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खेतीहर मजदूर बन गई अमेरिकी कंपनी की CEO
Updated Sat, 15 Nov 2014 12:50 PM IST
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ज्योति के कष्ट भरे जीवन और संघर्ष की दास्तां वाकई हतप्रभ करने वाली है। 1970 में वारंगल में जन्मी ज्योति का बचपन भयंकर गरीबी में गुजरा। पांच बहनों में सबसे बड़ी ज्योति को उसकी मां ने इसलिए अनाथाश्रम भेज दिया ताकि खाने वाले मुंह कम हो सकें। अनाथाश्रम में ज्योति को अनाथ बताकर भर्ती करा दिया।
अनाथाश्रम में ढेरों बच्चों के बीच पलती ज्योति अपने घरवालों से दूर कष्ट और बेचारगी की जीवन जीने को मजबूर हुई। इसी दौरान ज्योति ने अपनी मेहनत से अनाथाश्रम की सुपरिटेंडेंट का दिल जीता और सुपरिटेंडेंट उसे अपने घर बर्तन साफ करने और सफाई करने के काम पर लगा लिया।
सुपरिटेंडेंट के घर पर रहकर ज्योति अनाथाश्रम में मिले कष्ट भूल जाया करती थी। वो दिल लगाकर काम करती और सुपरिटेंडेंट की तरह बड़ा बनने का सपना देखती।
यहां रहकर ज्योति ने सरकारी स्कूल से दसवीं पास की और टाइपराइटिंग भी सीखी। ज्योति दसवीं पास करके एक नौकरी के सपने देखने लगी थी ताकि अपने घर लौटकर घरवालों की मदद कर सके।
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अनाथाश्रम में ढेरों बच्चों के बीच पलती ज्योति अपने घरवालों से दूर कष्ट और बेचारगी की जीवन जीने को मजबूर हुई। इसी दौरान ज्योति ने अपनी मेहनत से अनाथाश्रम की सुपरिटेंडेंट का दिल जीता और सुपरिटेंडेंट उसे अपने घर बर्तन साफ करने और सफाई करने के काम पर लगा लिया।
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सुपरिटेंडेंट के घर पर रहकर ज्योति अनाथाश्रम में मिले कष्ट भूल जाया करती थी। वो दिल लगाकर काम करती और सुपरिटेंडेंट की तरह बड़ा बनने का सपना देखती।
यहां रहकर ज्योति ने सरकारी स्कूल से दसवीं पास की और टाइपराइटिंग भी सीखी। ज्योति दसवीं पास करके एक नौकरी के सपने देखने लगी थी ताकि अपने घर लौटकर घरवालों की मदद कर सके।
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बच्चों की खातिर जोते खेत, सिले पेटीकोट
पढ़ने और आगे बढ़ने के उसके सपने तब चकनाचूर हो गए जब घर लौटते ही 16 साल में जबरन उसकी शादी दूर के एक रिश्तेदार से कर दी गई। ज्योति ने परिवार की खातिर समझौता तो कर लिया लेकिन बेरोजगार पति के साथ जीवन बहुत ही बुरा बीत रहा था।
ज्योति ने दो बेटियों को जन्म दिया। बच्चों के जन्म के बाद हालात और बिगड़े और बच्चों का पेट भरने के लिए ज्योति गांव में ही खेतिहर मजदूरी करनी शुरू की। ज्योति दिन भर खेत जोतती और बदले में उसे पांच रुपए दिहाड़ी मिलते। इन रुपयों से वो अपने बच्चों के लिए दूध और खाने पीने का सामान खरीदती। गुजारा करने के लिए ज्योति एक रुपए प्रति पेटीकोट सिलाई करती। लेकिन इन हालातों ने ज्योति को कमजोर करने की बजाय और हिम्मती बना दिया। ज्योति ने 1986 से लेकर 1989 तक खेतों पर मजदूर बनकर जीतोड़ मेहनत की।
ज्योति ने दो बेटियों को जन्म दिया। बच्चों के जन्म के बाद हालात और बिगड़े और बच्चों का पेट भरने के लिए ज्योति गांव में ही खेतिहर मजदूरी करनी शुरू की। ज्योति दिन भर खेत जोतती और बदले में उसे पांच रुपए दिहाड़ी मिलते। इन रुपयों से वो अपने बच्चों के लिए दूध और खाने पीने का सामान खरीदती। गुजारा करने के लिए ज्योति एक रुपए प्रति पेटीकोट सिलाई करती। लेकिन इन हालातों ने ज्योति को कमजोर करने की बजाय और हिम्मती बना दिया। ज्योति ने 1986 से लेकर 1989 तक खेतों पर मजदूर बनकर जीतोड़ मेहनत की।
नाइट स्कूल में पढ़ाकर बनी टीचर
रात्रिकालीन स्कूल से पढ़ाई के साथ साथ ज्योति इस मिशन का हिस्सा बन गई और दूसरे लोगों को पढ़ने के लिए जागरुक करने लगी। अब वो रात में दूसरे लोगों को पढ़ाया करती थी। नेहरू युवा केंद्र के संयोजक ने ज्योति की लगन को देखते हुए उसे गांव की लड़कियों को पढ़ाने का जिम्मा दिया और बतौर सैलरी 150 रुपए महीना दिया।
पहली बार सैलरी से ज्योति को जिंदगी से फिर एक उम्मीद की किरण मिली। उसने लगन से बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। जल्द ही उसे प्रमोट करके जिले का मंडल प्रेरक बना दिया गया। अब उसे गुजारे लायक सैलरी भी मिलने लगी थी। उसने ग्रेजुएशन करने का फैसला किया और अंबेडकर ओपन यूनिवर्सिटी से परचा भर दिया।
ग्रेजुएशन की डिग्री मिली तो ज्योति की सैलरी भी बढ़ गई। अब वो पैसों की बचत करने लगी। इसके एक साल बाद ज्योति ने अन्ना यूनिवर्सिटी से बीएड की डिग्री प्राप्त की और सरकारी शिक्षक बन गई।
पहली बार सैलरी से ज्योति को जिंदगी से फिर एक उम्मीद की किरण मिली। उसने लगन से बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। जल्द ही उसे प्रमोट करके जिले का मंडल प्रेरक बना दिया गया। अब उसे गुजारे लायक सैलरी भी मिलने लगी थी। उसने ग्रेजुएशन करने का फैसला किया और अंबेडकर ओपन यूनिवर्सिटी से परचा भर दिया।
ग्रेजुएशन की डिग्री मिली तो ज्योति की सैलरी भी बढ़ गई। अब वो पैसों की बचत करने लगी। इसके एक साल बाद ज्योति ने अन्ना यूनिवर्सिटी से बीएड की डिग्री प्राप्त की और सरकारी शिक्षक बन गई।
पराए देश में हुई बेसहारा
इसी दौरान ज्योति अमेरिका से लौटे अपने एक परिचित से मिली। ज्योति को अहसास हुआ कि बच्चियों की बेहतर परवरिश और सामाजिक तानों बानों से अलग विदेश में तरक्की की संभावनाएं ज्यादा हैं। ज्योति ने अमेरिका जाने का सपना देखना शुरू किया। उसने सबसे पहले कंप्यूटर चलाना सीखा और अमेरिका के लिए वीजा पासपोर्ट की कोशिश करने लगी। साल भर में कई बार नाकाम होने के बाद आखिरकार ज्योति अमेरिका के लिए विजिटिंग वीजा पाने में कमयाब हो ही गई।
अमेरिका पहुंचते ही सबसे पहला वज्रपात तब हुआ जब उसके हर परिचित ने उसे अपने घर पर शरण देने से इनकार कर दिया। एक अनजाने देश हैरान परेशान ज्योति को तब एक गुजराती परिवार ने पेइंग गेस्ट के रूप में शरण दी।
अमेरिका पहुंचते ही सबसे पहला वज्रपात तब हुआ जब उसके हर परिचित ने उसे अपने घर पर शरण देने से इनकार कर दिया। एक अनजाने देश हैरान परेशान ज्योति को तब एक गुजराती परिवार ने पेइंग गेस्ट के रूप में शरण दी।
बेबी सिटिंग की, गैस स्टेशनों पर किया काम
जीवन यापन के लिए ज्योति ने न्यूजर्सी में एक वीडियो शॉप में सेल्सगर्ल की नौकरी की। यहां ज्योति के जज्बे को देखकर एक भारतीय व्यक्ति ने उसे csamerica नामक कंपनी में रिक्रूटर की जॉब ऑफर की। ज्योति ने कुछ समय यहां काम किया और जल्द ही ICSA नामक कंपनी से उसे बेहतर पैकेज पर जॉब ऑफर मिली। ज्योति ने झट से ये ऑफर स्वीकार कर लिया।
लेकिन ज्योति पर तब मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा जब कुछ ही दिन बाद ICSA ने यह कहते हुए ज्योति को नौकरी से निकाल दिया कि उसके पास अमेरिका में वर्किंग वीजा नहीं है। नौकरी छोड़ने के बाद वर्किंग वीजा पाने में कई महीने लग गए और ये माह ज्योति के लिए बहुत कष्टकारी थे। ज्योति ने इस दौरान गैस स्टेशन पर काम किया और बेबी सिटिंग तक की।
लेकिन ज्योति पर तब मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा जब कुछ ही दिन बाद ICSA ने यह कहते हुए ज्योति को नौकरी से निकाल दिया कि उसके पास अमेरिका में वर्किंग वीजा नहीं है। नौकरी छोड़ने के बाद वर्किंग वीजा पाने में कई महीने लग गए और ये माह ज्योति के लिए बहुत कष्टकारी थे। ज्योति ने इस दौरान गैस स्टेशन पर काम किया और बेबी सिटिंग तक की।
बिजनेस का सपना और सॉफ्टवेयर कंपनी
वर्किंग वीजा पाने के लिए ज्योति मैक्सिको गई और वहां भी वीजा पाने में कई पापड़ बेलने पड़े। तब ज्योति को अहसास हुआ कि वीजा पाने की कोशिशों में वो इतना पेपरवर्क कर चुकी है कि अपनी कंसलटेंसी फर्म तक खोल सकती है। उसने तय किया कि नौकरी की बजाय अपने बिजनेस में हाथ आजमाया जाए।
2001 में अपने बिजनेस के सपने के साथ ज्योति वर्किंग वीजा लेकर फिर अमेरिका लौटी और अपनी बचत के 40000 डॉलर से फोनिक्स में एक दफ्तर खोला। कंसलटेंसी फर्म चल निकली और ज्योति ने KEY सॉफ्टवेयर सॉल्यूशन नामक सॉफ्टवेयर कंपनी स्थापित की। आज ये कंपनी अमेरिका की बड़ी बड़ी कंपनियों को आईटी सपोर्ट दे रही है। रिलायंस और सरेक्स जैसी बड़ी कंपनियां KEYS की क्लाइंट हैं।
ज्योति की कंपनी का टर्नओवर करोड़ों में आता है और कंपनी में सैंकड़ों लोग काम करते हैं। ज्योति की बेटियां भी अमेरिका में सैटल हो चुकी हैं। ज्योति की कंपनियां फोनिक्स, न्यूजर्सी और एरिजोना में हैं।
ज्योति अमेरिका में ही जाकर नहीं बस गई। वो समय समय पर भारत आती हैं और यहां समाजसेवी काम करती हैं। हैदराबाद, दिल्ली और चेन्नई में अनाथाश्रम को आर्थिक मदद करती हैं। वारंगल में KEYS के सहयोग से लड़कियों को शिक्षा प्रदान करने संबंधी प्रोजेक्ट चल रहा है।
ज्योति अमेरिका में 'लीड इंडिया 2020 फाउंडेशन' की सदस्य हैं जो युवा और मेहनती भारतीयों की दिक्कतें दूर कर उन्हें बेहतर जीवन यापन के लिए सहयोग करता है।
2001 में अपने बिजनेस के सपने के साथ ज्योति वर्किंग वीजा लेकर फिर अमेरिका लौटी और अपनी बचत के 40000 डॉलर से फोनिक्स में एक दफ्तर खोला। कंसलटेंसी फर्म चल निकली और ज्योति ने KEY सॉफ्टवेयर सॉल्यूशन नामक सॉफ्टवेयर कंपनी स्थापित की। आज ये कंपनी अमेरिका की बड़ी बड़ी कंपनियों को आईटी सपोर्ट दे रही है। रिलायंस और सरेक्स जैसी बड़ी कंपनियां KEYS की क्लाइंट हैं।
ज्योति की कंपनी का टर्नओवर करोड़ों में आता है और कंपनी में सैंकड़ों लोग काम करते हैं। ज्योति की बेटियां भी अमेरिका में सैटल हो चुकी हैं। ज्योति की कंपनियां फोनिक्स, न्यूजर्सी और एरिजोना में हैं।
ज्योति अमेरिका में ही जाकर नहीं बस गई। वो समय समय पर भारत आती हैं और यहां समाजसेवी काम करती हैं। हैदराबाद, दिल्ली और चेन्नई में अनाथाश्रम को आर्थिक मदद करती हैं। वारंगल में KEYS के सहयोग से लड़कियों को शिक्षा प्रदान करने संबंधी प्रोजेक्ट चल रहा है।
ज्योति अमेरिका में 'लीड इंडिया 2020 फाउंडेशन' की सदस्य हैं जो युवा और मेहनती भारतीयों की दिक्कतें दूर कर उन्हें बेहतर जीवन यापन के लिए सहयोग करता है।
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