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इतिहास पेपर: सिविल सेवा में उपयोगी
एजुकेशन डेस्क
Updated Mon, 22 Sep 2014 03:44 PM IST
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भारत में कम्युनिस्टों को मजदूर आंदोलन में जितनी कामयाबी मिली, उतनी राजनैतिक क्षेत्र में नहीं। स्पष्ट करें
1925-26 तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति ने भारत के विभिन्न हिस्सों में स्थापित कम्युनिस्ट गुटों को एकजुट करने का काम किया। 1923-27 के दौरान मजदूर-किसान पार्टियां गठित की गई। इस समय तक एम.एन. रॉय का प्रभाव कम हो चुका था। उस समय ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन को दिशा दे रही थी। ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी के फिलिप स्प्रैट दिसंबर 1926 में भारत आए और उन्होंने यहां के कम्युनिस्टों को मजदूर-किसान पार्टियां बनाने का सुझाव दिया ताकि वे इनकी आड़ में अपनी गतिविधियां जारी रख सकें। काजी नजरुल इस्लाम और शम्सुद्दीन के प्रयासों से बंगाल, बंबई, पंजाब और उत्तर प्रदेश के प्रगतिशील मजदूर और किसान नेताओं ने केंद्रीय स्तर से लेकर प्रांतीय स्तर तक ऐसी पार्टी का गठन किया जिनका नेतृत्व मजदूरों और किसानों के हाथ में था। मजदूर किसान पार्टी की स्थापना सबसे पहले बंगाल में लेबर स्वराज्य पार्टी के नाम से की गई। 1928 में इसका नाम किसान-मजदूर पार्टी कर दिया गया। 21 दिसंबर, 1928 को कलकत्ता में अखिल भारतीय मजदूर किसान पार्टी की स्थापना की गई और इसके कार्यक्रम तय किए गए। इस सम्मेलन में पूर्ण स्वतंत्रता की भी मांग की गई। 1927 में पहली बार मजदूरों ने पहली मई को मई दिवसज् के रूप में मनाया। मद्रास में 1 लाख 20 हजार से ज्यादा मजदूर इसमें शामिल हुए। वास्तव में कम्युनिस्टों को राजनैतिक क्षेत्र में मजदूर आंदोलन की तरह उतनी सफलता न मिलने के कई कारण थे। पहला, सरकार एक के बाद एक षड्यंत्र के मुकदमें उन पर चलाती रही जिससे पार्टी के नेताओं को पार्टी के संगठन को मजबूत करने का बहुत कम समय मिला। दूसरा, पार्टी के राजनैतिक क्षेत्र में आगे न बढ़ पाने के पीछे मजदूरों की अशिक्षा एक बड़ा कारण थी। तीसरा, धन की कमी पार्टी में राजनैतिक प्रचार में रुकावट डालती रही। चौथा, इस समय तक कम्युनिस्ट एक सही राजनैतिक दृष्टि हासिल नहीं कर पाए थे और पांचवां, भारत में मौजूद जातिवाद और सांप्रदायिकता ने भी कम्युनिस्टों की राह में बाधाएं डालीं। यही वजहे थीं कि भारत में कम्युनिस्टों को राजनैतिक क्षेत्र में उतनी कामयाबी नहीं मिल सकी।
धन विधेयक की परिभाषा दें और यह भी स्पष्ट करें कि इसे संसद में किस प्रकार पारित किया जाता है?
संविधान के अनुच्छेद 110 के अनुसार कोई विधेयक धन विधेयक माना जाएगा यदि उसमें केवल निम्नलिखित सभी या किन्ही विषयों से संबंधित उपबंध हों, अर्थात्-
(क) किसी कर का अधिरोपण, परिहार, परिवर्तन या विनियमन।
(ख) भारत सरकार द्वारा धन उधार लेने या प्रत्याभूति देने का विनियमन या ऋण लेना।
(ग) भारत की संचित निधि या आकस्मिकता निधि में धन जमा करना या उसमें से धन निकालना।
(घ) किसी नए व्यय को भारत की संचित निधि पर भारित व्यय घोषित करना या ऐसे किसी रकम को बढ़ाना।
(ड.) अनुच्छेद 110(1) के उपखंड (क) से (च) में उल्लिखित किसी विषय का आनुषंगिक कोई विषय।
लेकिन कोई विधेयक केवल इसीलिए धन विधेयक नहीं माना जाता है कि वह लाइसेंस के लिए फीस का, या की गई सेवा के लिए फीस की मांग या उनकी अदायगी का उपबंध करता है या इसलिए कि वह स्थानीय प्राधिकारी या निकाय द्वारा स्थानीय प्रयोजनों के लिए किसी कर के अधिरोपण, उत्सादन और विनियमन आदि का उपबंध करता है। प्रश्न उठता है कि कोई विधेयक 'धन विधेयक' है या 'वित्त विधेयक' तो इसका निर्णय लोकसभा अध्यक्ष करता है। राष्ट्र्रपति की सिफारिश पर धन विधेयक केवल लोकसभा में पारित किया जाता है तथा इस विधेयक को पारित करने के लिए राज्यसभा में भेजा जाता है। राज्यसभा धन विधेयक को न तो रद्द कर सकती है और न उसमें संशोधन की सिफारिश कर सकती है। विधेयक प्राप्ति के 14 दिन के भीतर राज्यसभा को यह विधेयक स्वीकृत करके लोकसभा को लौटाना होता है। यदि उक्त अवधि के भीतर इसे लोकसभा को नहीं लौटाया गया तो 14 दिन के बाद विधेयक को दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाता है।
निर्यात को बढ़ावा देने के लिए तथा सेज में निवेशकों के हितों को पुनर्जीवित करने के लिए उपायों के एक पैकेज की घोषणा की गई। इस पैकेज की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं :
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18 अप्रैल, 2013 को घोषित इस पैकेज की प्रमुख विशेषताएं निम्न हैं :
- सेज की स्थापना के लिए गैर कृषि योग्य भूमि के संपूर्ण विशाल प्रदेशों में तीव्र कठिनाइयों की दृष्टि से समीप और खाली स्थान को सुनिश्चित करते समय यह फैसला किया जाता है कि न्यूनतम भूमि क्षेत्र आवश्यकता आधा किया जाए। बहु-उत्पाद सेज के लिए यह 1,000 हेक्टेयर से 500 हेक्टेयर कम किया गया है जबकि क्षेत्र-विशेष सेज के लिए यह वर्तमान 100 हेक्टेयर से 50 हेक्टेयर कर दिया गया है।
1 50-450 हेक्टेयर के बीच अवरोही भूमि क्षेत्र के उपयोग में बहुत लोचता अपनाई गई है। यह निर्णय लिया गया है कि न्यूनतम भूमि योग्यता के लिए ग्रेड स्केल शुरू हो जो प्रत्येक समीप 50 हेक्टेयर भूमि के लिए एक अतिरिक्त सेज की अनुमति देगा। यह ऐसे सेज में अवसंरचना सुविधा बनाने के लिए अधिक गुणवत्ता का इस्तेमाल भी लाएगा।
1 क्षेत्र विशेष सेज में अतिरिक्त इकाई की स्थापना के लिए क्षेत्रीय ब्रॉड बैंडिंग की शुरुआत द्वारा समान अथवा संबंधित क्षेत्र के तहत लाने के लिए लोचता अपनाई गई है।
1 भूमि की रिक्तता संबंधी मामलों पर वर्तमान नीति भूमि के पार्सल की अनुमति पूर्व-वर्तमान संरचना के वाणिज्य उपयोग निषेध के साथ सेज के अधिसूचना के लिए खाली भूमि पर विचार के उद्देश्य से देता है। अब यह निर्णय लिया गया है कि ऐसे पूर्व-वर्तमान संरचनाओं और गतिविधियों के अतिरिक्त अधिसूचना जारी होने के बाद ले लिया जाएगा और यह सेज में अन्य कोई गतिविधि के लिए समान लाभ शुल्क के लिए होगा।
सूचना तकनीक निर्यात भारतीय निर्यात के एक बहुत महत्वपूर्ण भाग का निर्माण करता है तथा सूचना तकनीक सेज इसमें महत्वपूर्ण योगदान देता है। इस बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र का तीव्र विकास द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों में भी रोजगार और वृद्धि के अवसर दे इसका उपाय किया जा रहा है :
1 10 हेक्टेयर न्यूनतम भूमि क्षेत्र की वर्तमान आवश्यकता को हटा दिया गया है। अब आईटी/आईटीएस सेज की स्थापना के लिए कोई न्यूनतम भूमि की आवश्यकता नहीं है। केवल सेज विकास करने वालों द्वारा न्यूनतम निर्माण क्षेत्र की जरूरत है।
1 न्यूनतम निर्माण क्षेत्र आवश्यकता में 7 बड़े शहरों जैसे मुंबई, दिल्ली (एनसीआर), चेन्नई, हैदराबाद, बंगलूर, पुणे और कोलकाता के लिए जरूरी एक लाख के लिए 50,000 वर्गमीटर तथा शेष शहरों के लिए केवल 25 वर्गमीटर निर्माण क्षेत्र आवेदनीय है।
1 वर्तमान सेज प्रारूप इकाइयों और पुनर्निवेश के लिए निर्गम नीति शामिल नहीं करता है जिससे यह बड़े लाभ से वंचित रह जाता है। अब यह फैसला लिया गया है कि बिक्री सहित सेज इकाइयों के मालिकाना हक के हस्तांतरण की अनुमति दी जाए।
भारत में अंतर-राज्य नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 का परिचय देते हुए विभिन्न जल विवाद न्यायाधिकरणों का ब्यौरा दीजिए।
अंतर-राज्य नदी जल विवाद (आईएसआरडब्ल्यूडी) अधिनियम, 1956 मूल रूप से अंतर-राज्य नदियों और नदी घाटियों के जल से संबंधित विवादों के अधिनिर्णय के लिए संसद द्वारा 1956 में लागू किया गया। सरकारिया आयोग की अनुशंसाओं को ध्यान में रखते हुए, इस अधिनियम में संशोधन किया गया और 6 अगस्त, 2002 को यह लागू हुआ। अंतर-राज्य जल विवाद न्यायाधिकरणों की निश्चित समय में स्थापना तथा न्यायाधिकरणों द्वारा निर्देशित समय-सीमा के अंदर निर्णय देना संशोधन में शामिल हंै। संशोधन के अनुसार किसी राज्य सरकार के अनुरोध करने की तिथि से एक वर्ष की अवधि के अंदर केंद्र सरकार को न्यायाधिकरण की स्थापना करनी होगी। इसी तरह न्यायाधीकरण का निर्णय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश अथवा डिक्री के अनुसार लागू किया जाएगा।
विभिन्न अंतर-राज्य जल विवाद न्यायाधिकरण
कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (सीडब्ल्यूडीटी) : कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण की स्थापना 2 जून, 1990 को अंतर-राज्यीय नदी घाटी कावेरी से संबंधित जल विवादों के अधिनिर्णय के लिए हुई थी। अंतर-राज्य नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के अनुसार सरकार ने कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण का कार्यकाल 2 नवंबर, 2012 तक बढ़ा दिया था।
कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण : कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण की स्थापना 2 अप्रैल, 2004 को अंतरराज्यीय नदी कृष्णा और इसके नदी घाटी के जल के बंटवारे से संबंधित विवादों के अधिनिर्णय के लिए हुई। रिट पिटीशन संख्या 408/2008 के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि न्यायाधिकरण की स्थापना की प्रभावी तारीख 1 फरवरी, 2006 है। इसी तरह अंतर-राज्य नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के अनुसार न्यायाधिकरण का कार्यक्रम 31 दिसंबर, 2010 तक बढ़ाया गया। न्यायाधिकरण द्वारा अधिनियम की धारा 45 के खंड 5(2) के तहत दिये गये निर्णय और रिपोर्ट को 31 दिसंबर, 2010 को मानव संसाधन मंत्रालय को भेज दिया गया।
वामसधरा जल विवाद न्यायाधिकरण : सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को 2 फरवरी, 2010 से पहले वामसधरा न्यायाधिकरण की स्थापना का निर्देश दिया था। न्यायाधिकरण का नोटिफिकेशन 24 फरवरी, 2010 को न्यायमूर्ति बी.एम. अग्रवाल की अध्यक्षता में न्यायमूर्ति निर्मल सिंह तथा न्यायमूर्ति बी.एन. चतुर्वेदी की सदस्यता में जारी की गई। न्यायमूर्ति बी.एन. अग्रवाल ने 9 दिसंबर, 2010 को अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद केंद्र सरकार ने न्यायाधीश डॉ. मुकुंदकम शर्मा को न्यायाधिकरण के अध्यक्ष पद के लिए नामित किया।
महादायी/मंदोवी नदी जल विवाद : केंद्र सरकार ने 16 नवंबर, 2010 को अधिसूचना जारी कर अंतरराज्यीय नदी महादायी और नदी घाटी महादायी के जल-संबंधी विवाद के निपटारे के लिए महादायी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया। इस न्यायाधिकरण में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति न्यायाधीश जे.एस. पंचाल अध्यक्ष के रूप में, (2) न्यायाधीश विनय मित्तल, मध्य प्रदेश उच्च न्यायाधीश सदस्य के रूप में तथा (3) माननीय न्यायाधीश पी.एस. नारायण ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के सदस्य के रूप में अपना पदभार ग्रहण किया।
रावी और व्यास जल न्यायाधिकरण : रावी और व्यास न्यायाधिकरण का गठन 2 अप्रैल, 1986 को हुआ था तथा इसने 30 जनवरी, 1987 को अपनी रिपोर्ट दी व मई 1987 में इस रिपोर्ट को जारी किया गया। अगस्त 1987 में न्यायाधिकरण के लिए केंद्र सरकार तथा पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान की सरकारों से रिपोर्ट के कुछ बिंदुओं पर निर्देश/विश्लेषण के लिए संदर्भ मंगवाया गया।
राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार के उद्देश्य और लक्ष्य क्या हैं?
कला और ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में सिनेमा के संरक्षण का अपना महत्व है। सिनेमा को इसके तमाम रूपों और प्रकारों में संरक्षित करने के लिए ऐसा संगठन जरूरी है जिसका स्थायी ढांचा हो, जिसे फिल्म उद्योग का विश्वास प्राप्त हो और जिसके पास पर्याप्त संसाधन तथा विशेषज्ञता हो। इसीलिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय की मीडिया इकाई के रूप में फरवरी 1964 में भारतीय राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार की स्थापना की गयी। इसके उद्देश्य और लक्ष्य निम्नलिखित हैं :
राष्ट्रीय सिनेमा की विरासत की पहचान और भावी पीढिय़ों के लिए संरक्षण, विश्व सिनेमा का प्रतिनिधित्व करने वाला एक संग्रह तैयार करना।
फिल्मों से संबंधित आंकड़ों को वर्गीकृत और अभिलेखबद्ध करना, सिनेमा अनुसंधान तथा इसके नतीजों का प्रचार-प्रसार।
देश में फिल्म संस्कृति को बढ़ावा देना और विदेशों में भारत की सांस्कृतिक उपस्थिति सुनिश्चित करना।
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1925-26 तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति ने भारत के विभिन्न हिस्सों में स्थापित कम्युनिस्ट गुटों को एकजुट करने का काम किया। 1923-27 के दौरान मजदूर-किसान पार्टियां गठित की गई। इस समय तक एम.एन. रॉय का प्रभाव कम हो चुका था। उस समय ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन को दिशा दे रही थी। ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी के फिलिप स्प्रैट दिसंबर 1926 में भारत आए और उन्होंने यहां के कम्युनिस्टों को मजदूर-किसान पार्टियां बनाने का सुझाव दिया ताकि वे इनकी आड़ में अपनी गतिविधियां जारी रख सकें। काजी नजरुल इस्लाम और शम्सुद्दीन के प्रयासों से बंगाल, बंबई, पंजाब और उत्तर प्रदेश के प्रगतिशील मजदूर और किसान नेताओं ने केंद्रीय स्तर से लेकर प्रांतीय स्तर तक ऐसी पार्टी का गठन किया जिनका नेतृत्व मजदूरों और किसानों के हाथ में था। मजदूर किसान पार्टी की स्थापना सबसे पहले बंगाल में लेबर स्वराज्य पार्टी के नाम से की गई। 1928 में इसका नाम किसान-मजदूर पार्टी कर दिया गया। 21 दिसंबर, 1928 को कलकत्ता में अखिल भारतीय मजदूर किसान पार्टी की स्थापना की गई और इसके कार्यक्रम तय किए गए। इस सम्मेलन में पूर्ण स्वतंत्रता की भी मांग की गई। 1927 में पहली बार मजदूरों ने पहली मई को मई दिवसज् के रूप में मनाया। मद्रास में 1 लाख 20 हजार से ज्यादा मजदूर इसमें शामिल हुए। वास्तव में कम्युनिस्टों को राजनैतिक क्षेत्र में मजदूर आंदोलन की तरह उतनी सफलता न मिलने के कई कारण थे। पहला, सरकार एक के बाद एक षड्यंत्र के मुकदमें उन पर चलाती रही जिससे पार्टी के नेताओं को पार्टी के संगठन को मजबूत करने का बहुत कम समय मिला। दूसरा, पार्टी के राजनैतिक क्षेत्र में आगे न बढ़ पाने के पीछे मजदूरों की अशिक्षा एक बड़ा कारण थी। तीसरा, धन की कमी पार्टी में राजनैतिक प्रचार में रुकावट डालती रही। चौथा, इस समय तक कम्युनिस्ट एक सही राजनैतिक दृष्टि हासिल नहीं कर पाए थे और पांचवां, भारत में मौजूद जातिवाद और सांप्रदायिकता ने भी कम्युनिस्टों की राह में बाधाएं डालीं। यही वजहे थीं कि भारत में कम्युनिस्टों को राजनैतिक क्षेत्र में उतनी कामयाबी नहीं मिल सकी।
धन विधेयक की परिभाषा दें और यह भी स्पष्ट करें कि इसे संसद में किस प्रकार पारित किया जाता है?
संविधान के अनुच्छेद 110 के अनुसार कोई विधेयक धन विधेयक माना जाएगा यदि उसमें केवल निम्नलिखित सभी या किन्ही विषयों से संबंधित उपबंध हों, अर्थात्-
(क) किसी कर का अधिरोपण, परिहार, परिवर्तन या विनियमन।
(ख) भारत सरकार द्वारा धन उधार लेने या प्रत्याभूति देने का विनियमन या ऋण लेना।
(ग) भारत की संचित निधि या आकस्मिकता निधि में धन जमा करना या उसमें से धन निकालना।
(घ) किसी नए व्यय को भारत की संचित निधि पर भारित व्यय घोषित करना या ऐसे किसी रकम को बढ़ाना।
(ड.) अनुच्छेद 110(1) के उपखंड (क) से (च) में उल्लिखित किसी विषय का आनुषंगिक कोई विषय।
लेकिन कोई विधेयक केवल इसीलिए धन विधेयक नहीं माना जाता है कि वह लाइसेंस के लिए फीस का, या की गई सेवा के लिए फीस की मांग या उनकी अदायगी का उपबंध करता है या इसलिए कि वह स्थानीय प्राधिकारी या निकाय द्वारा स्थानीय प्रयोजनों के लिए किसी कर के अधिरोपण, उत्सादन और विनियमन आदि का उपबंध करता है। प्रश्न उठता है कि कोई विधेयक 'धन विधेयक' है या 'वित्त विधेयक' तो इसका निर्णय लोकसभा अध्यक्ष करता है। राष्ट्र्रपति की सिफारिश पर धन विधेयक केवल लोकसभा में पारित किया जाता है तथा इस विधेयक को पारित करने के लिए राज्यसभा में भेजा जाता है। राज्यसभा धन विधेयक को न तो रद्द कर सकती है और न उसमें संशोधन की सिफारिश कर सकती है। विधेयक प्राप्ति के 14 दिन के भीतर राज्यसभा को यह विधेयक स्वीकृत करके लोकसभा को लौटाना होता है। यदि उक्त अवधि के भीतर इसे लोकसभा को नहीं लौटाया गया तो 14 दिन के बाद विधेयक को दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाता है।
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निर्यात को बढ़ावा देने के लिए तथा सेज में निवेशकों के हितों को पुनर्जीवित करने के लिए उपायों के एक पैकेज की घोषणा की गई। इस पैकेज की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं :
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18 अप्रैल, 2013 को घोषित इस पैकेज की प्रमुख विशेषताएं निम्न हैं :
- सेज की स्थापना के लिए गैर कृषि योग्य भूमि के संपूर्ण विशाल प्रदेशों में तीव्र कठिनाइयों की दृष्टि से समीप और खाली स्थान को सुनिश्चित करते समय यह फैसला किया जाता है कि न्यूनतम भूमि क्षेत्र आवश्यकता आधा किया जाए। बहु-उत्पाद सेज के लिए यह 1,000 हेक्टेयर से 500 हेक्टेयर कम किया गया है जबकि क्षेत्र-विशेष सेज के लिए यह वर्तमान 100 हेक्टेयर से 50 हेक्टेयर कर दिया गया है।
1 50-450 हेक्टेयर के बीच अवरोही भूमि क्षेत्र के उपयोग में बहुत लोचता अपनाई गई है। यह निर्णय लिया गया है कि न्यूनतम भूमि योग्यता के लिए ग्रेड स्केल शुरू हो जो प्रत्येक समीप 50 हेक्टेयर भूमि के लिए एक अतिरिक्त सेज की अनुमति देगा। यह ऐसे सेज में अवसंरचना सुविधा बनाने के लिए अधिक गुणवत्ता का इस्तेमाल भी लाएगा।
1 क्षेत्र विशेष सेज में अतिरिक्त इकाई की स्थापना के लिए क्षेत्रीय ब्रॉड बैंडिंग की शुरुआत द्वारा समान अथवा संबंधित क्षेत्र के तहत लाने के लिए लोचता अपनाई गई है।
1 भूमि की रिक्तता संबंधी मामलों पर वर्तमान नीति भूमि के पार्सल की अनुमति पूर्व-वर्तमान संरचना के वाणिज्य उपयोग निषेध के साथ सेज के अधिसूचना के लिए खाली भूमि पर विचार के उद्देश्य से देता है। अब यह निर्णय लिया गया है कि ऐसे पूर्व-वर्तमान संरचनाओं और गतिविधियों के अतिरिक्त अधिसूचना जारी होने के बाद ले लिया जाएगा और यह सेज में अन्य कोई गतिविधि के लिए समान लाभ शुल्क के लिए होगा।
सूचना तकनीक निर्यात भारतीय निर्यात के एक बहुत महत्वपूर्ण भाग का निर्माण करता है तथा सूचना तकनीक सेज इसमें महत्वपूर्ण योगदान देता है। इस बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र का तीव्र विकास द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों में भी रोजगार और वृद्धि के अवसर दे इसका उपाय किया जा रहा है :
1 10 हेक्टेयर न्यूनतम भूमि क्षेत्र की वर्तमान आवश्यकता को हटा दिया गया है। अब आईटी/आईटीएस सेज की स्थापना के लिए कोई न्यूनतम भूमि की आवश्यकता नहीं है। केवल सेज विकास करने वालों द्वारा न्यूनतम निर्माण क्षेत्र की जरूरत है।
1 न्यूनतम निर्माण क्षेत्र आवश्यकता में 7 बड़े शहरों जैसे मुंबई, दिल्ली (एनसीआर), चेन्नई, हैदराबाद, बंगलूर, पुणे और कोलकाता के लिए जरूरी एक लाख के लिए 50,000 वर्गमीटर तथा शेष शहरों के लिए केवल 25 वर्गमीटर निर्माण क्षेत्र आवेदनीय है।
1 वर्तमान सेज प्रारूप इकाइयों और पुनर्निवेश के लिए निर्गम नीति शामिल नहीं करता है जिससे यह बड़े लाभ से वंचित रह जाता है। अब यह फैसला लिया गया है कि बिक्री सहित सेज इकाइयों के मालिकाना हक के हस्तांतरण की अनुमति दी जाए।
भारत में अंतर-राज्य नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 का परिचय देते हुए विभिन्न जल विवाद न्यायाधिकरणों का ब्यौरा दीजिए।
अंतर-राज्य नदी जल विवाद (आईएसआरडब्ल्यूडी) अधिनियम, 1956 मूल रूप से अंतर-राज्य नदियों और नदी घाटियों के जल से संबंधित विवादों के अधिनिर्णय के लिए संसद द्वारा 1956 में लागू किया गया। सरकारिया आयोग की अनुशंसाओं को ध्यान में रखते हुए, इस अधिनियम में संशोधन किया गया और 6 अगस्त, 2002 को यह लागू हुआ। अंतर-राज्य जल विवाद न्यायाधिकरणों की निश्चित समय में स्थापना तथा न्यायाधिकरणों द्वारा निर्देशित समय-सीमा के अंदर निर्णय देना संशोधन में शामिल हंै। संशोधन के अनुसार किसी राज्य सरकार के अनुरोध करने की तिथि से एक वर्ष की अवधि के अंदर केंद्र सरकार को न्यायाधिकरण की स्थापना करनी होगी। इसी तरह न्यायाधीकरण का निर्णय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश अथवा डिक्री के अनुसार लागू किया जाएगा।
विभिन्न अंतर-राज्य जल विवाद न्यायाधिकरण
कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (सीडब्ल्यूडीटी) : कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण की स्थापना 2 जून, 1990 को अंतर-राज्यीय नदी घाटी कावेरी से संबंधित जल विवादों के अधिनिर्णय के लिए हुई थी। अंतर-राज्य नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के अनुसार सरकार ने कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण का कार्यकाल 2 नवंबर, 2012 तक बढ़ा दिया था।
कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण : कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण की स्थापना 2 अप्रैल, 2004 को अंतरराज्यीय नदी कृष्णा और इसके नदी घाटी के जल के बंटवारे से संबंधित विवादों के अधिनिर्णय के लिए हुई। रिट पिटीशन संख्या 408/2008 के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि न्यायाधिकरण की स्थापना की प्रभावी तारीख 1 फरवरी, 2006 है। इसी तरह अंतर-राज्य नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के अनुसार न्यायाधिकरण का कार्यक्रम 31 दिसंबर, 2010 तक बढ़ाया गया। न्यायाधिकरण द्वारा अधिनियम की धारा 45 के खंड 5(2) के तहत दिये गये निर्णय और रिपोर्ट को 31 दिसंबर, 2010 को मानव संसाधन मंत्रालय को भेज दिया गया।
वामसधरा जल विवाद न्यायाधिकरण : सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को 2 फरवरी, 2010 से पहले वामसधरा न्यायाधिकरण की स्थापना का निर्देश दिया था। न्यायाधिकरण का नोटिफिकेशन 24 फरवरी, 2010 को न्यायमूर्ति बी.एम. अग्रवाल की अध्यक्षता में न्यायमूर्ति निर्मल सिंह तथा न्यायमूर्ति बी.एन. चतुर्वेदी की सदस्यता में जारी की गई। न्यायमूर्ति बी.एन. अग्रवाल ने 9 दिसंबर, 2010 को अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद केंद्र सरकार ने न्यायाधीश डॉ. मुकुंदकम शर्मा को न्यायाधिकरण के अध्यक्ष पद के लिए नामित किया।
महादायी/मंदोवी नदी जल विवाद : केंद्र सरकार ने 16 नवंबर, 2010 को अधिसूचना जारी कर अंतरराज्यीय नदी महादायी और नदी घाटी महादायी के जल-संबंधी विवाद के निपटारे के लिए महादायी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया। इस न्यायाधिकरण में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति न्यायाधीश जे.एस. पंचाल अध्यक्ष के रूप में, (2) न्यायाधीश विनय मित्तल, मध्य प्रदेश उच्च न्यायाधीश सदस्य के रूप में तथा (3) माननीय न्यायाधीश पी.एस. नारायण ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के सदस्य के रूप में अपना पदभार ग्रहण किया।
रावी और व्यास जल न्यायाधिकरण : रावी और व्यास न्यायाधिकरण का गठन 2 अप्रैल, 1986 को हुआ था तथा इसने 30 जनवरी, 1987 को अपनी रिपोर्ट दी व मई 1987 में इस रिपोर्ट को जारी किया गया। अगस्त 1987 में न्यायाधिकरण के लिए केंद्र सरकार तथा पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान की सरकारों से रिपोर्ट के कुछ बिंदुओं पर निर्देश/विश्लेषण के लिए संदर्भ मंगवाया गया।
राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार के उद्देश्य और लक्ष्य क्या हैं?
कला और ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में सिनेमा के संरक्षण का अपना महत्व है। सिनेमा को इसके तमाम रूपों और प्रकारों में संरक्षित करने के लिए ऐसा संगठन जरूरी है जिसका स्थायी ढांचा हो, जिसे फिल्म उद्योग का विश्वास प्राप्त हो और जिसके पास पर्याप्त संसाधन तथा विशेषज्ञता हो। इसीलिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय की मीडिया इकाई के रूप में फरवरी 1964 में भारतीय राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार की स्थापना की गयी। इसके उद्देश्य और लक्ष्य निम्नलिखित हैं :
राष्ट्रीय सिनेमा की विरासत की पहचान और भावी पीढिय़ों के लिए संरक्षण, विश्व सिनेमा का प्रतिनिधित्व करने वाला एक संग्रह तैयार करना।
फिल्मों से संबंधित आंकड़ों को वर्गीकृत और अभिलेखबद्ध करना, सिनेमा अनुसंधान तथा इसके नतीजों का प्रचार-प्रसार।
देश में फिल्म संस्कृति को बढ़ावा देना और विदेशों में भारत की सांस्कृतिक उपस्थिति सुनिश्चित करना।
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