी तो नहीं। उसने मोटी तन्ख्वाह वाली इंजीनियर की जॉब को छोड़ कर सिविल सेवा का तैयारी की। दो बार नाकाम होने के बाद अंशुल की मेहनत रंग लाई और अपने परिवार का नाम रौशन किया।
सन 1974 में इम्तिहान नाम की एक फिल्म प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म में एक गाना है ''रुक जाना नहीं, तू कहीं हार के...कांटों पे चलकर मिलेंगे साये बहार के। किशोर कुमार के इस गाने में जीवन की वह हकीकत छिपी है जिसे अक्सर हम समझ नहीं पाते। कई बार कठिन परिस्थितियां और बाधाएं हमें आगे बढऩे से रोकती हैं लेकिन हमें उन कठिन परिस्थितियों से डरना नहीं है बल्कि खुद के मजबूत इरादों और सटीक रणनीति की बदौलत इन कठिन परिस्थितियों पर विजय हासिल करनी है। यह बात कही है सिविल सेवा में 110वीं रैंक लाने वाला अंशुल गुप्ता ने। उन्हीं की जुबानी सुनिए उनकी सफलता की कहानी।
हालाकि मेरी कहानी थोड़ी आसान है। मैं इलाहाबाद में एयरफोर्स स्टेशन के नाम से जाने जाने वाले बमरौली का रहने वाला हूं और मेरी स्कूली शिक्षा भी वहीं से आरंभ हुई। मैं वहां के केंद्रीय विद्यालय में पढ़ता था जहां पढ़ाई और अन्य गतिविधियों के लिहाज से माहौल बेहतर था। इसलिए बचपन में पढ़ाई संबंधी किसी भी प्रकार की समस्या मेरे सामने नहीं आई। सन् 1995 में जब मैंने पांचवीं कक्षा पास की थी, उस समय अंग्रेजी पर अच्छी पकड़ बनाने के लिए पापा ने मेरा दाखिला इलाहाबाद के प्रतिष्ठित सेंट जोसेफ स्कूल में करवाया। इस स्कूल में कक्षा छह और सात के बाद मैंने आईसीएससी बोर्ड से पढ़ाई की थी। इस तरह 12वीं कक्षा तक 7 साल (सन् 1995 से 2002) मैं उसी स्कूल में रहा। 12वीं कक्षा में विज्ञान एवं गणित विषय होने की वजह से इंजीनियरिंग क्षेत्र में जाने के अलावा मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था, लिहाजा 12वीं कक्षा के परिणाम का इंतजार किए बगैर ही मैंने जून 2003 से ही भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में प्रवेश के लिए संयुक्त प्रवेश परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी। एक साल बाद मेरा प्रवेश भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (काशी हिंदू विश्वविद्यालय) वाराणसी, उत्तर प्रदेश में इलेक्ट्रॉनिक्स शाखा में हो गया। सन् 2003 से 2007 तक मैं बीटेक की पढ़ाई वाराणसी में रहकर करता रहा। इन चार वर्षों के दौरान मेरा ध्यान केवल मेरी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पर ही था क्योंकि उस समय मैं इंजीनियरिंग क्षेत्र को ही अपना भविष्य मान चुका था। मई 2007 में कैंपस प्लेसमेंट के जरिये दिल्ली में स्थित एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में बतौर इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर मेरा चयन किया गया। इस कंपनी के साथ लगभग एक साल काम करने के बाद मुझे लगा मानो मेरा व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन धीरे-धीरे दूर होता जा रहा है। उस समय अक्सर मेरे मन में यह ख्याल आता था कि क्या इसी तरह से मेरा जीवन निकल जाएगा? क्या इस प्रकार से मैं देश-समाज के विकास में योगदान दे पाउंगा? इसके अलावा जॉब के प्रति मेरी आत्मीय संतुष्टि की क्या प्राथमिकता है? इस तरह के तमाम सवाल मुझे परेशान करते थे लेकिन मैं खुद को असहाय भी महसूस कर रहा था क्योंकि जीवन के अहम चार साल इंजीनियरिंग में निवेश करने के बाद किसी दूसरे विकल्प के बारे में सोचना आसान नहीं होता, लेकिन मेरे लिए मेरी जॉब की सुरक्षा एक प्लस प्वाइंट थी जिसके चलते मैं किसी दूसरे विकल्प के लिए 1-2 साल दे सकता था। यदि सफल हुआ तो बहुत अच्छा नहीं तो इंजीनियरिंग क्षेत्र में कार्य करना ही है। इन्हीं बातों पर गंभीर विचार करते हुए आखिरकार मैंने सिविल सेवा परीक्षा में बैठने का फैसला किया। सिविल सेवा में आने का यह मेरा पहला व्यक्तिगत निर्णय था। इससे पहले कभी भी मैंने अपने भविष्य को लेकर किसी भी प्रकार की कोई योजना नहीं बनाई थी। हालांकि मेरे पापा उत्तर प्रदेश प्रशासनिक सेवा में हैं और उन्होंने भी कई बार यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा दी थी लेकिन सफल नहीं हुए। मैंने बचपन से ही उन्हें एक बड़े अधिकारी के रूप में देखा है। बावजूद इसके मैंने कभी अपने भविष्य के बारे में यह नहीं सोचा कि मुझे भी उनकी तरह बड़ा अधिकारी बनना है और न ही बड़ा होकर इंजीनियर, डॉक्टर आदि बनने के ख्वाब देखे क्योंकि मेरा बचपन बहुत मौज-मस्ती के बीच गुजरा है। आखिरकार मैं अपने इस निर्णय को सही और श्रेष्ठ सिद्ध करने की कवायद में लग गया। इस परीक्षा से संबंधित सभी प्राथमिक जानकारियां लेने के बाद मुझे लगा कि तैयारी के लिए कुछ धन की जरूरत पड़ेगी इसलिए मैंने कोचिंग फीस, कमरे का किराया, खाने-पीने और अन्य खर्चों के लिए अपनी जॉब को कुछ दिनों तक जारी रखा जिससे मेरे पास पर्याप्त धन की व्यवस्था हो जाए। सिविल सेवा की तैयारी के लिए आखिरकार अगस्त 2009 के अंतिम सप्ताह में मैंने जॉब छोड़ दी। मैंने जून 2007 से अगस्त 2009 तक यानी 2 साल तक यह नौकरी की थी। जॉब छोडते ही सितबंर 2009 से मैं सिविल सेवा परीक्षा के पहले प्रयास की तैयारी में व्यस्त हो गया।
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पहला प्रयास यानी प्रेक्टिस मैच
मैं चाहता तो जॉब को जारी रखते हुए भी इस परीक्षा की तैयारी कर सकता था लेकिन इसके लिए यदि आप मन बना लेते हैं तब अन्य सभी कार्यों को किनारे रखकर ही आगे बढऩा होता है। क्योंकि इस परीक्षा की तैयारी में खुद की स्पष्ट मानसिकता का बहुत महत्व है। अपने जॉब को जारी रखते हुए यदि मैं तैयारी करता तब मेरे दिमाग में यह रहता कि जॉब तो चल ही रही है तो फिर चिंता किस बात की। ऐसी स्थिति में गंभीरता से तैयारी कर पाना संभव नहीं था। इसलिए जॉब को छोड़कर मैंने अपनी मानसिकता को इस तरह से बना लिया कि यह परीक्षा मेरे लिए आर-पार की लड़ाई है।
मैं विज्ञान की पृष्ठभूमि का छात्र रहा था इस कारण मुझे अपने दोनों वैकल्पिक विषयों समाजशास्त्र और भूगोल की आधारभूत तैयारी करनी थी। इसके अलावा सभी विषयों को बराबर समय देना जरूरी था लेकिन पहली प्राथमिकता प्रारंभिक परीक्षा की तैयारी थी। इस तरह मैं अत्यधिक असमंजस की स्थिति में था कि आखिरकार किस विषय को अधिक समय दिया जाए और किसे कम। इस गंभीर समस्या का समाधान पाने के लिए मैंने बहुत से कोचिंग संस्थानों में तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों से भी बात की, कुछ ने कोचिंग लेने की सलाह दी, तो कुछ ने आरंभ में केवल प्रारंभिक परीक्षा पर फोकस करने के लिए कहा। बहरहाल, मैंने दोनों वैकल्पिक विषयों की तैयारी के लिए तो कोचिंग ज्वॉइन कर ली लेकिन अन्य विषयों को मैं बिना कोचिंग के पढ़ता था। नतीजतन मैंने प्रारंभिक परीक्षा पास कर ली लेकिन मुख्य परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाया क्योंकि सामान्य अध्ययन, वैकल्पिक विषयों और निबंध की तैयारी को बहुत कम समय में नियोजित कर पाना मेरे लिए संभव नहीं था। इसलिए परिणाम स्वाभाविक और मुझे साक्षात्कार के लिए कॉल नहीं मिली। इस प्रयास के दौरान सिविल सेवा परीक्षा के प्रति मेरा नजरिया, सोच और मौजूद प्रतिस्पर्धा के बारे में मेरा दृष्टिकोण स्पष्ट हुआ जो पहले नहीं था। तैयारी शुरू करने से पहले मैं इस परीक्षा के प्रति अधिक गंभीर और समर्पित नहीं था। इसके अलावा इस प्रयास के दौरान दो बड़ी गलतियां हुईं जिनमें पहली, मेरा अकेले ही पढ़ाई करना जिसकी वजह से किसी भी विषय के प्रति नजरिया विश्लेषणात्मक न होना तथा दूसरा, सभी विषयों को जरूरत के मुताबिक समय न मिलना, जिसके चलते पाठ्यक्रम पूरा नहीं हो पाया था। खैर यह मेरा पहला प्रयास था और इतना आत्मविश्वास भी नहीं था कि पहले ही प्रयास में मेरा चयन आईएएस के लिए हो जाएगा। यह प्रयास मेरे लिए एक प्रैक्टिस मैच की तरह था, इसलिए मुख्य परीक्षा होते ही परिणाम का इंतजार किए बगैर ही मैं दूसरे प्रयास की तैयारी में लग गया।
दूसरा प्रयास
वर्ष 2011 में मैंने दूसरा प्रयास लिया। मैं इस बार यह परीक्षा पिछले प्रयास के दौरान की गई सभी गलतियों को सुधारते हुए दे रहा था। इस बार भी मेरे वैकल्पिक विषय समाजशास्त्र और भूगोल ही थे। इस प्रयास के दौरान मेरी तैयारी पूरी तरह से संतुलित थी। तैयारी के लिए इस बार मैंने बचे हुए दिनों और दिन के घंटों को सभी विषयों की जरूरत के हिसाब से विभाजित किया। लेकिन इस बार प्रारंभिक परीक्षा के पैटर्न में हुए बदलाव के कारण दूसरे पेपर पर अधिक ध्यान देना पड़ा। इस बार प्रारंभिक परीक्षा 12 जून, 2011 और मुख्य परीक्षा 29 अक्टूबर, 2011 से होनी थी। लिहाजा मेरे पास समय बहुत था। इस बार मैंने पढ़ाई करने के तरीकों को बदला जो पिछले प्रयास की तुलना में अधिक बेहतर थे जिसमें समूह चर्चा के साथ प्रत्येक विषय को विश्लेषित करना तथा पाठ्यक्रम में मौजूद विषयों के नोट्स बनाकर विस्तृत दृष्टिकोण के साथ सभी विषयों को तैयार करना खास था। क्योंकि पिछले प्रयास के दौरान मैंने पाठ्यसामग्री की सटीक जानकारी के अभाव में बहुत से ऐसे बिंदुओं को पढ़ लिया था जो गैर-जरूरी थे जिनकी वजह से मेरा समय भी खराब हुआ। इसलिए सभी अभ्यर्थियों को मैं यह सलाह जरूर दूंगा कि केवल प्रासंगिक पाठ्यसामग्री को पाठ्यक्रम के अनुसार ही पढ़ें इसके अलावा पढ़ा हुआ बेकार ही होगा। नतीजतन मैं प्रारंभिक परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ पर मुख्य परीक्षा में अच्छे प्रदर्शन के बावजूद मुझे साक्षात्कार के लिए कॉल नहीं आई।
इस बार साक्षात्कार कॉल के लिए मैं मात्र 6 अंकों से रह गया क्योंकि इस साल 842 अंक कटऑफ थी और मैंने 836 अंक प्राप्त किए थे। हालांकि मेरी साक्षात्कार की तैयारी इतनी अच्छी नहीं थी लेकिन कॉल आती तो शायद मेरा आत्मविश्वास और मजबूत होता। इसके अलावा साक्षात्कार की प्रकृति से रू-ब-रू होने का अवसर मिलता। इस प्रयास में मुझे भूगोल को छोड़कर सभी विषयों में अच्छे अंक मिले। भूगोल में अच्छे अंक का न आना वास्तव में अपेक्षित नहीं था क्योंकि पिछले प्रयास के दौरान मैंने भूगोल की कोचिंग ली थी और इस बार भी मैंने इस विषय पर अधिक ध्यान दिया, बावजूद इसके मुझे असफलता का मुंह देखना पड़ा। इस बार भी असफलता मिलने पर मैं अंदर से टूट चुका था क्योंकि वर्ष 2009 के मध्य से वर्ष 2011 के अंत तक इस परीक्षा की तैयारी करते हुए मुझे लगभग तीन साल हो चुके थे। अब मुझे डर लगने लगा था क्योंकि मेरे पास अब 2 ही प्रयास शेष थे। हालांकि तैयारी में मैंने कोई कसर नहीं छोड़ी और ऐसा भी नहीं था कि किसी विषय या टॉपिक में विरोधाभास की स्थिति पैदा हो रही हो। लेकिन अब मैं पीछे नहीं जाना चाहता था। इसलिए इस बार मैंने खुद को संभालते हुए अपने इरादों को और मजबूत किया और तीसरा प्रयास लेने का निर्णय करते हुए यह प्रण लिया कि इस बार मुझे किसी भी कीमत पर इस परीक्षा में सफल होना है।
तीसरा प्रयास
तीस साल के कठोर परिश्रम और पिछले प्रयासों के सभी अनुभवों के साथ एक बार फिर मैं सिविल सेवा परीक्षा-2012 का हिस्सा बनने जा रहा था। यह मेरा तीसरा प्रयास था, इसलिए मानसिक दबाव भी अधिक था। इस बार एक अजीब-सा डर था कि यदि इस बार भी मेरा चयन नहीं हो पाया तब ऐसी स्थिति में अगला प्रयास अंतिम होगा। इसी मनोस्थिति के साथ मैं इस बार पुन: पिछली गलतियों की तलाश में लगा था लेकिन कोई भी ऐसी गलती नजर नहीं आ रही थी जिसे आधिकारिक तौर पर पिछली नाकामयाबी का आधार बनाया जा सके, इसलिए भूगोल विषय में अपेक्षित अंक न मिलने को ही मैंने मुख्य कारण माना और इस बार इस विषय की जगह राजनीति विज्ञान लेने का फैसला किया। इस प्रयास के दौरान मेरा नॉलेज बेस मजबूत हो चुका था इसलिए मुझे यह विश्वास तो हो गया था कि मेरा चयन इस बार कर लिया जाएगा लेकिन घबराहट की वजह से थोड़ा आत्मविश्वास कमजोर था। इस बार राजनीति विज्ञान मेरे लिए नया विषय था इसलिए मैंने इस विषय पर अधिक ध्यान दिया क्योंकि समाजशास्त्र तो मैं पिछले तीन वर्षों से पढ़ रहा था, इसलिए इस विषय पर अधिक ध्यान देने की जरूरत नहीं थी और सामान्य अध्ययन की तैयारी का स्तर भी ठीक था। राजनीति विज्ञान की तैयारी के दौरान सामान्य अध्ययन के कई बिंदु भी तैयार हो गए।
20 मई, 2012 को प्रारंभिक परीक्षा हुई। सकारात्मक परिणाम के लिए मैं पूरी तरह से आश्वस्त था इसलिए परिणाम का इंतजार किए बगैर मैंने मुख्य परीक्षा की तैयारी जारी रखी। इस बार मुख्य परीक्षा 5 अक्टूबर, 2012 से होनी थी इसलिए प्रारंभिक परीक्षा के बाद तैयारी के लिए केवल चार महीने शेष थे। इन चार महीनों में मैंने उत्तर लेखन अभ्यास, भाषा-शैली, साक्षात्कार और निबंध की तैयारी पर जोर दिया। मुख्य परीक्षा में शेष अंतिम माह यानी 1 सितबंर से पहले बनाए गए नोट्स की सहायता से मैंने सभी विषयों का रिवीजन किया। इस बार मुख्य परीक्षा में निबंध के पेपर को छोड़ सभी प्रश्न-पत्र अच्छे हुए। नतीजतन इस बार मैं साक्षात्कार के लिए चुना गया, जो अपेक्षित था। इस प्रयास की शुरुआत से ही मैंने साक्षात्कार की तैयारी के लिए समय विभाजित कर दिया था इसलिए मैंने पूरे आत्मविश्वास के साथ साक्षात्कार में हिस्सा लिया। इस प्रयास के बाद मैं मेरे चयन को लेकर आश्वस्त था चाहे रैंक कैसी भी हो।
3 मई, 2012 को जब मैंने अपना नाम अंतिम चयन सूची में 110वें स्थान पर देखा तब मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उस समय कुछ मिनटों के लिए मुझे ऐसा लगा कि शायद मैं कोई सपना देख रहा हूं लेकिन कुछ घंटों बाद मेरे मित्रों, रिश्तेदारों और घर वालों के फोन आने लगे तब मुझे विश्वास हुआ कि आखिरकार मैंने वह मंजिल पा ही ली जिसका मैंने लगभग 40 महीने तक इंतजार किया है। मैं अपनी इस कामयाबी का श्रेय अपने माता-पिता, मित्रों और उन सभी लोगों को देना चाहता हूं जिन्होंने कदम-कदम पर पूरी श्रद्धा के साथ मेरा सहयोग किया।
यह मेरी बचपन से लेकर आईएएस बनने तक की कहानी है जिसमें कई बार उतार-चढ़ाव और अनेक तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ा लेकिन मैंने बिना हिम्मत हारे उन सभी समस्याओं का डटकर मुकाबला किया। अपना घर-परिवार छोड़कर इस परीक्षा की तैयारी में लगे हुए अभ्यर्थियों को मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदारी, कठिन परिश्रम, पूर्ण समर्पण और दृढ़इच्छा शक्ति जैसी क्षमताओं की बदौलत ही आप इस परीक्षा के अंतिम मुकाम तक पहुंच सकते हैं।
अंशुल के पिता और उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के तहरौली में एसडीएम के पद पर कार्यरत राकेश कुमार गुप्ता बताते हैं कि अंशुल बचपन से ही समझदार और हाजिरजवाब रहा है, मुझे आज भी वे दिन याद आते हैं जब वह लगभग 3-4 साल का था, उस समय किसी के सवालों का जवाब इतनी तेजी और समझदारी से देता था जैसे कोई प्रशिक्षित बच्चा बात कर रहा हो। उस समय हमें यह एहसास हो गया था कि यह लड़का एक दिन हमारा नाम रोशन करेगा। वह पढ़ाई में बहुत तेज नहीं था लेकिन उसकी अभिव्यक्ति की क्षमता, स्मरण शक्ति, ग्रहण करने और समझने की काबिलियत और निर्णय लेने की क्षमता के अलावा अन्य गैर-शैक्षणिक क्षमताएं अभतपूर्व थीं और वह इन्हीं क्षमताओं की बदौलत आईएएस बना है।
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सन 1974 में इम्तिहान नाम की एक फिल्म प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म में एक गाना है ''रुक जाना नहीं, तू कहीं हार के...कांटों पे चलकर मिलेंगे साये बहार के। किशोर कुमार के इस गाने में जीवन की वह हकीकत छिपी है जिसे अक्सर हम समझ नहीं पाते। कई बार कठिन परिस्थितियां और बाधाएं हमें आगे बढऩे से रोकती हैं लेकिन हमें उन कठिन परिस्थितियों से डरना नहीं है बल्कि खुद के मजबूत इरादों और सटीक रणनीति की बदौलत इन कठिन परिस्थितियों पर विजय हासिल करनी है। यह बात कही है सिविल सेवा में 110वीं रैंक लाने वाला अंशुल गुप्ता ने। उन्हीं की जुबानी सुनिए उनकी सफलता की कहानी।
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हालाकि मेरी कहानी थोड़ी आसान है। मैं इलाहाबाद में एयरफोर्स स्टेशन के नाम से जाने जाने वाले बमरौली का रहने वाला हूं और मेरी स्कूली शिक्षा भी वहीं से आरंभ हुई। मैं वहां के केंद्रीय विद्यालय में पढ़ता था जहां पढ़ाई और अन्य गतिविधियों के लिहाज से माहौल बेहतर था। इसलिए बचपन में पढ़ाई संबंधी किसी भी प्रकार की समस्या मेरे सामने नहीं आई। सन् 1995 में जब मैंने पांचवीं कक्षा पास की थी, उस समय अंग्रेजी पर अच्छी पकड़ बनाने के लिए पापा ने मेरा दाखिला इलाहाबाद के प्रतिष्ठित सेंट जोसेफ स्कूल में करवाया। इस स्कूल में कक्षा छह और सात के बाद मैंने आईसीएससी बोर्ड से पढ़ाई की थी। इस तरह 12वीं कक्षा तक 7 साल (सन् 1995 से 2002) मैं उसी स्कूल में रहा। 12वीं कक्षा में विज्ञान एवं गणित विषय होने की वजह से इंजीनियरिंग क्षेत्र में जाने के अलावा मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था, लिहाजा 12वीं कक्षा के परिणाम का इंतजार किए बगैर ही मैंने जून 2003 से ही भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में प्रवेश के लिए संयुक्त प्रवेश परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी। एक साल बाद मेरा प्रवेश भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (काशी हिंदू विश्वविद्यालय) वाराणसी, उत्तर प्रदेश में इलेक्ट्रॉनिक्स शाखा में हो गया। सन् 2003 से 2007 तक मैं बीटेक की पढ़ाई वाराणसी में रहकर करता रहा। इन चार वर्षों के दौरान मेरा ध्यान केवल मेरी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पर ही था क्योंकि उस समय मैं इंजीनियरिंग क्षेत्र को ही अपना भविष्य मान चुका था। मई 2007 में कैंपस प्लेसमेंट के जरिये दिल्ली में स्थित एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में बतौर इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर मेरा चयन किया गया। इस कंपनी के साथ लगभग एक साल काम करने के बाद मुझे लगा मानो मेरा व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन धीरे-धीरे दूर होता जा रहा है। उस समय अक्सर मेरे मन में यह ख्याल आता था कि क्या इसी तरह से मेरा जीवन निकल जाएगा? क्या इस प्रकार से मैं देश-समाज के विकास में योगदान दे पाउंगा? इसके अलावा जॉब के प्रति मेरी आत्मीय संतुष्टि की क्या प्राथमिकता है? इस तरह के तमाम सवाल मुझे परेशान करते थे लेकिन मैं खुद को असहाय भी महसूस कर रहा था क्योंकि जीवन के अहम चार साल इंजीनियरिंग में निवेश करने के बाद किसी दूसरे विकल्प के बारे में सोचना आसान नहीं होता, लेकिन मेरे लिए मेरी जॉब की सुरक्षा एक प्लस प्वाइंट थी जिसके चलते मैं किसी दूसरे विकल्प के लिए 1-2 साल दे सकता था। यदि सफल हुआ तो बहुत अच्छा नहीं तो इंजीनियरिंग क्षेत्र में कार्य करना ही है। इन्हीं बातों पर गंभीर विचार करते हुए आखिरकार मैंने सिविल सेवा परीक्षा में बैठने का फैसला किया। सिविल सेवा में आने का यह मेरा पहला व्यक्तिगत निर्णय था। इससे पहले कभी भी मैंने अपने भविष्य को लेकर किसी भी प्रकार की कोई योजना नहीं बनाई थी। हालांकि मेरे पापा उत्तर प्रदेश प्रशासनिक सेवा में हैं और उन्होंने भी कई बार यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा दी थी लेकिन सफल नहीं हुए। मैंने बचपन से ही उन्हें एक बड़े अधिकारी के रूप में देखा है। बावजूद इसके मैंने कभी अपने भविष्य के बारे में यह नहीं सोचा कि मुझे भी उनकी तरह बड़ा अधिकारी बनना है और न ही बड़ा होकर इंजीनियर, डॉक्टर आदि बनने के ख्वाब देखे क्योंकि मेरा बचपन बहुत मौज-मस्ती के बीच गुजरा है। आखिरकार मैं अपने इस निर्णय को सही और श्रेष्ठ सिद्ध करने की कवायद में लग गया। इस परीक्षा से संबंधित सभी प्राथमिक जानकारियां लेने के बाद मुझे लगा कि तैयारी के लिए कुछ धन की जरूरत पड़ेगी इसलिए मैंने कोचिंग फीस, कमरे का किराया, खाने-पीने और अन्य खर्चों के लिए अपनी जॉब को कुछ दिनों तक जारी रखा जिससे मेरे पास पर्याप्त धन की व्यवस्था हो जाए। सिविल सेवा की तैयारी के लिए आखिरकार अगस्त 2009 के अंतिम सप्ताह में मैंने जॉब छोड़ दी। मैंने जून 2007 से अगस्त 2009 तक यानी 2 साल तक यह नौकरी की थी। जॉब छोडते ही सितबंर 2009 से मैं सिविल सेवा परीक्षा के पहले प्रयास की तैयारी में व्यस्त हो गया।
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पहला प्रयास यानी प्रेक्टिस मैच
मैं चाहता तो जॉब को जारी रखते हुए भी इस परीक्षा की तैयारी कर सकता था लेकिन इसके लिए यदि आप मन बना लेते हैं तब अन्य सभी कार्यों को किनारे रखकर ही आगे बढऩा होता है। क्योंकि इस परीक्षा की तैयारी में खुद की स्पष्ट मानसिकता का बहुत महत्व है। अपने जॉब को जारी रखते हुए यदि मैं तैयारी करता तब मेरे दिमाग में यह रहता कि जॉब तो चल ही रही है तो फिर चिंता किस बात की। ऐसी स्थिति में गंभीरता से तैयारी कर पाना संभव नहीं था। इसलिए जॉब को छोड़कर मैंने अपनी मानसिकता को इस तरह से बना लिया कि यह परीक्षा मेरे लिए आर-पार की लड़ाई है।
मैं विज्ञान की पृष्ठभूमि का छात्र रहा था इस कारण मुझे अपने दोनों वैकल्पिक विषयों समाजशास्त्र और भूगोल की आधारभूत तैयारी करनी थी। इसके अलावा सभी विषयों को बराबर समय देना जरूरी था लेकिन पहली प्राथमिकता प्रारंभिक परीक्षा की तैयारी थी। इस तरह मैं अत्यधिक असमंजस की स्थिति में था कि आखिरकार किस विषय को अधिक समय दिया जाए और किसे कम। इस गंभीर समस्या का समाधान पाने के लिए मैंने बहुत से कोचिंग संस्थानों में तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों से भी बात की, कुछ ने कोचिंग लेने की सलाह दी, तो कुछ ने आरंभ में केवल प्रारंभिक परीक्षा पर फोकस करने के लिए कहा। बहरहाल, मैंने दोनों वैकल्पिक विषयों की तैयारी के लिए तो कोचिंग ज्वॉइन कर ली लेकिन अन्य विषयों को मैं बिना कोचिंग के पढ़ता था। नतीजतन मैंने प्रारंभिक परीक्षा पास कर ली लेकिन मुख्य परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाया क्योंकि सामान्य अध्ययन, वैकल्पिक विषयों और निबंध की तैयारी को बहुत कम समय में नियोजित कर पाना मेरे लिए संभव नहीं था। इसलिए परिणाम स्वाभाविक और मुझे साक्षात्कार के लिए कॉल नहीं मिली। इस प्रयास के दौरान सिविल सेवा परीक्षा के प्रति मेरा नजरिया, सोच और मौजूद प्रतिस्पर्धा के बारे में मेरा दृष्टिकोण स्पष्ट हुआ जो पहले नहीं था। तैयारी शुरू करने से पहले मैं इस परीक्षा के प्रति अधिक गंभीर और समर्पित नहीं था। इसके अलावा इस प्रयास के दौरान दो बड़ी गलतियां हुईं जिनमें पहली, मेरा अकेले ही पढ़ाई करना जिसकी वजह से किसी भी विषय के प्रति नजरिया विश्लेषणात्मक न होना तथा दूसरा, सभी विषयों को जरूरत के मुताबिक समय न मिलना, जिसके चलते पाठ्यक्रम पूरा नहीं हो पाया था। खैर यह मेरा पहला प्रयास था और इतना आत्मविश्वास भी नहीं था कि पहले ही प्रयास में मेरा चयन आईएएस के लिए हो जाएगा। यह प्रयास मेरे लिए एक प्रैक्टिस मैच की तरह था, इसलिए मुख्य परीक्षा होते ही परिणाम का इंतजार किए बगैर ही मैं दूसरे प्रयास की तैयारी में लग गया।
दूसरा प्रयास
वर्ष 2011 में मैंने दूसरा प्रयास लिया। मैं इस बार यह परीक्षा पिछले प्रयास के दौरान की गई सभी गलतियों को सुधारते हुए दे रहा था। इस बार भी मेरे वैकल्पिक विषय समाजशास्त्र और भूगोल ही थे। इस प्रयास के दौरान मेरी तैयारी पूरी तरह से संतुलित थी। तैयारी के लिए इस बार मैंने बचे हुए दिनों और दिन के घंटों को सभी विषयों की जरूरत के हिसाब से विभाजित किया। लेकिन इस बार प्रारंभिक परीक्षा के पैटर्न में हुए बदलाव के कारण दूसरे पेपर पर अधिक ध्यान देना पड़ा। इस बार प्रारंभिक परीक्षा 12 जून, 2011 और मुख्य परीक्षा 29 अक्टूबर, 2011 से होनी थी। लिहाजा मेरे पास समय बहुत था। इस बार मैंने पढ़ाई करने के तरीकों को बदला जो पिछले प्रयास की तुलना में अधिक बेहतर थे जिसमें समूह चर्चा के साथ प्रत्येक विषय को विश्लेषित करना तथा पाठ्यक्रम में मौजूद विषयों के नोट्स बनाकर विस्तृत दृष्टिकोण के साथ सभी विषयों को तैयार करना खास था। क्योंकि पिछले प्रयास के दौरान मैंने पाठ्यसामग्री की सटीक जानकारी के अभाव में बहुत से ऐसे बिंदुओं को पढ़ लिया था जो गैर-जरूरी थे जिनकी वजह से मेरा समय भी खराब हुआ। इसलिए सभी अभ्यर्थियों को मैं यह सलाह जरूर दूंगा कि केवल प्रासंगिक पाठ्यसामग्री को पाठ्यक्रम के अनुसार ही पढ़ें इसके अलावा पढ़ा हुआ बेकार ही होगा। नतीजतन मैं प्रारंभिक परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ पर मुख्य परीक्षा में अच्छे प्रदर्शन के बावजूद मुझे साक्षात्कार के लिए कॉल नहीं आई।
इस बार साक्षात्कार कॉल के लिए मैं मात्र 6 अंकों से रह गया क्योंकि इस साल 842 अंक कटऑफ थी और मैंने 836 अंक प्राप्त किए थे। हालांकि मेरी साक्षात्कार की तैयारी इतनी अच्छी नहीं थी लेकिन कॉल आती तो शायद मेरा आत्मविश्वास और मजबूत होता। इसके अलावा साक्षात्कार की प्रकृति से रू-ब-रू होने का अवसर मिलता। इस प्रयास में मुझे भूगोल को छोड़कर सभी विषयों में अच्छे अंक मिले। भूगोल में अच्छे अंक का न आना वास्तव में अपेक्षित नहीं था क्योंकि पिछले प्रयास के दौरान मैंने भूगोल की कोचिंग ली थी और इस बार भी मैंने इस विषय पर अधिक ध्यान दिया, बावजूद इसके मुझे असफलता का मुंह देखना पड़ा। इस बार भी असफलता मिलने पर मैं अंदर से टूट चुका था क्योंकि वर्ष 2009 के मध्य से वर्ष 2011 के अंत तक इस परीक्षा की तैयारी करते हुए मुझे लगभग तीन साल हो चुके थे। अब मुझे डर लगने लगा था क्योंकि मेरे पास अब 2 ही प्रयास शेष थे। हालांकि तैयारी में मैंने कोई कसर नहीं छोड़ी और ऐसा भी नहीं था कि किसी विषय या टॉपिक में विरोधाभास की स्थिति पैदा हो रही हो। लेकिन अब मैं पीछे नहीं जाना चाहता था। इसलिए इस बार मैंने खुद को संभालते हुए अपने इरादों को और मजबूत किया और तीसरा प्रयास लेने का निर्णय करते हुए यह प्रण लिया कि इस बार मुझे किसी भी कीमत पर इस परीक्षा में सफल होना है।
तीसरा प्रयास
तीस साल के कठोर परिश्रम और पिछले प्रयासों के सभी अनुभवों के साथ एक बार फिर मैं सिविल सेवा परीक्षा-2012 का हिस्सा बनने जा रहा था। यह मेरा तीसरा प्रयास था, इसलिए मानसिक दबाव भी अधिक था। इस बार एक अजीब-सा डर था कि यदि इस बार भी मेरा चयन नहीं हो पाया तब ऐसी स्थिति में अगला प्रयास अंतिम होगा। इसी मनोस्थिति के साथ मैं इस बार पुन: पिछली गलतियों की तलाश में लगा था लेकिन कोई भी ऐसी गलती नजर नहीं आ रही थी जिसे आधिकारिक तौर पर पिछली नाकामयाबी का आधार बनाया जा सके, इसलिए भूगोल विषय में अपेक्षित अंक न मिलने को ही मैंने मुख्य कारण माना और इस बार इस विषय की जगह राजनीति विज्ञान लेने का फैसला किया। इस प्रयास के दौरान मेरा नॉलेज बेस मजबूत हो चुका था इसलिए मुझे यह विश्वास तो हो गया था कि मेरा चयन इस बार कर लिया जाएगा लेकिन घबराहट की वजह से थोड़ा आत्मविश्वास कमजोर था। इस बार राजनीति विज्ञान मेरे लिए नया विषय था इसलिए मैंने इस विषय पर अधिक ध्यान दिया क्योंकि समाजशास्त्र तो मैं पिछले तीन वर्षों से पढ़ रहा था, इसलिए इस विषय पर अधिक ध्यान देने की जरूरत नहीं थी और सामान्य अध्ययन की तैयारी का स्तर भी ठीक था। राजनीति विज्ञान की तैयारी के दौरान सामान्य अध्ययन के कई बिंदु भी तैयार हो गए।
20 मई, 2012 को प्रारंभिक परीक्षा हुई। सकारात्मक परिणाम के लिए मैं पूरी तरह से आश्वस्त था इसलिए परिणाम का इंतजार किए बगैर मैंने मुख्य परीक्षा की तैयारी जारी रखी। इस बार मुख्य परीक्षा 5 अक्टूबर, 2012 से होनी थी इसलिए प्रारंभिक परीक्षा के बाद तैयारी के लिए केवल चार महीने शेष थे। इन चार महीनों में मैंने उत्तर लेखन अभ्यास, भाषा-शैली, साक्षात्कार और निबंध की तैयारी पर जोर दिया। मुख्य परीक्षा में शेष अंतिम माह यानी 1 सितबंर से पहले बनाए गए नोट्स की सहायता से मैंने सभी विषयों का रिवीजन किया। इस बार मुख्य परीक्षा में निबंध के पेपर को छोड़ सभी प्रश्न-पत्र अच्छे हुए। नतीजतन इस बार मैं साक्षात्कार के लिए चुना गया, जो अपेक्षित था। इस प्रयास की शुरुआत से ही मैंने साक्षात्कार की तैयारी के लिए समय विभाजित कर दिया था इसलिए मैंने पूरे आत्मविश्वास के साथ साक्षात्कार में हिस्सा लिया। इस प्रयास के बाद मैं मेरे चयन को लेकर आश्वस्त था चाहे रैंक कैसी भी हो।
3 मई, 2012 को जब मैंने अपना नाम अंतिम चयन सूची में 110वें स्थान पर देखा तब मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उस समय कुछ मिनटों के लिए मुझे ऐसा लगा कि शायद मैं कोई सपना देख रहा हूं लेकिन कुछ घंटों बाद मेरे मित्रों, रिश्तेदारों और घर वालों के फोन आने लगे तब मुझे विश्वास हुआ कि आखिरकार मैंने वह मंजिल पा ही ली जिसका मैंने लगभग 40 महीने तक इंतजार किया है। मैं अपनी इस कामयाबी का श्रेय अपने माता-पिता, मित्रों और उन सभी लोगों को देना चाहता हूं जिन्होंने कदम-कदम पर पूरी श्रद्धा के साथ मेरा सहयोग किया।
यह मेरी बचपन से लेकर आईएएस बनने तक की कहानी है जिसमें कई बार उतार-चढ़ाव और अनेक तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ा लेकिन मैंने बिना हिम्मत हारे उन सभी समस्याओं का डटकर मुकाबला किया। अपना घर-परिवार छोड़कर इस परीक्षा की तैयारी में लगे हुए अभ्यर्थियों को मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदारी, कठिन परिश्रम, पूर्ण समर्पण और दृढ़इच्छा शक्ति जैसी क्षमताओं की बदौलत ही आप इस परीक्षा के अंतिम मुकाम तक पहुंच सकते हैं।
अंशुल के पिता और उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के तहरौली में एसडीएम के पद पर कार्यरत राकेश कुमार गुप्ता बताते हैं कि अंशुल बचपन से ही समझदार और हाजिरजवाब रहा है, मुझे आज भी वे दिन याद आते हैं जब वह लगभग 3-4 साल का था, उस समय किसी के सवालों का जवाब इतनी तेजी और समझदारी से देता था जैसे कोई प्रशिक्षित बच्चा बात कर रहा हो। उस समय हमें यह एहसास हो गया था कि यह लड़का एक दिन हमारा नाम रोशन करेगा। वह पढ़ाई में बहुत तेज नहीं था लेकिन उसकी अभिव्यक्ति की क्षमता, स्मरण शक्ति, ग्रहण करने और समझने की काबिलियत और निर्णय लेने की क्षमता के अलावा अन्य गैर-शैक्षणिक क्षमताएं अभतपूर्व थीं और वह इन्हीं क्षमताओं की बदौलत आईएएस बना है।
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