दोनों हाथ नहीं, कोई अपना साथ नहीं फिर भी दिखाई दिलेरी भूखा सोया, पर भीख नहीं मांगी
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पिछले कई महीनों से मेरे पिता काम नहीं कर रहे हैं। यों कहें कि वह अब काम कर भी नहीं सकते, क्योंकि मिल में काम करते हुए एक दुर्घटना में उन्होंने अपने दोनों हाथ गंवा दिए हैं। वह हमारे चार सदस्यीय परिवार में इकलौते कमाने वाले शख्स थे। हमारे पूरे परिवार की जिंदगी बदल देने वाली उस दुर्घटना के बाद मेरा स्कूल छूट गया। मैं चाहकर भी अब स्कूल नहीं जा सकता था। परिवार का पेट पालने के लिए जरूरी था कि घर का कोई न कोई सदस्य काम करे।
मेरे परिवार में पिता के बाद मेरी मां ही इकलौती वयस्क सदस्य थीं। मेरी बहन तो मुझसे बहुत छोटी थी। वह केवल पांच साल की है। मेरी मां की इच्छा थी कि मैं भीख मांगना शुरू करूं, क्योंकि परिस्थितियों के हिसाब से यह सबसे आसान काम था। लेकिन मेरे अपंग पिता इस बात के लिए कभी राजी नहीं हुए कि उनका बेटा भीख मांगे। उनका साफ कहना था कि मैं भीख में मिले चावल खाने से पहले मरना पसंद करूंगा।
जैसे-तैसे कुछ दिन काटने के बाद घर की हालत और बदतर होने लगी। मेरे जैसे किशोर के लिए काम मिलना इतना आसान नहीं था, लेकिन मेरी तलाश जारी थी। मेरी बहन
स्वाभाविक रूप से मुझसे ज्यादा भूखी रहती। वह मुझसे हमेशा खाने की अपेक्षा करती। कभी-कभार वह जब मां से भात खाने को मांगती, तो मां उसे डांटते हुए कहती कि 'लड़कियों'
को कभी इस तरह खाना नहीं मांगना चाहिए। मुझे नहीं पता कि पांच साल की बच्ची यह कैसे स्वीकार कर सकती है कि उसे खाली पेट सोना पड़ेगा।
लेकिन उसने दोबारा मां से खाना नहीं मांगा। जल्द ही खाने की कमी होना हमारे घर की दिनचर्या में शामिल हो गया। पूरे परिवार के साथ मैंने भी भूखा रहना सीख लिया। कई रातें मैंने इस तरह बिताईं कि सपने में भी मुझे यही दिखता कि मेरे सामने भात से भरा एक कटोरा रखा है और उसे मैं जल्दी-जल्दी बेढंगे तरीके से खा रहा हूं। मुझे काम मिलने के बाद किसी तरह मेरे परिवार की भूख मिटी। लेकिन मुझे जिस दिन काम नहीं मिलता, उस दिन मेरा पूरा परिवार भूखा रहता। ऐसे खाली दिनों के अगले दिन जब मैं काम पर जाता, जल्दी-जल्दी काम करता।
बिना रुके, बिना थके मैं लगातार पूरा दिन काम करता, ताकि अपने परिवार के लिए कुछ पैसे ज्यादा कमा सकूं, जिससे उस दिन मेरे घर में पकने वाले भात की मात्रा थोड़ी ज्यादा हो और हो सके तो साथ में आलू भी खाने को मिल जाए! मैं अक्सर अपनी प्यारी बहन से सुबह के वक्त वायदा करता हूं कि आज रात को तुझे ज्यादा भात खाने को मिलेगा। मुझे पता है कि वह दिनभर मेरा इंतजार करती होगी। मैं भी हर दिन जल्दी काम खत्म करके घर जाना चाहता हूं। मेरे मां-बाप ने मुझे जीवन दिया है।
मेरा इतना तो फर्ज बनता है कि मैं उनके लिए अपना थोड़ा-सा पसीना बहाऊं। इसीलिए मैं हर दिन यही कोशिश करता हूं कि मैं अपने परिवार के लिए दिन में कम से कम एक वक्त के खाना का इंतजाम जरूर कर सकूं।
इस फर्ज अदायगी की कीमत यह है कि मैं भी ज्यादातर भूखा रहता हूं। मेरे दिमाग में हमेशा सफेद चावलों के कुछ दानों की तस्वीर चलती रहती है। मैं बस उसी वक्त भूख को अपने
दिमाग से हटा पाता हूं, जब मैं काम कर रहा होता हूं।
-बांग्लादेश में रहने वाले आरिफ के विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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