हर किसान की मासिक आय इतनी हो कि वह अपने बच्चों को अच्छे स्कूल भेज सके
मैं बिहार के नालंदा जिले का रहने वाला हूं। मेरे पिता किसान थे। मेरी शुरुआती पढ़ाई जवाहर नवोदय स्कूल में हुई। यहां रहने के दौरान मैंने देखा कि बहुत-से बच्चे छुट्टियों में भी अपने घर नहीं जाते थे, क्योंकि उनके माता-पिता के पास इतने संसाधन नहीं थे कि उन्हें ढंग से दो वक्त का खाना खिला सकें। वहां पढ़ने के दौरान ही मैंने ठान लिया कि भविष्य में कुछ ऐसा करूंगा, जिससे कि बिहार का विकास हो और यहां का पलायन रुक सके।
12वीं कक्षा के बाद मैंने इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च, जूनागढ़ से एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग की डिग्री ली। इसके बाद इस्राइल की एक कंपनी के लिए मैंने आंध्र प्रदेश में ड्रिप-इरिगेशन सिस्टम पर काम किया, पर जल्द ही मैं बिहार वापस आ गया। यहां आकर मैंने पटना में एक छोटा-सा कमरा किराए पर लिया। मुझे हमेशा लगता था कि अगर राज्य का विकास करना है, तो शुरुआत गांवों और किसानों से करनी होगी।
लगभग नौ महीने तक मैं अलग-अलग जगहों पर किसानों से मिला, उनकी समस्याएं पूछीं, साथ ही उनकी जरूरतों व समाधान पर बातचीत की। मैंने देखा था कि, छोटे किसान सब्जियां व फल उगाते थे, लेकिन उन्हें उसकी अच्छी कीमत नहीं मिलती थी, जबकि वही सब्जी, फल शहरों में कई गुना महंगी कीमतों पर बिकते थे। इस अनुभव से मुझे समझ आया कि, आगे बढ़ने के लिए ‘हाइब्रिड मॉडल’ पर काम करना होगा। आइडिया शुरू से साफ था, बिचौलियों को हटाओ, साथ ही अच्छी और ताजा सब्जियां शहर में बेचो।
इसके लिए मैंने कौशल्या फाउंडेशन की शुरुआत की, जिसके तहत किसानों को विभिन्न किस्म की फसलें उगाने के लिए प्रशिक्षित करना शुरू किया। उनके लिए कार्यशालाएं लगवाईं, साथ ही खेती से संबंधित जो भी मदद उन्हें चाहिए थी, मुहैया करवाई। इसके बाद एक कमर्शियल कंपनी शुरू की, जो उनकी फसल खरीदकर लागत के हिसाब से सही दाम देने लगी। मैं केवल कृषि क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक स्तर पर भी उनके जीवन में सुधार लाने की कोशिश कर रहा हूं।
मुझे इस बात से कोई मतलब नहीं है कि कितने किसान मेरे साथ जुड़े हुए हैं। मतलब सिर्फ इससे है कि जो भी किसान हमारे साथ जुड़े हुए हैं, उनकी जिंदगी में हमारी मदद से कोई बदलाव आ रहा है या नहीं। शुरुआत में जब मैंने किसानों से मिलना शुरू किया और उन्हें अलग-अलग तकनीक का इस्तेमाल करके खेती करने के सुझाव दिए, तो बहुत कम लोगों ने मेरी बातों पर ध्यान दिया। दो तीन किसान आगे आए, जिनसे पहले दिन भिंडी, मटर, फूलगोभी खरीदकर बेचने पटना पहुंचा। सब्जी खरीदी कितने की थी यह मुझे याद नहीं है पर 22 रुपये की बिक्री हुई, यह मेरे लिए खुशी की बात थी।
हालांकि महीनों की दिन-रात की मेहनत के बाद अब किसान मुझ पर भरोसा करने लगे हैं। गांधी जी के सामुदायिक उत्थान और ग्राम स्वराज जैसे सिद्धांतों से मिली प्रेरणा के चलते मेरी कोशिश रहती है कि, जहां भी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित हों, वहां पर एक समूह बन जाए। इसी सोच के चलते किसान उत्पादक संगठन बनावाने लगा, जिससे करीब हजारों की संख्या में किसान जुड़ रहे हैं।
आज इन कामों से लगभग 35,000 किसान परिवारों को फायदा मिल रहा है। मेरी कोशिश है कि हर किसान की मासिक आय कम से कम इतनी हो सके कि वह अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में भेज सके। महात्मा गांधी ने कहा है कि, जो बदलाव हम दूसरों में देखना चाहते हैं, उसकी शुरुआत हमें खुद से करनी होगी। देश में कृषि का स्तर ऊंचा उठाने के लिए किसानों को आगे आना होगा और हर वह कोशिश करनी होगी, जिससे बदलाव हो सके।
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