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बांध बनाकर लाई ग्रामीणों के चेहरों पर मुस्कान

Fri, 23 Feb 2018 09:47 PM IST
उदयशंकर एम
उदयशंकर एम Updated Fri, 23 Feb 2018 09:47 PM IST
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Success story of UdayShankar M- who making Dam for villagers
Udai Shankar

कर्नाटक के मंगलोर शहर में भले ही मैं एक बड़ी कंपनी में विपणन अधिकारी के तौर पर नौकरी कर रहा था, लेकिन गांव में कम होते पानी की समस्या को देखते हुए मेरे दिमाग में इसके समाधान को लेकर कोई न कोई योजना चलती रहती थी। यही वजह थी कि मैंने तय किया कि मैं गांव में एक कट्टा (चेक डैम) विकसित करूंगा।

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दरअसल पिछले कई वर्षों से दक्षिण कन्नड़ जिले के मेरे गांव में पानी की समस्या हर साल बढ़ती जा रही थी। मई में पड़ने वाला जल संकट फरवरी में ही दस्तक देने लगा था। मैं तो शहर में नौकरी कर रहा था, लेकिन गांव में मेरे परिवार समेत सभी किसान खेती के घाटे से बेहाल हो रहे थे। वहीं, पड़ोस के एक गांव में वहां के निवासियों ने अपने स्तर से एक पारंपरिक बांध बनाकर पानी की समस्या से काफी हद तक निजात पा ली थी।
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मैंने सोचा, क्यों न अपने गांव में कुछ ऐसा ही किया जाए। लेकिन मेरे सामने समस्या यह थी कि मैं पूरे हफ्ते शहर में रहता था, बस सप्ताह में एक दिन के लिए गांव आता था। मैं नौकरी छोड़ने की स्थिति में भी नहीं था, इसलिए मैंने छुट्टी के दिन को ही बांध के काम के लिए चुना। इस काम के लिए मैंने अपनी नौकरी के अनुभवों का प्रयोग किया। जहां मैं काम करता हूं, वहां ऐसे बड़े और मजबूत बैग प्रयोग किए जाते हैं, जिनमें कई टन सामान रखा जाता है। 

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मैंने किसी तरह उन्हीं बैगों का प्रबंध करके बांध के लिए प्रयोग किया। जेसीबी की मदद से इन बैगों में मिट्टी भरकर हमने प्राकृतिक जल स्रोत में पहुंचाया। इसका नतीजा यह निकला कि जल स्रोत का स्तर ऊपर आ गया, जिससे हमारे बनाए चेक डैम में पानी इकट्ठा हो गया और आखिर वह दिन आ ही गया, जब हमने अपने गांव में एक बांध का निर्माण कर लिया। हमने बांध में करीब पचास लाख लीटर पानी इकट्ठा किया। यह गांव के किसानों को अप्रैल तक की पानी की जरूरतों का निश्चित बंदोबस्त था।

जल संग्रह का यह एक पुराना परंपरागत तरीका है, जिसे समय के साथ भुला दिया गया है। इस पूरे प्रकल्प में करीब चौदह हजार रुपयों का खर्च आया, जिससे पंद्रह परिवारों को फायदा पहुंचा। जब मेरा प्रयास सफल हो गया, तो दूसरे किसानों को भी मुझपर भरोसा हो गया और उन्होंने मेरे साथ हाथ मिला लिया, जिसका यह नतीजा निकला कि प्रति परिवार कई हजारों का खर्च घटकर मात्र आठ सौ रुपये पर आ गया।

जिस तरह मैंने पड़ोस के गांव को देखकर अपने गांव के बारे में सोचा, उसी तरह अब हमारे गांव की तरकीब देखकर हमारे दूसरे पड़ोसी गांव इस तरीके के बांध का फायदा उठा रहे हैं। वहां के किसान हमारे गांव में आकर बांध का निरीक्षण करते हैं। यही नहीं, जिला पंचायत के अधिकारी भी हमारे प्रयासों से प्रभावित हुए हैं।

उन्होंने भी मनरेगा योजना के तहत इसी तरह के एक हजार पारंपरिक कट्टे विकसित करके जिले की पानी की समस्या खत्म करने की दिशा में पहल की है। बांध बनाकर मैंने अपने गांव वालों का दिल जीत लिया है। मेरे प्रति उनकी कृतज्ञता देखकर मुझे जो खुशी मिलती है, उसे मैं बयान नहीं कर सकता। मेरा बांध अस्थायी है, लेकिन मैं कोशिश करूंगा कि अगले वर्ष और बेहतर बांध बनाकर अपने परिवार समेत गांव के किसानों का भला कर सकूं।

-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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