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'जब अमानवीयता से पहला परिचय हुआ, तो मैंने मनोरोगियों के लिए पुनर्वास केंद्र खोलने का फैसला किया'

Sun, 29 Jul 2018 04:20 PM IST
भरत वतवानी
भरत वतवानी Updated Sun, 29 Jul 2018 04:20 PM IST
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Dr Bharat Vatwani awarded Ramon Magsaysay award 2018 for his work with mentally ill street people

मैंने इससे पहले एक दिन में इतने फोन कभी नहीं उठाए और ही कभी इतने सारे लोगों को एक साथ हमारे काम के बारे में चर्चा करते हुए सुना। मुझे खुशी है कि कम से कम हमारे काम को पहचाना तो गया।

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मेरी पैदाइश कोलकाता की है। मैं पांच साल का था, जब मेरे पिता मुंबई में आकर बस गए थे। वह एक सरकारी विभाग में काम करते थे। जब मैं मुश्किल से बारह वर्ष का था, तभी उनका देहांत हो गया। पिता के गुजरने के बाद मैंने कई तरह की चुनौतियों का सामना करते हुए एमबीबीएस तक की पढ़ाई पूरी की। लेकिन न जाने क्यों डॉक्टरी करना मुझे नहीं भाया। बाद में मैंने एक दोस्त की सलाह पर मुंबई के ग्रांट मेडिकल कॉलेज से साइकेट्री में डिप्लोमा किया। मैंने जीएस मेडिकल कॉलेज से इसी विषय में परास्नातक किया और फिर बोरिवली में प्रैक्टिस शुरू कर दी।
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जब इस अमानवीयता से पहला परिचय हुआ
नब्बे के दशक के शुरुआती दौर की बात है, मैं अपनी पत्नी स्मिता, जो कि खुद भी मनोचिकित्सक हैं, के साथ एक रेस्तरां में बैठा था। वहीं बाहर सड़क किनारे एक दुबला-पतला लड़का बैठा था, जो कि नारियल के खोखे से गटर का पानी पी रहा था। इस दृश्य ने मुझे बेचैन कर दिया। उस लड़के को हम अपने घर ले आए और मैंने उसका विधिवत उपचार किया। बाद में उस लड़के ने मुझे बताया कि वह विज्ञान में स्नातक है। उस दिन मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मानसिक समस्याएं किसी भी इंसान को किस हद तक दयनीय और अमानवीय परिस्थितयों में झोंक देती हैं।

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धर्म संकट में सेवा को चुना

मुझे शुरू से ही ट्रेकिंग का शौक रहा है। मैंने वर्ष 1998 में कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए आवेदन किया था। मुझे यात्रा का संभावित वक्त कुछ महीने बाद बताया गया। लेकिन आवेदन के दस दिनों के भीतर मुझे यात्रा दस्ते में चयनित होने की सूचना दी गई। मेरे लिए वह धर्म संकट का समय था, क्योंकि मैं उस वक्त दो बेहद खास मरीजों का इलाज कर रहा था और उनको छोड़कर जाना बहुत मुश्किल था। मैंने यात्रा निरस्त कर दी। चंद दिनों में ही खबर आई कि जिस दस्ते में मुझे जाना था, वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया है और सभी यात्री मारे गए हैं। उस दिन मुझे लगा, मानो ईश्वर ने मुझे किसी खास मकसद से नई जिंदगी दी है।

पिता समान बाबा आम्टे
2004 में बाबा आम्टे से मुलाकात के बाद मैंने मनोरोगियों के लिए पुनर्वास केंद्र खोलने का फैसला किया, जिसके लिए मेरी पत्नी ने मेरा पूरा साथ दिया। दरअसल बाबा आम्टे को रोगियों की सेवा करते देखना किसी आश्चर्य से कम नहीं था। रोगियों से उनका भावनात्मक जुड़ाव चरम पर था। सेवा का ऐसा उदाहरण मैंने पहले कभी नहीं देखा था। कुष्ठ और मानसिक रोगियों के लिए ताउम्र काम करने वाले बाबा आम्टे मेरे प्रेरणास्रोत हैं।

अपने जैसों की मदद करना चाहता हूं
मनोरोगियों को सामाजिक मान्यता दिलाने के लिए कई दफे मुझे अदालती लड़ाई लड़नी पड़ी। हजारों मनोरोगियों को ठीक करके उनके पुनर्वास की व्यवस्था करने के साथ मैंने कई बच्चों को उनके परिवारों से मिलाया है। जिंदगी के इस पड़ाव में अब कुछ नया करने का विचार तो नहीं है, पर यह जरूर है कि मैं किसी भी व्यक्ति, जो इस दिशा में काम करना चाहता है, की मदद करना चाहता हूं।

-रेमन मैगसायसाय अवॉर्ड के लिए नामित भरत वतवानी से नूतन कुमार गुप्ता की बातचीत पर आधारित।

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